अगर आप किसी फैक्ट्री, उद्योग या गोदाम से जुड़े है और भारतीय रेलवे की साइडिंग या शंटिग सेवाएं लेते हैं तो यह सुविधा 15 अगस्त से महंगी होने जा रही है। भारतीय रेलवे ने साइडिंग और शंटिंग चार्ज में लगभग 11 से 12 फीसदी की बढ़ोतरी का एलान कर दिया है। रेलवे यह बदलाव करीब 16 साल बाद किया है। इससे पहले इन शुल्कों में संशोधन 2009 में किया गया था।
दरअसल, रेलवे की मुख्य लाइन से जुड़ी जो निजी या समर्पित रेल लाइन होती है, उसे साइडिंग कहा जाता है। यह लाइन किसी सीमेंट फैक्ट्री, कोयला डिपो, इस्पात उद्योग या किसी अन्य भारी उद्योग तक जाती है, ताकि वहां आसानी से माल लाया या भेजा जा सके। अब जब वैगन साइडिंग में पहुंचते हैं तो उन्हें वहां सही स्थान पर ले जाने, जोड़ने, काटने या व्यवस्थित करने का काम रेलवे के इंजन से होता है, जिसे शंटिंग कहा जाता है। उदाहरण के तौर पर जब कोई सीमेंट फैक्ट्री कच्चा माल (जैसे कोयला या चूना पत्थर) मंगवाती है या तैयार सीमेंट भेजती है, तो उस माल को लोड-अनलोड करने के लिए शंटिंग इंजन की जरूरत पड़ती है। साइडिंग वाले उद्योग या गोदाम मालिक रेलवे से इंजन की मांग करते हैं ताकि उनके वैगन को साइडिंग में लाया जा सके या मुख्य लाइन से जोड़ा जा सके। इसके बदले रेलवे उन्हें प्रति घंटे के हिसाब से शुल्क लेता है। रेलवे अब यही शुल्क को बढ़ा दिया गया है।
उत्तर मध्य रेलवे का कहना है कि वर्ष 2009 के बाद से इस शुल्क में कोई बढ़ोतरी नहीं हुई थी, ऐसे में अब बदलाव समय की मांग बन गया था। यह नई दरें 15 अगस्त 2025 से लागू हो जाएंगी। रेलवे की मानें तो इंजन की परिचालन लागत में समय के साथ लगातार वृद्धि हुई है – इसमें ईंधन, मेंटेनेंस, स्टाफ, स्पेयर पार्ट्स जैसी लागतें शामिल हैं। लेकिन इतने वर्षों से शुल्क स्थिर थे, जिससे रेलवे पर आर्थिक दबाव बढ़ रहा था। इसलिए यह बढ़ोतरी न सिर्फ तर्कसंगत है, बल्कि रेलवे की सेवा गुणवत्ता और इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर बनाए रखने में भी मदद करेगी।