एक बार फिर खबरें आईं कि राहुल गांधी कांग्रेस का नेतृत्व करने जा रहे हैं। वो 45 बरस के हैं और तकरीबन एक दशक से सक्रिय राजनीति में हैं। स्वाभाविक है कि उनके समर्थक चाहेंगे कि आधिकारिक रूप से वो इस ओहदे को संभालें।
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अभी तक ये साफ नहीं है कि क्यों उनकी मां सोनिया गांधी उनके लिए रास्ता नहीं छोड़ रही हैं। दो बातें हैं जिन्हें बदलाव की वजह के रूप में देखा जा रहा है। पहली, ये लाजमी है कि कभी न कभी बुजुर्ग को युवा के लिए जगह खाली करनी पड़ती है। देर-सबेर सोनिया को रिटायर होना ही है। दूसरी कम पारदर्शी वजह ये है कि सोनिया की तबीयत भी कुछ अच्छी नहीं रहती। पहले भी खबरें आती रही हैं कि सोनिया का किसी बीमारी के लिए विदेश में इलाज हुआ है।
हालांकि विस्तार से इस बारे में कुछ नहीं बताया गया, लेकिन स्थिति गंभीर थीं, तभी उन्हें इलाज के लिए विदेश जाना पड़ा। क्या ये बेटे को तरक्की देने की वजह हो सकती है?
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शायद नहीं, क्योंकि जब विदेश में उनका इलाज हुआ था तो ये कोई हाल-फिलहाल की बात नहीं है और मौजूदा परिस्थितियों में वो भली-चंगी दिखाई देती हैं। तब राहुल को तरक्की देने में जल्दबाजी क्यों?
एक वजह पार्टी का अंदरूनी दबाव हो सकता है। कांग्रेसी, जो तेजी से फिसलती जा रही पार्टी से भयभीत हैं, नेतृत्व में कुछ बदलाव देखना चाहते हैं। अगर कुछ बेहद कठोर और नाटकीय नहीं किया गया तो पार्टी दम तोड़ देगी।
कांग्रेस 200 सीटों से सिमटकर 45 के करीब आ गई है। जो 150 कांग्रेसी महिला और पुरुष लोकसभा चुनावों में पराजित हुए, उन्होंने चुनाव में करोड़ों रुपए खर्च किए होंगे।
उनमें से कई ने अपनी जिंदगी के कई दशक पार्टी को दिए हैं। उनका बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ है और पार्टी की बर्बादी का मतलब है उनके निवेश और भविष्य की बर्बादी। उनमें से कई चिंतित होंगे और पार्टी नेतृत्व को लेकर स्पष्टता चाहते होंगे।
केंद्र के बाद अब लगभग सभी बड़े राज्यों में सत्ता गंवाने का मतलब है कि पार्टी धन जुटाने के लिए संघर्ष कर रही है। नेतृत्व में तत्काल बदलाव की ये भी एक वजह है।
सवाल ये है कि क्या इस तरह के बदलाव से कांग्रेस को फायदा होगा। पार्टी का नेतृत्व करने का सोनिया गांधी का रिकॉर्ड वास्तव में अच्छा रहा है। उन्होंने तब पार्टी की बागडोर संभाली थी जब हालात लगभग ऐसे ही थे।
कांग्रेस कई घोटालों के आरोपों का सामना कर रही थी। उसके पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव भी आरोपों से घिरे थे और अदालत ने उन्हें पेश होने का हुक्म दिया था।
इसी दौरान भारतीय जनता पार्टी तेजी से सत्ता की सीढ़ियां चढ़ रही थी। इसके करिश्माई नेता अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे। ये वो दौर था जब बीजेपी का दबदबा था और कांग्रेस पिछले पांव पर थी। इन्हीं हालात में सोनिया ने पार्टी की कमान संभाली। उन्होंने न केवल पार्टी को उभारा, बल्कि 2004 में फिर से उसे सत्ता में भी पहुंचा दिया।
अच्छी विकास ग्रोथ और सूचना के अधिकार जैसे कुछ दमदार कानूनों के बूते कांग्रेस 2009 में दोबारा सत्ता में आई। इस तरह नेतृत्व के मामले में सोनिया का रिकॉर्ड अच्छा रहा है। हालाकि उनके नेतृत्व में पार्टी पिछले चुनाव में बुरी तरह परास्त हुई, लेकिन वो जानती हैं और उन्हें अनुभव है कि घायल कांग्रेस की सेहत सुधारने के लिए किस चीज की जरूरत होगी।
क्या राहुल के पास ये सब कुछ है? नहीं।
मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल में राहुल के पक्ष में आवाजें उठनी शुरू हुई थीं। पार्टी के उपाध्यक्ष पद पर उनकी तरक्की ने उनका भविष्य बता दिया था। कारण चाहे जो भी हों, लेकिन वो अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सके हैं। कई राज्यों में कांग्रेस की शिकस्त हुई है और 2014 में जब उन्होंने नेता के रूप में अभियान शुरू किया तो उन्हें बुरी शिकस्त झेलनी पड़ी।
कई लोगों को लगता है कि उनमें ऊर्जा और जोश की कमी है। वो नरेंद्र मोदी से तकरीबन 20 साल छोटे हैं। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी के साथ तुलना से लगभग बाहर हैं।
सोनिया अभी 70 साल की नहीं हुई हैं। वो फिट हैं और ये मानते हुए कि सेहत को लेकर उन्हें कोई गंभीर समस्या नहीं है तो उनके अगले कुछ सालों तक सक्रिय रहने की संभावना है।
यही नहीं, विश्वसनीयता के मामले में भी वो राहुल से कहीं आगे हैं।
अपने मोटे उच्चारण के बावजूद जब भी किसी गंभीर मसले पर वो बयान देती हैं, तो वो राहुल के दिए बयान के मुकाबले ज्यादा तवज्जो हासिल करता है।
1980 के दशक के आखिरी में जब राहुल के पिता संघर्ष कर रहे थे, तब अरुण शौरी बड़ौदा में हमारे कॉलेज में आए थे और भाजपा और वीपी सिंह के साथ गठबंधन के बारे में बोल रहे थे, उन्होंने कहा था कि जब किसी के घर में आग लगी हो तो आग बुझाने के लिए गंगा की तरफ नहीं देखना चाहिए।
तभी एक छात्र उठ खड़ा हुआ और शौरी से बोला कि किसी को आग में पेट्रोल भी नहीं फेंकना चाहिए। मुझे भी ऐसा ही लगता है कि आग की लपटों से घिरी कांग्रेस के लिए राहुल गांधी को अभी लाना आग पर पेट्रोल फेंकने जैसा होगा।
सोनिया को नेतृत्व करते रहना चाहिए। उनके बेटे को शायद ये अच्छा न लगे, लेकिन पार्टी के बारे में उन्हें पहले सोचना होगा।