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Pune Porsche Case: शराब पीकर पोर्शे चलाने वाले नाबालिग को बालिग मानकर केस चलाने की मांग, JJB में बहस पूरी

Tue, 24 Jun 2025 10:37 AM IST
हिमांशु चंदेल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, पुणे

सार

पुणे पोर्शे हादसे में 17 वर्षीय आरोपी को बालिग मानकर मुकदमा चलाने की मांग पर सोमवार को किशोर न्याय बोर्ड यानी जेजेबी में सुनवाई हुई। अभियोजन पक्ष ने इसे जघन्य अपराध बताते हुए मांग की कि नाबालिग पर बालिग की तरह केस चले। वहीं, बचाव पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देकर इसका विरोध किया। हादसे में दो आईटी प्रोफेशनल्स की मौत हुई थी। 
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पुणे पोर्शे केस - फोटो : PTI
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विस्तार
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पुणे की बहुचर्चित पोर्शे केस में नया मोड़ आया है। मामले में अभियोजन पक्ष ने सोमवार को किशोर न्याय बोर्ड यानी जेजेबी से मांग की कि इस 17 साल के आरोपी को बालिग मानते हुए उसके खिलाफ सुनवाई हो। यह वही मामला है, जिसमें 19 मई 2023 को पुणे के कल्याणी नगर इलाके में तेज रफ्तार पोर्शे कार ने दो आईटी पेशेवरों को कुचल दिया था। हादसे के वक्त आरोपी नाबालिग शराब के नशे में था।
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इस घटना में बाइक सवार आईटी प्रोफेशनल्स अनीश अवधिया और उनकेदोस्त अश्विनी कोस्टा की मौत हो गई थी। यह मामला पूरे देश में सुर्खियों में रहा। हादसे के तुरंत बाद पुणे पुलिस ने आरोपी को बालिग मानते हुए मुकदमा चलाने की मांग करते हुए JJB में अर्जी दी थी। लेकिन बचाव पक्ष की ओर से बार-बार सुनवाई टालने की कोशिश की जाती रही।

जेजेबी की सुनावाई में क्या-क्या हुआ?
सोमवार को आखिरकार इस मामले में JJB में सुनवाई हुई। विशेष लोक अभियोजक शिशिर हिराय ने किशोर को बालिग मानकर सुनवाई की मांग करते हुए कहा कि उसने बेहद जघन्य अपराध किया है। हिराय ने तर्क दिया कि आरोपी को मालूम था कि शराब पीकर गाड़ी चलाना खतरनाक हो सकता है, बावजूद इसके उसने लापरवाही दिखाई। साथ ही हादसे के बाद सबूतों से छेड़छाड़ करने की भी कोशिश की गई।
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क्या बोले आरोपी के वकील?
वहीं, आरोपी के वकील प्रशांत पाटिल ने अभियोजन पक्ष की मांग का विरोध किया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के 'शिल्पा मित्तल बनाम राज्य' मामले का हवाला दिया। पाटिल ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी अपराध को जघन्य तभी माना जा सकता है, जब उसमें न्यूनतम सजा सात साल की हो। उन्होंने कहा कि इस मामले में कोई भी ऐसा प्रावधान नहीं है, जिसमें न्यूनतम सात साल की सजा हो। इसलिए अभियोजन की मांग कानूनी तौर पर टिकाऊ नहीं है।

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पाटिल ने बताया कि किशोर न्याय बोर्ड ने पहले ही इस मामले में प्रारंभिक जांच कर ली है, जिसमें यह नहीं पाया गया कि आरोपी को वयस्क मानना चाहिए। उन्होंने कहा कि बोर्ड के पास कानूनी तौर पर यह अधिकार है कि वह तय करे कि आरोपी को बालिग मानना है या नहीं।

कुछ घंटों बाद आरोपी को मिली थी जमानत
गौरतलब है कि इस मामले में आरोपी को हादसे के कुछ घंटों बाद ही जमानत मिल गई थी। जमानत की शर्तें भी काफी नरम थीं, जिसमें आरोपी को रोड सेफ्टी पर 300 शब्दों का निबंध लिखने के लिए कहा गया था। इसके बाद पूरे देश में बवाल मचा और आरोपी को पुणे के ऑब्जर्वेशन होम भेज दिया गया। हाल ही में बॉम्बे हाईकोर्ट ने आरोपी को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया, यह कहते हुए कि JJB का ऑब्जर्वेशन होम भेजने का आदेश कानूनी रूप से सही नहीं था और कानून का पालन पूरी तरह होना चाहिए।

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