ऐसा है मेवाड़ राजघराने का इतिहास: राणा सांगा से महाराणा प्रताप तक, जानें मुगलों से टक्कर लेने की कहानी
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र
Updated Sun, 30 Mar 2025 06:18 PM IST
सार
देशभर में राणा सांगा को लेकर छिड़ी बहस के केंद्र में है रामजी लाल सुमन का वह दावा, जिसमें उन्होंने कहा था कि मेवाड़ के राजा ने ही बाबर को भारत बुलाया था। इतिहासकारों के बीच इस मामले पर अलग-अलग तर्क दिए गए हैं। हालांकि, इस पूरी बहस में जिस बात पर चर्चा नहीं हुई, वह है राणा सांगा की विरासत।
समाजवादी पार्टी के सांसद रामजी लाल सुमन की ओर से राणा सांगा को लेकर की गई टिप्पणी पर विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा। उनके बयान को लेकर हंगामा मचा है। हाल ही में करणी सेना ने सुमन के आगरा स्थित घर पर हमला बोल दिया। दूसरी तरफ भाजपा के तमाम नेताओं ने संसद से लेकर सड़क तक रामजी लाल सुमन से माफी की मांग की है। हालांकि, सपा सांसद ने इससे साफ इनकार कर दिया है।
देशभर में राणा सांगा को लेकर छिड़ी इस बहस के केंद्र में है रामजी लाल सुमन का वह दावा, जिसके मुताबिक मेवाड़ के राजा राणा सांगा ने ही दिल्ली सल्तनत के सुल्तान इब्राहिम लोधी को हराने के लिए मुगल शासक बाबर को भारत आने का न्योता दिया था। इसे लेकर इतिहासकारों के अलग-अलग दावे हैं। दरअसल, एक पक्ष का कहना है कि बाबर को न्योता राणा सांगा की तरफ से ही दिया गया था, जबकि दूसरे पक्ष का मानना है कि बाबर को दिल्ली सल्तनत के ही कुछ ऐसे चरित्रों के जरिए हमले के लिए आमंत्रित किया गया था, जो इब्राहिम लोधी को शासन से हटाना चाहते थे। इस मुद्दे पर बहस लंबे समय से जारी है।
हालांकि, इस पूरी बहस के बीच जो बात पीछे छूट जाती है, वह है राणा सांगा का इतिहास। ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर राणा सांगा की क्या विरासत रही? राणा सांगा के वंशजों ने कैसे मुगल साम्राज से टक्कर ली? आइये जानते हैं...
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राणा सांगा की वंशावली।
- फोटो : AI Gen.
समाजवादी पार्टी के सांसद रामजी लाल सुमन की ओर से राणा सांगा को लेकर की गई टिप्पणी पर विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा। उनके बयान को लेकर हंगामा मचा है। हाल ही में करणी सेना ने सुमन के आगरा स्थित घर पर हमला बोल दिया। दूसरी तरफ भाजपा के तमाम नेताओं ने संसद से लेकर सड़क तक रामजी लाल सुमन से माफी की मांग की है। हालांकि, सपा सांसद ने इससे साफ इनकार कर दिया है।
देशभर में राणा सांगा को लेकर छिड़ी इस बहस के केंद्र में है रामजी लाल सुमन का वह दावा, जिसके मुताबिक मेवाड़ के राजा राणा सांगा ने ही दिल्ली सल्तनत के सुल्तान इब्राहिम लोधी को हराने के लिए मुगल शासक बाबर को भारत आने का न्योता दिया था। इसे लेकर इतिहासकारों के अलग-अलग दावे हैं। दरअसल, एक पक्ष का कहना है कि बाबर को न्योता राणा सांगा की तरफ से ही दिया गया था, जबकि दूसरे पक्ष का मानना है कि बाबर को दिल्ली सल्तनत के ही कुछ ऐसे चरित्रों के जरिए हमले के लिए आमंत्रित किया गया था, जो इब्राहिम लोधी को शासन से हटाना चाहते थे। इस मुद्दे पर बहस लंबे समय से जारी है।
हालांकि, इस पूरी बहस के बीच जो बात पीछे छूट जाती है, वह है राणा सांगा का इतिहास। ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर राणा सांगा की क्या विरासत रही? राणा सांगा के वंशजों ने कैसे मुगल साम्राज से टक्कर ली? आइये जानते हैं...
पहले जानें- राणा सांगा के बाबर से मदद मांगने पर क्या कहते हैं इतिहासकार?
