पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी हत्या मामले में दोषी रहे एजी पेरारिवलन अब वकील बन गए हैं। 54 साल के एजी पेरारिवलन ने 27 अप्रैल को औपचारिक रूप से वकालत की काली कोट पहन ली और तमिलनाडु और पुडुचेरी बार काउंसिल में अपना पंजीकरण करा लिया। इसके बाद अब पेरारिवलन मद्रास हाई कोर्ट में वकालत करेंगे। उन्होंने कहा कि वे खासतौर पर जेल में बंद कैदियों को कानूनी मदद देने और न्याय दिलाने पर काम करेंगे।
बता दें कि पेरारिवलन को 1991 में 19 साल की उम्र में गिरफ्तार किया गया था। उन पर आरोप था कि उन्होंने विस्फोटक बनाने में इस्तेमाल हुई 9 वोल्ट की बैटरी उपलब्ध कराई थी। इस मामले में वे करीब 31 साल तक जेल में रहे। 18 मई 2022 को सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत विशेष अधिकार का इस्तेमाल करते हुए उन्हें रिहा करने का आदेश दिया था।
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जेल में रहते हुए जारी रखी थी पढ़ाई
रिहाई से पहले जेल में रहते हुए ही पेरारिवलन ने पढ़ाई जारी रखी। उन्होंने डॉ बीआर आंबेडकर लॉ कॉलेज से कानून की पढ़ाई पूरी की और 2025 में ऑल इंडिया बार एग्जाम भी पास किया। सोमवार को उनके नामांकन समारोह में सुश्रुत अरविंद धर्माधिकारी भी मौजूद रहे। इस मौके पर बार काउंसिल के अध्यक्ष पीएस अमलराज और उपाध्यक्ष एस. प्रभाकरन सहित कई वरिष्ठ वकील भी शामिल हुए। पेरारिवलन ने कहा कि उनकी लंबी कानूनी लड़ाई ने उन्हें कानून पढ़ने के लिए प्रेरित किया। अब वे उन लोगों की मदद करना चाहते हैं, जो गलत तरीके से जेल में बंद हैं और न्याय के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
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समझिए पूरा मामला और कोर्ट का फैसला
गौरतलब है कि तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में 21 मई 1991 को चुनावी रैली में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के वक्त एजी पेरारिवलन उर्फ अरिवु की उम्र 19 साल थी। पुलिस ने उसे राजीव की हत्या में इस्तेमाल होने वाले बम बनाने के लिए दो बैटरी देने और इस साजिश के लिए गलत पते से मोटरसाइकिल खरीदवाने के आरोप में गिरफ्तार किया था। 1999 में सुप्रीम कोर्ट ने तमिल कवि कुयिलदासन के बेटे पेरारिवलन समेत 26 लोगों को मौत की सजा सुनाई।
फैसले में कोर्ट ने क्या कहा था?
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस टीएस थॉमस ने 2013 में कहा कि 23 साल जेल में रखने के बाद किसी को फांसी देना सही नहीं होगा। यह एक अपराध के लिए दो सजा देने जैसा है। 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया। पेरारिवलन ने 2014 में तमिलनाडु के राज्यपाल के पास दया याचिका दायर की थी। जो पिछले कई वर्षों तक लंबित रही। 2018 में प्रदेश सरकार के मंत्रिमंडल ने इस पर राज्यपाल को अपनी सिफारिश दी और पेरारिवलन की उम्रकैद पूरी होने से पहले उसे रिहा करने की मांग की।