राहुल गांधी पांच साल बाद एक बार फिर ‘किसान एक्सप्रेस’ दौड़ाने आ रहे हैं। बस इस बार कुछ मुद्दे बदले हैं और उनकी इस ‘किसान एक्सप्रेस’ का नाम बदला है। मगर प्रयास वही किसानों की हमदर्दी बटोरने का है। हालांकि राहुल गांधी के रोड शो, खाट पंचायत और यात्राओं में भीड़ जुट रही है। लोग कांग्रेस के प्रति आकर्षित होते दिख रहे हैं।
मगर यह भविष्य के गर्त में है कि क्या पिछली बार की तरह इस बार यह भीड़ वोट में तब्दील हो पाएगी या नहीं? हां, इस बार एक खास बात भी दिखाई दे रही है। इस दौरे में टीम राहुल का मैनेजमेंट दूर दूर तक नहीं, बल्कि टीम पीके और टीम कांग्रेस ही दिखाई दे रही है।
यमुना एक्सप्रेस-वे निर्माण के समय यमुना पट्टी के गांव टप्पल व भट्टा पारसौल पर हुए आंदोलनों के बाद 2010 में राहुल गांधी ने अपनी कोर टीम के साथ किसान पदयात्रा कर लोगों को खुद से जोड़ने का आह्वान किया। भूमि अधिग्रहण बिल पर लोगों की राय जानी और अलीगढ़ में किसान महापंचायत कर उनकी कुछ अन्य समस्याओं से भी रू-ब-रू हुए। हालांकि उनके वायदे के अनुसार यूपीए सरकार ने भूमि अधिग्रहण बिल को संशोधित भी किया।
मगर चुनाव के समय में राहुल के चेहरे का लाभ कांग्रेस न ले सकी। न तो किसानों ने 2012 के विधानसभा चुनाव में कोई लाभ दिया और न 2014 के लोक सभा चुनाव में किसान कांग्रेस के साथ खड़ा दिखा।
अब एक बार फिर रोजाना तकरीबन चार किमी की जांगिग करने वाले राहुल गांधी ने रैली, रोड शो व पद यात्रा के जरिये लखनऊ के जरिये दिल्ली की दूरी तय करने की कवायद में हैं।
27 साल यूपी बेहाल यात्रा से टीम राहुल दूर
राहुल गांधी
- फोटो : Getty Images
फंडा बिल्कुल क्लियर है किसान राजनीति, क्योंकि आज भी किसान केवल किसान होता है और उसकी समस्याएं पूरे देश में एक जैसी ही हैं। किसानों के मुद्दे पर जाति, धर्म और वर्ग की राजनीति कुछ हद तक फीकी पड़ जाती है।
किसान राजनीति के इस बाण को तरकस से निकालने वाली कांग्रेस भलीभांति जानती है कि वर्तमान परिस्थितियों में यूपी के किसानों के कर्ज से बड़ा और कोई मंत्र नहीं, जो विपक्षियों को परास्त कर दे। खुद उनकी सरकार में भी किसानों का बड़ा कर्ज माफ किया गया था। उसी मुद्दे को लेकर वह किसानों के बीच और प्रदेश की बेहाल कानून व्यवस्था व विकास व्यवस्था को लेकर शहरी मतदाताओं के बीच जा रहे हैं।
इस बार भी लोग कह रहे हैं कि पहले भी राहुल भइया उनका दर्द जानते रहे। लोग उनसे जुड़ भी रहे हैं। मगर ऊंट किस करवट बैठेगा यह भविष्य तय करेगा।
27 साल यूपी बेहाल यात्रा से टीम राहुल दूर
27 साल यूपी बेहाल संदेश यात्रा लेकर चल रही टीम पीके व टीम कांग्रेस के साथ राहुल गांधी तो दिखाई दे रहे हैं। मगर इस बार टीम राहुल दूर है। इसे लेकर खुद कांग्रेसियों में चर्चा है। मैनेजमेंट में भी काफी अंतर है। टीम पीके ही मैनेजमेंट तय कर रही है।
--यह भी जानो--
1. 2014 के लोकसभा चुनाव में पश्चिमी यूपी की अधिकांश सीटों पर कांग्रेस की चौथी पोजीशन रही।
2. 2010-11 में राहुल की किसान पद यात्रा भी कांग्रेस के लिए नहीं दिखाई पाई थी कोई खास चमत्कार।
3. 2012 में पश्चिमी यूपी में महज दो कांग्रेसी विधायक पंकज मलिक और प्रदीप माथुर को मिली है जीत।
4. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के वर्तमान में कुल 2 सांसद और कुल 28 विधायक हैं, कुछ ने पार्टी भी छोड़ी है।