फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Rajasthan Politics: क्या बच गई है गहलोत की कुर्सी? दिल्ली से लौटते ही पुराने अंदाज में काम कर रहे मुख्यमंत्री

सार

Rajasthan Politics: राजनीतिक घटनाक्रम के थमते ही गहलोत फ्रंटफुट पर खेलते हुए दिखाई दे रहे हैं। वे 7 और 8 अक्तूबर को राजस्थान में होने वाली 'इनवेस्ट राजस्थान समिट' की तैयारियों में जुट गए हैं। जयपुर के सीतापुरा में होने वाली इस समिट में सरकार ने 10 लाख करोड़ रुपये के निवेश का टारगेट रखा है...
विज्ञापन
Rajasthan Politics: Ashok Gehlot - फोटो : Agency
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

राजस्थान में मचे सियासी घमासान के बाद अब हाईकमान के निर्णय पर सबकी निगाहें टिकी हुई है। फैसला इस पर लिया जाना है कि गहलोत कुर्सी पर काबिज पर रहेंगे या नहीं। दिल्ली से जयपुर लौटते ही सीएम अपनी जानी पहचानी स्टाइल में काम करते हुए नजर आ रहे हैं। कई जिलों में ताबड़तोड़ दौरे किए। इन दौरों का मकसद गहलोत का 'ऑल इज वेल' का मैसेज भी माना जा रहा है। क्योंकि इन पब्लिक प्रोग्राम के जरिए वे संदेश देना चाहते हैं कि वे अपनी कुर्सी को लेकर आश्वस्त हैं। हालांकि इसी बीच उन्होंने राजस्थान में हुई बगावत को लेकर बड़ा बयान दिया है। और आलाकमान तक मैसेज पहुंचाने की कोशिश की है कि राजस्थान में विधायक डरे हुए हैं।

विज्ञापन


इधर, राजनीतिक घटनाक्रम के थमते ही गहलोत फ्रंटफुट पर खेलते हुए दिखाई दे रहे हैं। वे 7 और 8 अक्तूबर को राजस्थान में होने वाली 'इनवेस्ट राजस्थान समिट' की तैयारियों में जुट गए हैं। जयपुर के सीतापुरा में होने वाली इस समिट में सरकार ने 10 लाख करोड़ रुपये के निवेश का टारगेट रखा है। प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक, अब तक साढ़े 10 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के प्रस्ताव सरकार को मिल चुके हैं। सीएम ने प्रदेश में 1.42 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के इनवेस्टमेंट को प्रमोशन के लिए 32 प्रोजेक्ट्स को कस्टमाइज्ड पैकेज की मंजूरी दी है। इससे प्रदेश में 32 हजार से ज्यादा लोगों को रोजगार के मौके मिलेंगे।

अपने बयानों से हाईकमान को दिया संकेत

दरअसल, 4 दिन पहले कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से अशोक गहलोत और सचिन पायलट की मुलाकात के बाद से ही नेतृत्व परिवर्तन के फैसले का इंतजार किया जा रहा है। कांग्रेस के संगठन महासचिव केसी वेणुगोपाल ने भी शुक्रवार को कहा था कि 1 से 2 दिन में मुख्यमंत्री पर फैसला हो जाएगा। हालांकि, अब तक पार्टी की ओर से न तो कोई फैसला सुनाया गया है और ना ही कोई संकेत दिया गया है। इसी बीच दिल्ली में सोनिया गांधी से माफी मांग कर लौटे गहलोत ने रविवार को एक बार फिर अपने तेवर दिखाए और इशारों में साफ कर दिया कि सचिन पायलट उन्हें अपने उत्तराधिकारी के रूप में मंजूर नहीं हैं।

