रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि बदलते युद्ध में सबसे तेज तकनीक अपनाने वाला देश ही आगे रहेगा। डीआरडीओ कार्यक्रम में उन्होंने ऑपरेशन सिंदूर का जिक्र करते हुए स्वदेशी रक्षा प्रणालियों की सराहना की। इस दौरान उन्होंने डीआरडीओ को कई अहम सलाह भी दी। आइए जानते हैं रक्षा मंत्री ने क्या-कुछ कहा।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बदलते युद्ध के स्वरूप और तेजी से बदलती तकनीक को लेकर बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि आज के समय में केवल सबसे मजबूत होना काफी नहीं है, बल्कि सबसे तेज होना जरूरी है। नई दिल्ली में डीआरडीओ के एक कार्यक्रम में उन्होंने साफ कहा कि जो देश तकनीक को जल्दी सोचता, तय करता और जमीन पर उतारता है, वही आगे रहता है।
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स्वदेशी पर क्या बोले राजनाथ सिंह
रक्षा मंत्री ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने यह साबित कर दिया है कि स्वदेशी रक्षा प्रणालियां भारत की सैन्य तैयारियों को मजबूत कर रही हैं। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में आत्मनिर्भरता अब सिर्फ नीति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सोच बन चुकी है। उन्होंने डीआरडीओ की भूमिका की सराहना करते हुए कहा कि भारतीय सेनाओं में स्वदेशी तकनीक का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है।
ऑपरेशन सिंदूर क्यों अहम बताया गया?
राजनाथ सिंह ने कहा कि मई 2025 में हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान डीआरडीओ द्वारा विकसित प्रणालियों का प्रभावी इस्तेमाल किया गया।
पहलगाम आतंकी हमले के बाद 7 मई को कार्रवाई शुरू हुई।
पाकिस्तान के कब्जे वाले इलाकों में आतंकी ठिकानों पर हमले किए गए।
चार दिन तक सैन्य टकराव चला।
10 मई को सैन्य कार्रवाई रोकने पर सहमति बनी।
उन्होंने कहा कि इस अभियान ने भारत की स्वदेशी सैन्य क्षमता पर भरोसा बढ़ाया है।
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तकनीक की रफ्तार पर क्यों दिया जोर?
रक्षा मंत्री ने कहा कि आज की तकनीक चार-पांच साल में बेकार हो सकती है।
रिसर्च से प्रोटोटाइप तक का समय घटाना होगा।
परीक्षण से तैनाती तक की प्रक्रिया तेज करनी होगी।
सेनाओं में समय पर शामिल करना सबसे बड़ा पैमाना होना चाहिए।
उन्होंने इसे सर्वाइवल ऑफ द फास्टेस्ट का सिद्धांत बताया। साथ ही कहा कि युद्ध के मैदान में देर भारी पड़ सकती है।
डीआरडीओ को क्या सलाह दी?
राजनाथ सिंह ने डीआरडीओ से कहा कि जहां निजी क्षेत्र मजबूत है, वहां सीमित रहकर काम न किया जाए।
जोखिम लेने के लिए अलग विंग बनाने का सुझाव दिया।
सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के साथ मिलकर काम करने पर जोर।
एमएसएमई, स्टार्टअप और शिक्षण संस्थानों से सहयोग बढ़ाने की बात कही।
उन्होंने कहा कि डीआरडीओ को एकाधिकार वाली सोच छोड़कर सहयोगी मॉडल अपनाना होगा।
रक्षा निर्यात और भविष्य की दिशा क्या है?
रक्षा मंत्री ने कहा कि 2014 में रक्षा निर्यात 1,000 करोड़ रुपये से भी कम था, जो अब बढ़कर करीब 24,000 करोड़ रुपये हो गया है। सरकार ने 2029-30 तक 50,000 करोड़ रुपये का लक्ष्य रखा है। उन्होंने कहा कि ड्रोन, रडार, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम और गोला-बारूद जैसे क्षेत्रों में निर्यात की सोच डिजाइन के स्तर से ही होनी चाहिए।