सतीश चंद्र की किताब 'मध्यकालीन भारत का इतिहास' में के मुताबिक, ‘1520-21 के आसपास कुछ अफगान सरदार जब बाबर की सहायता से इब्राहिम लोधी को सत्ता से उखाड़ फेंकने की योजना बना रहे थे, तभी संभवतः आलम खां ने बाबर से मुलाकात कर सहायता मांगी। बाबर के पास दौलत खान लोधी ने अपने बेटे दिलावर खान को भेजा और दिल्ली पर आक्रमण का प्रस्ताव रखा। आलम खां ने दिल्ली की गद्दी के बदले बाबर को लाहौर और पश्चिमी पंजाब सौंपने का प्रस्ताव दिया।’ इसी किताब में कहा गया है कि संभवतः राणा सांगा ने भी इसी दौरान बाबर को लोधी पर आक्रमण का संदेश भेजा। सांगा को उम्मीद थी कि बाबर भी बाकी आक्रांताओं की तरह धन लूटकर चला जाएगा और उन्हें दिल्ली के करीब आगरा तक आने में मदद मिलेगी। हालांकि, ऐसा हुआ नहीं।
वहीं, कुछ इतिहासकारों ने बताया कि महाराणा सांगा के दरबारी पुरोहित बागेश्वर पुरोहित ने अपनी डायरी में इसका स्पष्ट विवरण दिया है। उनके वंशज अक्षय नाथ पुरोहित को यह डायरी प्राप्त हुई थी, जिसमें अलग कहानी लिखी है। इसमें कहा गया है कि बाबर ने राणा सांगा के पास संधि दूत भेजकर उनका सहयोग मांगा था, लेकिन महाराणा सांगा ने इसे अस्वीकार कर दिया था। हालांकि सलहदी के राजा ने महाराणा सांगा को इस प्रस्ताव को रणनीतिक रूप से स्वीकार करने की सलाह दी। सांगा ने इसे सीधे समर्थन के बजाय संधि के रूप में स्वीकार किया, लेकिन उन्होंने पानीपत के प्रथम युद्ध (1526) में भाग नहीं लिया।
राजस्थान विश्वविद्यालय में इतिहास पर पीएचडी कर चुके प्रोफेसर वेदप्रकाश शर्मा ने कहा, "राणा सांगा भारतीय इतिहास के एक अमरवीर थे, जिन्होंने 1517 में खातोली और 1518 में बाड़ी के युद्ध में इब्राहिम लोदी को पराजित किया तथा फरवरी, 1527 में बाबर को कड़ी चुनौती दी।" शर्मा सवाल पूछते हैं कि खातोली और खंडार जैसे युद्धों में लोदी को बुरी तरह पराजित करने के बाद भी क्या सांगा को लोदी को हराने के लिए बाबर को बुलाने की जरूरत थी।
इसी कड़ी में कानोड़िया पी.जी. महिला महाविद्यालय जयपुर की इतिहास विभाग अध्यक्ष डॉ. सुमन धनाका ने कहते हैं कि हमें यह समझना होगा कि बाबरनामा स्वयं बाबर द्वारा लिखवाया गया ग्रंथ है, जिसमें उसने अपनी विजय को महिमामंडित कराया है। इतिहास को केवल एक स्रोत से देखना सही नहीं होगा। उन्होंने बताया कि महाराणा सांगा ने न तो बाबर को न्योता भेजा और न ही उसे सीधे समर्थन दिया लेकिन जब बाबर ने इब्राहीम लोदी को हराने के बाद भारत में अपनी स्थिति मजबूत करनी चाही, तो उसने महाराणा सांगा पर ही हमला कर दिया।
राणा सांगा कब बने मेवाड़ के महाराज?
