नीतीश कुमार और आरसीपी सिंह
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बिहार की राजनीति में आरसीपी का कितना जोर?
आरसीपी सिंह ने अपने एक दशक से भी लंबे करियर में जदयू में काफी जोर बनाया है। उनका प्रभाव इतना रहा कि नीतीश कुमार ने 2017 में राजद के साथ बने महागठबंधन से दूरी बना ली। इतना ही नहीं नीतीश और प्रशांत किशोर के अलगाव के पीछे भी आरसीपी सिंह के बढ़ते राजनीतिक कद को वजह माना जाता है।
जब तक आरसीपी सिंह बिहार में रहे, जदयू में उनके समर्थकों का एक जत्था भी तैयार हो गया। इसके उदाहरण मिलते हैं बिहार में हुई कुछ हालिया घटनाओं से। इसी साल जून में जदयू ने पार्टी विरोधी गतिविधियों के लिए आरसीपी सिंह के चार करीबी नेताओं को प्राथमिक सदस्यता से निलंबित कर दिया था। इनमें जदयू के महासचिव अनिल कुमार और विपिन कुमार यादव जैसे बड़े नाम शामिल थे। इसके अलावा जदयू प्रवक्ता अजय आलोक और पार्टी की समाज सुधार इकाई के अध्यक्ष जितेंद्र नीरज को भी पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था।
पिछले महीने भी जदयू की बैठक में आरसीपी सिंह को सीएम बनाने से जुड़े नारे लगे थे। इन घटनाओं के बाद जदयू नेतृत्व को सफाई देनी पड़ी थी कि नीतीश कुमार पार्टी के अविवादित नेता हैं। आरसीपी सिंह को कड़ी चेतावनी देते हुए पार्टी ने कहा था कि नारेबाजी कर रहे लोगों को पार्टी का सदस्य नहीं माना जाएगा। इसके बाद से ही जदयू के किसी भी नेता ने आरसीपी के समर्थन से जुड़ा बयान नहीं दिया।
पीएम नरेंद्र मोदी-तेजस्वी यादव-नीतीश कुमार (फाइल फोटो)
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नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव(फाइल)
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एनडीए और महागठबंधन के लिए क्या मायने?
- आरसीपी गुट के दावे के मुताबिक उनके संपर्क में 24 विधायक हैं। जदयू के कुल 45 विधायक हैं। अगर विधायक नीतीश से बगावत करते भी हैं तो बागियों को दलबदल से बचने के लिए इनकी संख्या कम से कम 30 होनी चाहिए।
- अगर आरसीपी गुट 30 विधायकों का समर्थन जुटा लेता है और भाजपा के साथ जाने का एलान करता है तो इस स्थिति में भाजपा के 77 विधायकों के साथ कुल विधायकों की संख्या 107 हो जाएगी। एक निर्दलीय सुमित कुमार सिंह भी लंबे समय तक भाजपा में रहे हैं। उनका भाजपा से जुड़ाव है। ऐसे में सुमित का भाजपा गठबंधन के साथ रहना तय माना जा रहा है।
- आरसीपी गुट के 30 विधायकों और निर्दलीय विधायक का साथ मिलने के बाद भी भाजपा को सरकार बनाने के लिए 14 विधायकों की जरूरत पड़ेगी। ऐसे में बिहार में भाजपा को महाराष्ट्र जैसी सफलता के लिए कुछ और दलों का साथ चाहिए होगा।
इस लिहाज से एनडीए को जदयू से टूटने और आरसीपी सिंह के भाजपा में शामिल होने का कोई खास फायदा नहीं होगा। कुल मिलाकर आरसीपी सिंह के एकनाथ शिंदे बनने का रास्ता काफी कठिन है। जदयू ने भी इस बीच महाराष्ट्र जैसी स्थिति से बचने के लिए तैयारियां शुरू कर दी हैं। वह कथित तौर पर कांग्रेस से संपर्क में बनी है। अगर जदयू टूट के बाद महागठबंधन के साथ जाती है तो यह राजद का ही फायदा है।