राजनीतिक जानकारों के मुताबिक भाजपा ने सत्ता में आने से पहले 'कांग्रेस मुक्त भारत' का नारा दिया था। पार्टी 2019 में जब दूसरी बार सत्ता में आई तो इसके नेताओं ने उस नारे पर अधिक आक्रामता के साथ काम करना शुरू कर दिया। हालात ऐसे हैं कि केंद्र सरकार के किसी बयान पर राहुल गांधी कोई टिप्पणी कर देते हैं तो भाजपा के तमाम बड़े नेता सोशल मीडिया में अपना गुस्सा निकालने लगते हैं। पार्टी का आईटी सेल इस तरह से राहुल गांधी के बयानों की काट निकालता है कि सामने वाला कुछ सोचने पर मजबूर हो जाता है। भाजपा के नेता, चीन या पाकिस्तान की किसी बात का उतना बुरा नहीं मानते, जितना राहुल गांधी के किसी बयान पर वे कठोर प्रतिक्रिया देने के लिए टूट पड़ते हैं। दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी के भीतर ही ऐसा कुछ चल रहा है कि उसके अपने ही नेता पार्टी के फैसलों पर सवाल खड़ा कर रहे हैं। सभी जानते हैं 'ग्रुप 23' क्यों बनाया गया है। पार्टी अध्यक्ष पद के चुनाव की मियाद 30 जून तक थी, लेकिन कोविड-19 संकट के बीच उसे अनिश्चितकाल के लिए टाल दिया गया। कांग्रेस कार्य समिति ने भी चुनाव टालने के फैसले पर अपनी मुहर लगा दी।
प्रोफेसर डॉ. आनंद कुमार कहते हैं, नेतृत्व परिवर्तन की चाहत रखने वाले कांग्रेस के 23 नेताओं के समूह ने कहा था, हम कोई बगावत की बात नहीं कर रहे हैं। हमारा कहना है कि पार्टी में एक पूर्णकालिक नेतृत्व हो। 'हमें एक निर्वाचित कांग्रेस कार्य समिति की तत्काल जरूरत है, न कि मौजूदा समिति की भांति नामित समिति की। इन नेताओं का कहना था कि हम नेतृत्व परिवर्तन की बात नहीं कर रहे हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद पार्टी बुरी स्थिति की तरफ जा रही है। पिछले दिनों पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के परिणामों ने तो कांग्रेस नेताओं को इस उलझन में डाल दिया कि वे अपने अस्तित्व को लेकर सोचने लगे हैं। पश्चिम बंगाल के चुनाव प्रचार से राहुल गांधी वापस आ जाते हैं। बाकी के राज्यों में भी ऐसा कुछ ताबड़तोड़ नहीं देखने को मिला। ये तो तब रहा, जब भाजपा ने जीत के लिए पूरा जोर लगा रखा था। राहुल गांधी को अब सोचना नहीं है, बल्कि करना होगा। वे समझ लें कि नेहरू इंदिरा की विरासत लंबे समय तक साथ नहीं रहेगी। वह लोगों को यह याद दिलाने के लिए तो मदद कर सकती है कि राहुल कौन हैं, लेकिन वोट और सत्ता प्राप्ति के लिए राहुल गांधी को ही आगे बढ़ना पड़ेगा। पार्टी का ठोस आधार बनाना होगा।
कांग्रेस पार्टी के लिए दिक्कत ये भी है कि वह भाजपा या दूसरे दलों की तरह धर्म, भाषा या क्षेत्र के दायरे में नहीं बंधी है। इसके पास आज चमत्कारी नेता भी नहीं हैं। खासतौर से जनाधार वाले नेताओं की कमी हो गई है। प्रो. आनंद कुमार बताते हैं, अगर किसी पार्टी के पास कद्दावर नेता है और संगठन कमजोर है तो वह अपनी पार्टी को आगे निकाल सकता है। किसी पार्टी के पास ऐसा चमत्कारिक नेता नहीं है, लेकिन संगठन मजबूत है तो भी काम चल सकता है।
अगर नेता और संगठन, दोनों ही कमजोर हैं तो उस पार्टी को कोई नहीं बचा सकता। आज कांग्रेस पार्टी के साथ यही सब हो रहा है। कांग्रेस पार्टी की युवा इकाई, महिला विंग, किसान व मजदूर इकाई, कांग्रेस सेवा दल, ये सब कहां हैं। लोग इन्हें भूलने लगे हैं। राजनीति में आर्थिक पूंजी से बड़ी जनता की पूंजी होती है। अगर पार्टी और नेता के नाम पर लोग जुटते हैं, भरोसा करते हैं तो वे चुनाव जीत जाते हैं। राहुल गांधी को खुद आगे आना पड़ेगा। सबसे पहले अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को यह बताना होगा कि अब आगे की राह ऐसी होगी। अगर सोनिया गांधी ये तय नहीं कर पाती हैं कि राहुल और प्रियंका गांधी में से किसका वजन कम या ज्यादा रहेगा तो तब तक कांग्रेस पार्टी का कार्यकर्ता भी आगे नहीं बढ़ सकेगा।