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उपसभापति चुनाव: शाह मोदी जीते, राहुल गांधी के सूझबूझ की हार

Fri, 10 Aug 2018 05:36 AM IST
शशिधर पाठक, नई दिल्ली
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने राज्यसभा की कमजोर पिच पर जोरदार स्क्रिप्ट लिख दी। यह शाह का उपसभापति चुनाव में धीरे से जोर का झटका था। इस झटके को कांग्रेस अब न तो उगल पा रही है और न ही निगल पा रही है। उसके उपसभापति के प्रत्याशी बीके हरिप्रसाद के पास भी कहने के लिए कुछ नहीं है। उनके चेहरे पर पार्टी के शहीद सिपाही की झलक साफ नजर आ रही है। वहीं संसदीय राजनीति में दशकों से जमे जमाए रणनीतिकारों ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के सूझ-बूझ की हार को चुपचाप अंजाम तक पहुंचा दिया।

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कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने माना कि उपसभापति के चुनाव की प्रक्रिया में पार्टी चूक गई। उसके राजनीति में चाणक्य कहे जाने वाले नेता इस अग्निपरीक्षा में अपने ही अध्यक्ष को पहला बड़ा झटका दे बैठे हैं। 

दरअसल, कांग्रेस की अगुवाई वाला विपक्ष लगातार राज्यसभा में उपसभापति पद के चुनाव के लिए अपनी पहल कर रहा था। सत्ता पक्ष इसको लेकर बैकफुट पर था। कुछ बिलों को मंजूरी दिलाने और सदन का कामकाज सुचारु रुप से चलने के बहाने सत्ता पक्ष ने विपक्ष की इस मांग को मान लिया। 
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उपराष्ट्रपति ने इस पद के लिए चुनाव की तारीख का ऐलान भी कर दिया। इसके बाद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की अगुवाई और प्रधानमंत्री के दिशा निर्देशों के अनुरुप सरकार के रणनीतिकारों ने नई स्क्रिप्ट पर काम शुरू कर दिया। लोकलेखा समिति की सदस्यता के लिए हुए चुनाव में हारे हरिबंश नारायण सिंह को मंगलवार को ही प्रत्याशी बनाने की तैयारी होने लगी। वहीं विपक्ष अपने ही बिछाए जाल में उलझता चला गया।

कांग्रेस जीत सकती थी बाजी

कांग्रेस और कांग्रेस अध्यक्ष लगातार विपक्षी दलों की एकता का दावा कर रहे हैं, लेकिन यह केवल दावा है। इस दावे के पीछे रणनीतिकारों (गुलाम नबी आजाद, आनंद शर्मा, अहमद पटेल, अंबिका सोनी) की बड़ी चूक है। इसका नतीजा यह है कि विपक्ष मोदी सरकार को 2019 में भले ही हराने की रणनीति पर काम कर रहा हो लेकिन उपसभापति के चुनाव में सीधे तौर पर कांग्रेस हार चुकी है। यह हार विपक्षी एकता में सेंध के कारण है। 

बीके हरिप्रसाद भी मानते हैं कि उन्हें जितने वोट मिलने चाहिए थे, नहीं मिल पाए। कई सहयोगी दलों के साथियों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया। यह बात अलग है कि कांग्रेस के नेता अपनी कमियां छिपाने के लिए इसे जीत और चुनाव वाले दार्शनिक अंदाज में प्रस्तुत कर रहे हैं। 

कांग्रेस पार्टी के कई नेता इस पूरे डेवलपमेंट से सहमत नहीं हैं। उनका मानना है कि पार्टी ने उपसभापति के चुनाव की तैयारी को बहुत हल्के में लिया। शायद इसकी एक बड़ी वजह पार्टी के भीतर नेताओं का अति आत्मविश्वास रहा हो। 

सूत्र बताते हैं जद(बीजू) के नवीन पटनायक, कांग्रेस(वाईएसआर), पीडीपी, आम आदमी पार्टी से इस मुद्दे पर चर्चा की सकारात्मक तरीके से पहल होनी चाहिए थी। एनसीपी के प्रमुख शरद पवार ने जद(बीजू) के समर्थन देने में आनाकानी करने पर वंदना चह्वाण की उपसभापति के लिए दावेदारी को वापस ले लिया था।

पवार राजनीति के धुरंधर हैं। वह समय को देख रहे थे। इसलिए एनसीपी के नाम पर कोई नकारात्मक संदेश नहीं झेलना चाह रहे थे। इसके बाद भी कांग्रेस के रणनीतिकारों ने कई बैठकें की और अंत में अपने ही हाथ जला बैठे।
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एक अवसर गंवाया

कांग्रेस के पास उपसभा पति चुनाव में आम सहमति से प्रत्याशी चुनने का आखिरी समय तक विकल्प था। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता का कहना है कि पार्टी के रणनीतिकार पहले विपक्ष के किसी प्रत्याशी को लेकर सत्ता पक्ष पर आम सहमति से चुने जाने का दबाव बनाते और बात न बनने पर आम सहमति का स्वरुप देकर विपक्ष समेत कांग्रेस अध्यक्ष की छवि निखार सकते थे। 

सूत्र का कहना है कि राजनीति में संभावना का अंत नहीं होता, लेकिन ऐसा साफ आभास हो रहा है कि कांग्रेसी रणनीतिकार अपनी गीली जमीन का अंदाजा ही नहीं लगा पाए। यही वजह रही कि उपसभापति का चुनाव भी सत्ता पक्ष और विपक्ष की नाक का सवाल बन गया।

मोदी-शाह ने जीती बाजी

स्क्रिप्ट के अनुसार भाजपा अध्यक्ष की रणनीति के तहत हरिबंश नारायण सिंह ने उपसभापति के लिए अपनी दावेदारी पेश की और शानदार तरीके से चुनाव जीत गए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी खुद सदन में आए। उन्होंने अपना भाषण भी दिया। सत्ता पक्ष के चेहरे जहां खिले नजर आए, वहीं विपक्ष ने इस नतीजे को हारे हुए जुआरी की तरह इसे स्वीकार कर लिया। जबकि इससे पहले पीएसी के लिए हुए चुनाव में विपक्ष के साझा उम्मीदवार टीडीपी के रमेश जीत गए थे। हरिबंश नारायण सिंह को वहां हार का समना करना पड़ा था। विपक्ष के एक नेता का भी मानना है कि सही उम्मीदवार का चयन करके विपक्ष इस बाजी को भी जीत सकता था।
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