गहलोत ने इशारा किया कि राज्य में अधिकतर विधायक उनके साथ हैं। उन्होंने कहा कि इस बात पर गौर किया जाना चाहिए कि राज्य में नए मुख्यमंत्री के नाम पर विधायकों में नाराजगी क्यों है। नए मुख्यमंत्री की नियुक्ति किए जाने पर 80 से 90 फीसदी विधायक पाला बदल लेते हैं, वे नए नेता के साथ हो जाते हैं, मैं इसे गलत भी नहीं मानता, लेकिन राजस्थान में ऐसा नहीं हुआ।' सचिन पायलट का नाम लिए बगैर सीएम ने कहा, 'जब नए मुख्यमंत्री के आने की संभावना थी, तो क्या कारण था कि उनके नाम से ही विधायक बुरी तरह से भड़क गए, जो आज तक कभी नहीं हुआ... उन्हें इतना भय किस बात का था...क्या उनके मन में कुछ चल रहा था और सबसे बड़ी बात तो यह है कि कैसे उन्हें इस बारे में मालूम पड़ा।'

इन कामों के जरिए विरोधियों को दे रहे संदेश

राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार संदीप दहिया अमर उजाला से चर्चा में कहते हैं, जब से सीएम गहलोत दिल्ली से राजधानी जयपुर लौटे हैं, इसके बाद से ही वे अपने रुटीन काम में जुटे हुए नजर आ रहे हैं। 1 अक्तूबर को उन्होंने राजस्थान के नहरी क्षेत्र के जिलों- बीकानेर, हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर के ताबड़तोड़ दौरे किए हैं। इस दौरान वे अलग-अलग समाजों, वर्गों के साथ कार्यक्रमों में शामिल हुए। बजट घोषणाओं और पेंडिंग फाइलों को तेजी से निपटाने पर वे लगातार फोकस कर रहे हैं। इस दौरान वे बार-बार कह रहे हैं कि प्रदेश का आखिरी बजट वे ही पेश करेंगे। बजट भी युवाओं को ध्यान में रखकर बनाया जाएगा। सीएम इन सभी कवायदों से विरोधियों को साफ संदेश दे रहे हैं कि हाईकमान से माफी मांगने के साथ ही राजस्थान की राजनीति का मामला शांत हो गया हैं। बयानों के जरिए भी उन्हें विरोधियों को जता दिया है कि उनकी कुर्सी खतरे में नहीं और वे ही सीएम बने रहेंगे।

विज्ञापन


दहिया कहते हैं कि कांग्रेस किसी भी स्थिति में अशोक गहलोत पर कोई कार्रवाई नहीं कर सकती है। क्योंकि आलाकमान को पता है कि गहलोत पर कार्रवाई मतलब 2023 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी को हार का मुंह देखना। क्योंकि अधिकांश विधायकों का समर्थन गहलोत को हासिल है। इसलिए पार्टी हर स्थिति गहलोत को अपने साथ रखेगी। अगर पार्टी उन्हें सीएम पद से हटाती है, तो पार्टी में टूट होगी, जिसकी भरपाई बहुत मुश्किल होगी। इसलिए पार्टी बीच का कोई रास्ता निकालने पर ध्यान देगी।  

दोनों पक्षों को साधने की कवायद में जुटा हाईकमान

अमर उजाला से चर्चा में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का कहना है, गहलोत के घटनाक्रम के बाद हाईकमान बदलाव के पक्ष में नजर तो आ रहा है, लेकिन चुनाव को देखते हुए पार्टी कोई जोखिम नहीं ले चाहती है। सचिन पायलट को हाईकमान 2018 से कमान सौंपने की तैयारी में था, लेकिन विधायकों की एकजुटता के मामले में गहलोत का जादू आड़े आ रहा है। दिल्ली दरबार भी इस बात को जानता है कि अधिकांश विधायक गहलोत के समर्थन में हैं। जबकि गहलोत भी मुख्यमंत्री पद के लिए सब कुछ दांव पर लगाने के लिए तैयार है। वे साफ भी कर चुके है कि राजस्थान मोह उनसे नहीं छूटता है। ऐसे में अगर पार्टी गहलोत को हटाती है तो राज्य सरकार संकट में आ सकती है। इसलिए हाईकमान ऐसा रास्ता निकालने की कोशिश में है, जिससे दोनों पक्षों को संतुष्ट किया जा सके।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें