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राफेल : सुप्रीम कोर्ट के आदेश में हैं टाइपो? जानें क्यों 126 की जगह खरीदे गए 36 विमान

Sat, 15 Dec 2018 10:38 AM IST
Sneha Baluni न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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राफेल विमान
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उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को बताया कि कैसे यूपीए शासनकाल में तय हुए 126 विमानों के सौदे को 36 में तब्दील किया गया। यूपीए सरकार के सौदे के अनुसार 18 विमान उड़कर आने थे जबकि बचे हुए 108 विमानों का निर्माण भारतीय एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) के लाइसेंस के अतंर्गत बनने थे। मगर एनडीए सरकार में यह सौदा फुली लोडेड 36 विमानों मे बदल गया। जिसमें ऑफसेट पार्टनर के तौर पर रिलायंस एयरोस्ट्रक्चर लिमिटेड को चुना गया।

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रक्षा अधिग्रहण परिषद (डीएसी) ने 29 जून 2007 में 126 मीडियम मल्टीरोल कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एमएमआरसीए) के अधिग्रहण की जरूरत को मंजूरी दी थी। जिसमें 18 विमान (सिंगल स्कवाड्रन) को असल निर्माता से अधिग्रहित किया जाएगा जबकि 108 का निर्माण लाइसेंस के तहत एचएएल सौदे पर हस्ताक्षर होने की तारीख से 11 सालों में करेगा। 6 विक्रेताओं ने अप्रैल 2008 में प्रस्ताव प्रस्तुत किए थे और इसमें तकनीकी और क्षेत्र मूल्यांकन शामिल था।

नवंबर 2011 में सार्वजनिक बोली शुरू हुई और जनवरी 2012 में दसॉल्ट एविएशन को सबसे कम बोली लगाने वाला चुना गया। उच्चतम न्यायालय ने कहा, 'इसके बाद बातचीत शुरू हुई जिसके बाद यह बिना अंतिम परिणाम के लगातार जारी रही। इसी समय केंद्र में 2014 में सरकार बदल गई।' केंद्र सरकार ने न्यायालय को बताया एचएएचल को 2.7 फ्रांस की बजाए राफेल लड़ाकू विमान बनाने में अत्यधिक समय लगता। इसके बाद एचएएल द्वारा दसॉल्ट के कांट्रैक्ट पर 108 विमानों के निर्माण का मुद्दा तीन सालों तक अनसुलझा ही रहा। 
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उच्चतम न्यायालय ने कहा, 'इस देरी की वजह से राफेल के अधिग्रहण की लागत प्रभावित हुई क्योंकि सौदा इन-बिल्ट एस्केलेशन (देरी होने पर कीमत में वृद्धि) का था। इस बीच यूरो-रुपये एक्सचेंज ने भी सौदे पर असर डाला। जिसकी वजह से मार्च 2015 में खरीद के लिए अनुरोध (आरपीएफ) को वापस लेने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई थी।'

10 अप्रैल, 2015 को भारत-फ्रांस ने एक संयुक्त बयान जारी किया जिसके अनुसार उड़ने की हालत में 36 विमानों को अंतर सरकारी समझौते के तहत अधिग्रहित किया जाएगा। इस समझौते को डीएसी ने मंजूरी दे दी। इसी बीच 126 विमानों के आरपीएफ को जून 2015 में पूरी तरह से वापस ले लिया गया था। सौदे को लेकर बातचीत हुई और अंतर-मंत्रालयी परामर्श के बाद प्रक्रिया पूरी हो गई। इसे कैबिनेट की सुरक्षा समिति ने हरी झंडी दे दी। 23 सितंबर, 2016 को जो समझौता हुआ उसके अनुसार केवल विमान के साथ हथियार, तकनीकी समझौते और ऑफसेट कांट्रैक्टर पर भी हस्ताक्षर किए गए हैं। यह विमान अक्तूबर 2019 में भारत को मिलने शुरू हो जाएंगे।

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उच्चतम न्यायालय के आदेश में है टाइपो?

उच्चतम न्यायालय के पेज नंबर 21 में अदालत का कहना है कि सरकार ने भारत नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) के साथ राफेल की कीमतों का विवरण साझा किया है। कैग अपनी पहले ही अपनी रिपोर्ट को अंतिम रूप दे चुकी है। इस रिपोर्ट को संसद की लोक लेखा समिति (पीएसी) के साथ साझा किया जा चुका है। अपने फैसले में न्यायायल ने कहा है, 'कीमत से जुड़े विवरण कैग से साझा किए जा चुके हैं और उसकी रिपोर्ट की जांच-परख पीएसी कर चुकी है।' 

वहीं कैग और पीएसी से जुड़े सूत्रों का कहना है कि जांच-परख जारी रहने के कारण कैग ने राफेल सौदे को लेकर अपनी रिपोर्ट दाखिल नहीं किया है। न्यायिक प्रक्रियाओं की जानकारी रखने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि कोर्ट अपने फैसले में टाइपो संबंधी गलतियों का सुधार कर सकता है लेकिन शर्त यही है कि कोई न्यायालय के सामने इस बात को उठाए।
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