राणा सांगा, जिनका असल नाम महाराणा संग्राम सिंह-प्रथम था, का जन्म राजा रायमल और रानी रतन कुंवर के यहां हुआ था। राजा रायमल मेवाड़ राजघराने से आते थे और मेवाड़ के 7वें महाराणा रहे।
महाराणा रायमल 1473 से 1508 तक मेवाड़ के राजा रहे। उन्होंने 11 शादियां कीं, जिनसे उनके 14 बेटे और दो बेटियां हुईं।
राणा सांगा उनके तीसरे बेटे थे। 1508 में राजा रायमल के निधन के बाद राणा सांगा ने मेवाड़ की राजगद्दी संभाली।
12 अप्रैल 1482 को जन्मे संग्राम सिंह 1508 में मेवाड़ के 8वें महाराणा बने। उनका पहला विवाह रानी लखू देवी से हुआ, जबकि दूसरा विवाह रानी करमावती देवी से हुआ। इसके अलावा उनके कई और विवाह हुए। राणा सांगा का निधन 30 जनवरी 1528 को कालपी (अब उत्तर प्रदेश में) हुआ।
राणा सांगा के बाद उनके बेटे रतन सिंह मेवाड़ के 9वें महराणा के तौर पर स्थापित हुए। 1531 में रतन सिंह के निधन के बाद राणा सांगा के ही एक और बेटे महाराणा विक्रमादित्य सिंह ने गद्दी संभाली। हालांकि, 1536 में उनकी भी मृत्यु हो गई।
इसके बाद राणा सांगा के पुत्र उदय सिंह-द्वितीय मेवाड़ के 11वें महाराणा बने। उनका रानी जयवंती बाई से विवाह हुआ और उनकी पहली संतान प्रताप सिंह थे, जिनका जन्म 9 मई 1540 को पाली गढ़ में हुआ।
उदय सिंह-द्वितीय के देहांत के बाद वे 1572 में उदयपुर के महाराणा बने और 1597 तक अंतिम सांस तक वीर महाराणा प्रताप के तौर पर पहचान मिली।
मुगल शासकों से कैसे लोहा लेता रहा मेवाड़ राजघराना?
1. जहां राणा सांगा ने बाबर से युद्ध के मैदान में जबरदस्त जंग की और संघर्ष में एक हाथ, एक आंख और एक पैर गंवाने के बावजूद लड़ते रहे। एमएम. माथुर के जर्नल लेख ग्लोरियस मेवाड़ के मुताबिक, इस युद्ध में राणा सांगा को 80 घाव मिले थे।
2. राणा सांगा के बाद उनके बेटे रतन सिंह का महाराणा के तौर पर शासन महज चार साल का ही रहा। हालांकि, उनके बाद महाराणा विक्रमादित्य ने राजगद्दी संभाली। बताया जाता है कि विक्रमादित्य ने युद्ध कला में इतना ध्यान नहीं दिया, जिसके चलते 1535 में जब गुजरात के सुल्तान बहादुर शाह ने चित्तौड़ पर हमला बोला, तब वे युद्ध को जीतने में असफल रहे और बहादुर शाह के साथ संधि करने को मजबूर हुए।
3. महाराणा विक्रमादित्य के बाद उदय सिंह-II मेवाड़ के अगले राजा बने। उनके शासनकाल में पहले शेर शाह सूरी और बाद में अकबर से मेवाड़ राजघराने की कई टक्करें हुईं। इस दौरान जहां पहले चित्तौड़ पर अफगान हमले को रोका गया। वहीं, दूसरी बार में चित्तौड़ के किले से उन्होंने अन्य हमलावरों को खदेड़ दिया।
4. उदय सिंह- द्वितीय के बेटे प्रताप सिंह 1572 में मेवाड़ के महाराणा बने। महाराणा प्रताप के मुगल शासक अकबर से टक्कर लेने के कई किस्से इतिहास की किताबों में दर्ज हैं। जहां अकबर भारत पर शासन के अपने अधिकार के लिए खड़ा रहा, वहीं महाराणा प्रताप मुगलों के बढ़ते वर्चस्व के बावजूद अपने क्षेत्र की स्वतंत्रता और आजाद स्थिति को बनाए रखने के लिए उनसे भिड़ते रहे।
5. महाराणा प्रताप के लिए अकबर एक विदेशी आक्रांता था, जिसके पास भारत के लोगों पर शासन करने का कोई अधिकार नहीं था। महाराणा प्रताप ने अकबर के सामने आत्मसमर्पण से इनकार कर दिया और आखिरी दम तक लड़ने की बात दोहराते रहे। जब महाराणा प्रताप ने अकबर को भारत का शासक मानने से इनकार कर दिया तो मुगल शासक ने मेवाड़ के खिलाफ युद्ध का एलान कर दिया। इसके चलते 1576 में अकबर और महाराणा प्रताप के बीच हल्दीघाटी का युद्ध हुआ। कहा जाता है कि महाराणा प्रताप की वीरता से मुगल उनके क्षेत्र को तबाह करने में सफल नहीं हो पाए। 1597 में महाराणा प्रताप का निधन होने के बाद उनके सबसे बड़े बेटे अमर सिंह अगले महाराणा के तौर पर स्थापित हुए।