राजस्थान में साल के अंत में होने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए कांग्रेस पार्टी ने तैयारियां शुरु कर दी हैं। एक तरफ सरकार जहां महंगाई राहत कैंप लगाकर मतदाताओं को साधने में जुटी हुई है। वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस ने उम्मीदवारों की चयन की प्रक्रिया शुरू करने पर विचार कर रही है। पार्टी इस बार चुनाव की घोषणा से पहले ही अपने उम्मीदवार मैदान में उतारने की सोच रही है। पार्टी की इस योजना को हवा सीएम अशोक गहलोत के उस बयान से मिली है जो उन्होंने यूथ कांग्रेस के कार्यक्रम में दिया था। गहलोत ने साफ कहा था कि, दिल्ली में लंबी बैठकों का सिस्टम बंद होना चाहिए। दो महीने पहले टिकट फाइनल कर दें, जिसे टिकट मिलना है। उसे इशारा कर दें। वो लोग काम में लग जाएं। हमने प्रदेश प्रभारी सुखजिंदर सिंह रंधावा को भी कहा है। दो महीने पहले टिकट तय हो जाएं।
राज्यों के विधानसभा चुनावों में दो माह पहले ही उम्मीवार घोषित करने रणनीति की शुरुआत आम आदमी पार्टी ने की है। चाहे दिल्ली हो या पंजाब पार्टी हर जगह चुनाव घोषित होने से दो माह पहले ही अपने उम्मीदवार घोषित कर देती है। अब गहलोत इसी रणनीति पर आगे बढ़ते दिखाई दे रहे है। वहीं आम आदमी पार्टी भी राजस्थान के सभी सीटों पर उम्मीदवार खड़ा करेगी।
कर्नाटक के इस सफल दांव को राजस्थान में भुनाने की तैयारी
प्रदेश कांग्रेस के एक वरिष्ठ उपाध्यक्ष का कहना है कि, कांग्रेस ने हाल ही में कर्नाटक में इसी फार्मेूले पर काम किया था। कांग्रेस ने चुनाव से करीब डेढ़ माह पहले ही अपने ज्यादातर उम्मीदवार घोषित कर दिए थे। उम्मीदवारों की पहली और दूसरी सूची तो कांग्रेस ने चुनाव घोषणा होने से पहले ही जारी कर दी थी। कर्नाटक में 10 मई को मतदान होना था, जबकि कांग्रेस ने अपनी पहली सूची 17 मार्च को दिल्ली ने मंजूर कर दी थी। जबकि भाजपा को टिकट घोषित करने में देरी करने के कारण नुकसान हुआ। कांग्रेस के उम्मीदवारों को क्षेत्र में काम करने का भरपूर समय मिला और पहले दिन से ही कांग्रेस चुनाव प्रचार में भाजपा से आगे निकल गई।
चुनाव से पहले इसलिए ये एजेंडा सेट कर रहे गहलोत
कांग्रेस से जुड़े सूत्रों का कहना है कि, प्रदेश की अशोक गहलेात सरकार इस बार वह हर तरकीब अपना रही जो उन्हें दोबारा जीत दिलवा सके। वे अपने भाषणों में बार बार यह कह रहे कि महंगाई राहत कैंपों का अच्छा असर देखने को मिल रहा है। इससे वह न केवल कांग्रेस पार्टी बल्कि विरोधियों और विरोधियों और जनता के बीच एक एजेंडा सेट करन में लगे है कि कांग्रेस दोबारा सत्ता में वापसी कर सकती है। ऐसे में सीएम का मानना है कि अगर चुनाव के कुछ माह पहले टिकट घोषित हो जाते है तो कांग्रेस उम्मीदवार को क्षेत्र में प्रचार करने का न केवल ज्यादा समय मिलेगा। बल्कि अगर कोई नेता टिकट नहीं मिलने का विरोध भी करता है तो उसे भी मनाया जा सकेगा। क्योंकि कई राज्यों में देखने में आया कि टिकट घोषित होने के बाद बगावत के हालत को रोकने में कांग्रेस कमजोर पड़ जाती है। जिससे पार्टी को चुनाव में नुकसान होता है। पिछले चुनाव में भी कई सीटों पर विरोध हुआ था।
पिछली बार से सबक ले रही पार्टी
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि, पिछले चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने आखिरी वक्त पर अपने उम्मीदवार घोषित किए थे। यहीं नहीं कुछ सीटों पर तो पार्टी ने नामांकन के आखिरी दिन उम्मीदवारों को टिकट दिए थे। इससे पार्टी को कुछ सीटों पर बहुत नुकसान हुआ। चुनाव से 15 से 20 दिन पहले अगर नाम घोषित किए जाते हैं तो उम्मीदवार अपने चुनाव अभियान को अच्छी तरह से गति नहीं दे पाते। प्रत्याशियों को दो माह का समय मिलेगा तो वह पूरी तैयारियों के साथ चुनावी मैदान में उतरेंगा। बूथ स्तर पर चुनावी बेहतर प्रबंधन हो सकेगा। सबसे ज्यादा फायदा यह होगा कि उम्मीदवार अपने क्षेत्र के लोगों के बीच बार बार जा पाएंगे।
पिछली बार पहली सूची के 152 उम्मीदवारों में से 70 को मिली थी हार
पिछले चुनाव में गहलोत-पायलट में टिकट बंटवारे में खींचतान के कारण उम्मीदवार घोषित करने में कांग्रेस ने देरी की थी। पहली सूची में 152 उम्मीदवार घोषित किए गए थे, लेकिन इनमें से 70 सीटों पर कांग्रेस हार गई थी। हार वाली सीटों में से कुछ सीटें ऐसी भी थीं जहां कांग्रेस के नेताओं ने ही बगावत करके पार्टी को हरा दिया। जबकि दूसरी लिस्ट के 32 उम्मीदवारों में से 16 हारे थे। ये लिस्ट नामांकन के आखिरी तारिख के दो दिन पहले आई थी। जबकि तीसरी सूची नामांकन से एक दिन पहले आई थी। इनमें 18 सीटों में से कांग्रेस सिर्फ तीन सीटों पर ही जीत दर्ज कर सकी थी।