पूरी नई टीम और सियासी लाव लश्कर के साथ सक्रिय राजनीति में प्रियंका गांधी को उतारने के चक्कर में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद पर राजबब्बर की ताजपोशी का ऐलान करीब 20 दिन देर से हुआ। विदेश जाने से पहले ही सोनिया गांधी, प्रियंका गांधी से बातचीत कर राहुल गांधी ने राज बब्बर के नाम पर मुहर लगा दी थी।
राज बब्बर से पहले शीला दीक्षित, संजय सिंह, राजाराम पाल, राजेश मिश्रा के नामों पर भी गंभीरता से विचार हुआ, लेकिन साफ सुथरी छवि और गुटबाजी से परे होना राज बब्बर के लिए फायदेमंद रहा।
प्रियंका को मैदान में उतारने पर अभी अंतिम फैसला न होने की वजह से कांग्रेस को आधी अधूरी टीम का ही ऐलान करना पड़ा। कांग्रेस रणनीतिकार प्रशांत किशोर कम से कम प्रदेश अध्यक्ष की घोषणा जल्दी से जल्दी करने का आग्रह लगातार कर रहे थे।
कांग्रेस के एक बड़े नेता के मुताबिक योजना यह थी कि प्रियंका के साथ मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार के रूप में शीला दीक्षित, चुनाव प्रचार अभियान समिति के अध्यक्ष के रूप में डा. संजय सिंह, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में राज बब्बर, और कुछ अन्य पदाधिकारियों के नामों की घोषणा एक साथ की जानी थी।
तो इन कारणों से मिली राज बब्बर को यूपी की कमान
बताया जाता है कि उत्तर प्रदेश को लेकर मार्च से ही कांग्रेस नेतृत्व में जबर्दस्त मंथन चला। पार्टी में ब्राह्मण, राजपूत और मुस्लिम जनाधार को साधने के लिए कई फार्मूले बने। एक फार्मूला बना कि शीला दीक्षित को कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष बनाकर संदेश दिया जाए।
लेकिन 15 साल से उनके उत्तर प्रदेश से बाहर रहने और उम्र के तकाजे ने इसे सिरे नहीं चढ़ने दिया। तब अमेठी के राजा और राजीव गांधी व संजय गांधी के पुराने साथी डा. संजय सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बनाने की चर्चा हुई।
लेकिन इस पर भी कई किंतु परंतु लग गए। तब अति पिछड़ा वर्ग से पूर्व सांसद राजाराम पाल को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर भाजपा की पिछड़े वर्ग की रणनीति को मात देने और ब्राह्मण चेहरे के रूप में शीला दीक्षित को उतारने का फार्मूला बना।
लेकिन पाल के गैर कांग्रेसी अतीत और संगठन पर उनकी कमजोर पकड़ इसमें आड़े आ गई। ब्राह्मण नेताओं में प्रमोद तिवारी, जितिन प्रसाद, राजेश मिश्रा, राजेश पति त्रिपाठी के भी नाम चले। तिवारी की मुलायम सिंह से अति निकटता, जितिन प्रसाद की अनिच्छा और राजेश पति त्रिपाठी की निष्क्रियता आड़े आ गई।
राजेश मिश्रा को लेकर खासी चर्चा हुई और एक तर्क यह भी दिया गया कि उन्हें प्रदेश अध्यक्ष बनाकर भाजपा को चुनौती भरा संदेश दिया जा सकता है, क्योंकि मिश्रा वाराणसी के ही पूर्व सांसद हैं। लेकिन पार्टी की गुटबाजी उनके रास्ते की भी बाधा बन गई।
इसके बाद प्रशांत किशोर ने राज बब्बर का नाम सुझाया। इस नाम पर सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी तीनों ने सहमति दे दी। गुलाम नबी आजाद भी राजी हो गए। क्योंकि पूरे उत्तर प्रदेश में राज बब्बर की पहचान और सियासी सक्रियता, 2009 में फिरोजाबाद से मुलायम सिंह यादव की बहू डिंपल यादव को चुनावी शिकस्त और साफ सुथरी छवि व गुटबाजी से ऊपर होना राज बब्बर के पक्ष में गया।