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राज्यसभा के उपसभापति का चुनाव टलने के आसार, भाजपा को शिवसेना के रुख से चिंता

Sat, 28 Jul 2018 01:22 AM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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राज्यसभा में उपसभापति का पद अभी कुछ और दिनों तक खाली रहने की संभावना है। कांग्रेस सदस्य पीजे कुरियन का कार्यकाल खत्म होने से खाली हुए इस पद के लिए चुनाव सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी तब तक नहीं कराना चाहती जब तक उसे अपनी विजय का भरोसा नहीं हो जाता। फिलहाल विपक्ष के पास संख्या बल कुछ ज्यादा है। लेकिन यदि बीजू जनता दल बीजेपी और उसके सहयोगियों का समर्थन कर दे तो इस पद पर एनडीए सदस्य जीत सकता है। 245 सदस्यों वाले सदन में एक सीट खाली है। यानी जिस गठबंधन के पास 123 सांसद होंगे, उप सभापति का पद उसी के पास रहेगा।

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सबसे बड़े दल, भारतीय जनता पार्टी के 73 सांसद हैं और एनडीए घटक दलों के सदस्यों को मिला कर उसकी संख्या 97 हो जाती है। अविश्वास प्रस्ताव पर अन्ना डीएमके के रुख का सही माना जाए तो एनडीए के सांसदों की संख्या 110 हो जाती है। बीजेपी यदि 6 तेलंगाना राष्ट्र समिति के सांसदों का समर्थन भी जुटा ले तो यह संख्या 116 हो जाती है। सभा मतभेदों को भुलाकर यदि शिवसेना बीजेपी का साथ दे तो भी वे 119 तक ही पहुंच पा रहे हैं। यानी बीजद के 9 सांसदों के समर्थन के बिना उप सभापति का पद बीजेपी की पकड़ से बाहर ही रहेगा। यही अंकगणित बीजेपी को परेशान कर रहा है।

उधर, विपक्षी सदस्यों की संख्या 116 है। यदि इन्हें बीजद का समर्थन मिलता है तो इनकी ताकत बढ़कर 125 हो जाएगी। और यदि शिवसेना और बीजद दोनों ही उपसभापति के चुनाव से दूर रहते हैं तो दोनों पक्ष 116-116 की बराबरी पर रुक जाएंगे। इसीलिए सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही किसी ऐसे व्यक्ति की तलाश कर रहे हैं जिसका नाम सभी को स्वीकार्य हो। पहले विपक्ष की ओर से तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद सुखेंदु शेखर रॉय का नाम उछाला गया। लेकिन अब विपक्ष बीजू जनता दल के ही किसी सांसद को उपसभापति पद का उम्मीदवार बनाने पर विचार कर रहा है।
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लेकिन आगामी लोकसभा और विधानसभा चुनावों के मद्देनजर बीजद नेता नवीन पटनायक कांग्रेस और बीजेपी दोनों से ही बराबर दूरी बनाए रखना चाहते हैं। इसीलिए उन्होंने लोकसभा में अपने सांसदों को अविश्वास प्रस्ताव से अनुपस्थित करने के निर्देश दिए थे। हालाँकि उनके पास प्रस्ताव पर चर्चा में हिस्सा लेते हुए केंद्र सरकार की आलोचना करने के बाद वोटिंग में हिस्सा न लेने का विकल्प थी। लेकिन तब वे अविश्वास प्रस्ताव का अपरोक्ष समर्थन करते नजर आते।

पहली बार हो सकता है गैर-कांग्रेसी उपसभापति
आजादी के बाद से उपसभापति पद पर लगातार कांग्रेस या उसके द्वारा समर्थित उम्मीदवार ही चुने जाते रहे हैं। सबसे पहले उपसभापति एसवी कृष्णमूर्ति राव थे जो 1952 से 1962 तक इस पद पर रहे। फिर 1969 तक सुप्रसिद्ध वकील वायलट अलावा रहीं। उनके बाद उपसभापति बने बीडी खोबरागड़े और गोडे मुराहरी थे तो निर्दलीय लेकिन कांग्रेस के समर्थन से ही चुने गए। बाद में इस पद पर बैठे राम निवास मिर्धा, श्याम लाल यादव, नजमा हेपतुल्ला, एमएमजैकब, प्रतिभा पाटिल, के रहमान खान और पीजे कुरियन सभा कांग्रेसी सांसद रहे। 

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