राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी के नये निर्विरोध अध्यक्ष चुन लिए गए हैं। पार्टी के चुनाव प्राधिकरण के रिटर्निंग ऑफिसर मुलापल्ली रामचंद्रन ने बताया कि कांग्रेस अध्यक्ष पद के नामांकन कर चुके राहुल गांधी के समर्थन में 89 नामांकन प्रस्ताव आए थे और सभी वैध पाए गए।
एम रामचंद्रन के अनुसार नामांकन वापस लेने की प्रक्रिया बीत चुकी है। इस तरह से मैं राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष पद चुने जाने की घोषणा करता हूं। इसके साथ कांग्रेस मुख्यालय 24 अकबर रोड पर जश्न का दौर शुरू हो गया।
पार्टी मुख्यालय से लेकर देश के कई हिस्सों से आतिशबाजी की खबर है। 24, अकबर रोड पर एक सदस्य हवन पूजा भी करते नजर आए। पार्टी के तमाम वरिष्ठ नेताओं ने बधाई देने का सिलसिला तेज कर दिया है।
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16 दिसंबर को संभालेंगे कमान
संसद का शीतकालीन सत्र आरंभ हो चुका होगा। गुजरात विधानसभा चुनाव के नतीजे आने में दो दिन शेष रह जाएंगे। दोनों के बीच में 16 दिसंबर को राहुल गांधी अध्यक्ष पद की कमान संभालेंगे।
अध्यक्ष पद की कमान संभालने के साथ राहुल पर संगठन में बदलाव, संसद के शीतकालीन सत्र में केन्द्र सरकार का घेराव, सशक्त विपक्ष की धारदार भूमिका और 18 दिसंबर को चुनाव आयोग द्वारा गुजरात विधानसभा चुनाव के नतीजों की होने वाली घोषणा के बाद उत्पन्न होने वाली राजनीतिक स्थिति से निबटने की तात्कालिक चुनौती होगी।
फूल और कांटे दोनों है राहुल के लिए
कांग्रेस का अध्यक्ष पद राहुल गांधी के लिए फूल और कांटे दोनों लेकर आएगा। गुजरात चुनाव में कदाचित निर्णय उलट या संतोषजनक नहीं आते तो यह नये कांग्रेस अध्यक्ष के लिए सिर मुड़ाते ही ओले पड़ने वाली बात होगी। क्योंकि इसका सीधा असर संसद के शीतकालीन सत्र, अगले साल पेश होने वाले बजट सत्र, कर्नाटक विधानसभा चुनाव पर सीधे तौर पर पड़ेगा। ऐसी स्थिति में पार्टी के भीतर भी उन्हें कुछ संक्षिप्त चुनौती का सामना करना पड़ सकता है।
कांटे
अगला साल चुनाव और चुनौतियों का है। मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ का चुनाव 2019 में प्रस्तावित लोकसभा चुनाव के सेमीफाइनल जैसा है। ऐसे में दिसंबर 2017 से ही राहुल गांधी की अग्निपरीक्षा शुरू हो जाएगी। उनके पास खुद को साबित करने के लिए बेहद कम समय है। 2019 तक उन्हें काफी कुछ साबित कर देना है। अभी वह पार्टी में निर्विरोध चुने जाने के बाद वह सर्व स्वीकार छवि पा गए हैं, लेकिन इसी छवि को आगे स्थापित करना बाकी है। युवाओं को पार्टी से जोड़ना है।
वरिष्ठों की न्यूनतम नाराजगी के साथ कांग्रेस के संगठन में जान डालनी है। राज्य से लेकर जिला ईकाईयों को संतुलत बदलाव के जरिए युवा बनाना है। कांग्रेस सेवा दल जैसे अपने मृत से संगठन को पुन: जीवित करना है। एक तरह से पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक प्रक्रिया की स्थापना को मजबूत बनाना है। राहुल को यह सब तब करना है, जब उनके सामने अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जैसी भाजपा की अनुभवी, तिकड़मी, राजनीतिक दांव पेंच में पारंगत शख्सियत मुकाबले खड़ी है। 18 राज्यों में भाजपा की सरकार है। सत्ता पक्ष हर मामले में काफी बेहतर स्थिति में है।
फूल
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता घटी है। केन्द्र सरकार ने नोटबंदी के बाद जीएसटी लागू करने का फैसला किया और उसे जनता की भारी नाराजगी झेलनी पड़ रही है। रोजगार, आर्थिक विकास, शिक्षा जैसे तमाम मुद्दे चुनौती बन रहे हैं। इतना ही नहीं भाजपा और संघ के भीतर भी भाजपा अध्यक्ष तथा प्रधानमंत्री को लेकर सवाल बढ़ रहे हैं। भाजपा और संघ को आगे जनाधार घटने का खतरा सताना शुरू कर चुका है।
कांग्रेस पार्टी के सभी नेताओं ने राहुल गांधी को नेता तथा कांग्रेसियों को एकजुट रखने के रूप में स्वीकार कर लिया है। विपक्षी दलों में राहुल गांधी की स्वीकार्यता बढ़ी है। माकपा के सीताराम येचुरी, भाकपा के डी राजा, सपा के अखिलेश यादव, राजद के लालू प्रसाद यादव, जद(यू) के बागी नेता शरद यादव, तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी यहां तक कि शिवसेना ने भी राहुल गांधी की न केवल तारीफ की है, बल्कि उनके नेतृत्व को स्वीकार किया है।
क्या करेंगी सोनिया
राजनीति का लोहा मनवाने में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी का जवाब नहीं है। क्रमवार सोनिया ने हर गोट फिट की है। खराब स्वास्थ्य का हवाला देते हुए क्रमवार उन्होंने राहुल गांधी को आगे किया। आगे ही नहीं किया, उनके सामने की हर मुसीबत दूर करने में चट्टान की तरह खड़ी रही।
समझा जा रहा है कि वह राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने के बाद वह बेटी प्रियंका गांधी वाड्रा के साथ उनकी मुख्य सलाहकार मंडली की भूमिका में होंगी। इसके लिए कांग्रेस अध्यक्ष की अध्यक्षता में एक टीम का गठन हो सकता है और इसमें प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जैसे तमाम वरिष्ठ नेता शामिल रहकर राहुल गांधी को राजकाज चलाने में मदद करेंगे। पार्टी का लोकतांत्रिक चेहरा बनेंगे।