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'भर्ती एजेंसियों ने मनमाना रवैया अपनाया': तेलंगाना पुलिस भर्ती केस पर 'सुप्रीम' टिप्पणी, अभ्यर्थी को मिली राहत

Mon, 08 Jun 2026 03:17 PM IST
Pavan आईएएनएस, नई दिल्ली

सार

देश के सर्वोच्च न्यायालय ने तेलंगाना पुलिस भर्ती मामले में सख्त टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि राज्य की भर्ती एजेंसियों ने एक ऐसे आपराधिक मामले के आधार पर नियुक्ति से इनकार कर मनमाना रवैया अपनाया। इसके साथ ही कोर्ट से अभ्यर्थी की उम्मीदवारी बहाल कर दी गई है।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : एएनआई
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को तेलंगाना में पुलिस कांस्टेबल भर्ती के एक अभ्यर्थी की उम्मीदवारी बहाल करने का फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि राज्य की भर्ती एजेंसियों ने एक ऐसे आपराधिक मामले के आधार पर नियुक्ति से इनकार कर मनमाना रवैया अपनाया, जो एक असफल प्रेम संबंध से जुड़ा था और बाद में लोक अदालत में समझौते के जरिए समाप्त हो गया था।
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गजुल थिरुपति नाम के युवक ने दायर की थी याचिका
जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने यह फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट में गजुल थिरुपति नाम के युवक ने याचिका दायर की थी। इसे मंजूरी देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को तेलंगाना हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के उस फैसले को भी रद्द कर दिया, जिसमें 'स्टाइपेंडरी कैडेट ट्रेनिंग पुलिस कांस्टेबल' (एससीटीपीसी) पद के लिए उनके अस्थायी चयन को रद्द किए जाने को सही ठहराया गया था। अपने फैसले में न्यायमूर्ति मिश्रा की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि नियोक्ता किसी आपराधिक मामले में बरी या मुक्त हो चुके उम्मीदवार की उपयुक्तता का आकलन कर सकते हैं, लेकिन ऐसा निर्णय मनमाना नहीं होना चाहिए।

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'राज्य और अधिकारी नहीं कर सकते मनमानी'
सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'राज्य और उसके अधिकारी मनमाने ढंग से काम नहीं कर सकते। इसलिए, जब ऐसे फैसले की न्यायिक समीक्षा की जाती है, तो यह सुनिश्चित करने के लिए कि वह मनमाना न हो, तो यह दिखाया जाना चाहिए कि (क) रिकॉर्ड पर ऐसा सामग्री मौजूद हो जिससे यह संकेत मिले कि वास्तव में नैतिक अधमता वाला अपराध किया गया था और (ख) उम्मीदवार के खिलाफ ऐसा ठोस सामग्री हो, भले ही वह बरी या मुक्त हो गया हो'।

भर्ती अधिकारियों की दलील पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई नाराजगी
जस्टिस मिश्रा की अगुवाई वाली बेंच ने कहा, 'यह कहना कि समझौते का मतलब अपराध स्वीकार करना है, बिना किसी आधार के है। इसके अलावा, यह कहना कि अपीलकर्ता ने समझौता इसलिए किया क्योंकि वह दोषी था, पूरी तरह से गलत और तर्कहीन है'। अदालत ने यह भी दर्ज किया कि याचिकाकर्ता ने आपराधिक मामले की पूरी और सही जानकारी दी थी। इसके साथ ही, तथ्यों को छिपाने का कोई आरोप नहीं था। सुप्रीम कोर्ट ने भर्ती अधिकारियों की इस दलील पर आपत्ति जताई कि लोक अदालत में हुआ समझौता अपराध स्वीकार करने के समान है।

शीर्ष अदालत ने कहा कि यह मामला दो वयस्कों के बीच संबंध से जुड़ा था और अधिकारियों को सिर्फ इसी आधार पर किसी व्यक्ति के चरित्र के बारे में नकारात्मक निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने आगे कहा कि हर प्रेम संबंध विवाह तक नहीं पहुंचता और सिर्फ इसलिए कि संबंध विवाह में नहीं बदला, यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि एक पक्ष ने दूसरे के साथ धोखाधड़ी की।
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हाईकोर्ट की खंडपीठ का फैसला किया रद्द
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट की खंडपीठ का फैसला रद्द कर दिया और सिंगल जज के उस आदेश को बहाल कर दिया, जिसमें अपीलकर्ता की नियुक्ति पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया गया था। अपीलकर्ता ने अपने आवेदन में बताया था कि उस पर पहले आईपीसी की धारा 417, 420 और 506 (धारा 34 के साथ) के तहत मामला दर्ज किया गया था। यह मामला एक महिला ने दर्ज कराया था, जिसने आरोप लगाया था कि उसने उससे शादी करने का वादा किया था लेकिन बाद में किसी और महिला से शादी कर ली। बाद में 2015 में लोक अदालत में इस मामले को सुलझा लिया गया था। इसके बावजूद तेलंगाना राज्य स्तरीय पुलिस भर्ती बोर्ड ने उसके प्रोविजनल सिलेक्शन को रद्द कर दिया था।
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