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पुलवामा: भले ही जवानों की शहादत से देश की आंखें हैं नम, नहीं मिलेगा 'शहीद' का दर्जा

Fri, 15 Feb 2019 04:21 PM IST
अनिल पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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Pulwama Attack - फोटो : PTI
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जम्मू-कश्मीर में अब तक तक के सबसे घातक आतंकी हमले में सीआरपीएफ के 40 जवान शहीद हो गए और 5 से ज्यादा घायल हैं। जम्मू से श्रीनगर जा रहे सीआरपीएफ के काफिले में 78 वाहनों में 2547 जवान सवार थे। जम्मू- श्रीनगर नेशनल हाईवे पर अपराह्न सवा तीन बजे हमलावर ने विस्फोटक भरी कार से सीआरपीएफ काफिले की बस को टक्कर मार दी। धमाका इतना भयंकर था कि बस के परखच्चे उड़ गए। इसके बाद घात लगाए आतंकियों ने अंधाधुंध फायरिंग भी की।  इस आतंकी वारदात से पूरे देश में गुस्सा है। देशवासी शहीद सैनिकों के प्रति अपनी संवेदनाएं सोशल मीडिया के माध्यम से व्यक्त कर रहे हैं। लेकिन दुखद बात यह है कि इन सैनिकों को शहीद का दर्जा नहीं दिया जाएगा। 
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पाकिस्तान के आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने वीडियो जारी कर हमले की जिम्मेदारी ली और यह भी दावा किया कि इसे आदिल अहमद डार उर्फ वकास कमांडो ने अंजाम दिया। वह पुलवामा के गुंडी बाग से आतंकी नेटवर्क चलाता था। पुलवामा के काकापोर का रहने वाला डार 2018 में जैश में शामिल हुआ था। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने झांसी में विकास योजनाओं के उद्घाटन कार्यक्रम के दौरान कहा कि देश बहुत दुखी और उद्वेलित है। पुलवामा में हुए हमले से हर भारतीय आक्रोश में है, गुस्से में है। जवानों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा। 
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सुरक्षा बलों के जवानों के शहीद होने पर राजनीतिक दल सियासी बयानबाजी करते रहे हैं लेकिन मृतक जवानों के फायदे के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया। 

यह मुद्दे इसलिए मौजूं है क्योंकि इस हमले में सीआरपीएफ के जिन जवानों की मौत हुई है उनको शहीद का दर्जा नहीं दिया जाएगा। भले ही प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, वित्तमंत्री समेत तमाम नेताओं ने अपने संबोधन में इन जवानों को शहीद कहा हो, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में न तो इन जवानों को शहीद का दर्जा मिलेगा और ना ही इनके आश्रित परिवार वालों के लिए पेंशन की व्यवस्था सेना जैसी नहीं है। 

सेना बनाम सीएपीएफ

दरअसल केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सीएपीएफ) जिसमें सीआरपीएफ, बीएसएफ, आईटीबीपी या अन्य पैरामिलिट्री फोर्स आते हैं उनके जवान अगर ड्यूटी के दौरान मारे जाते हैं तो उनको शहीद का दर्जा नहीं मिलता है। वहीं थलसेना, नौसेना या वायुसेना के जवान की ड्यूटी के दौरान जान जाती है तो उन्हें शहीद का दर्जा मिलता है।

थलसेना, नौसेना या वायुसेना रक्षा मंत्रालय के अधीन काम करता है तो वहीं पैरामिलिट्री सीएपीएफ गृह मंत्रालय के तहत काम करता है। सेना को बाहरी खतरों से देश की रक्षा में सीमा पर तैनात किया जाता है। वहीं सीएपीएफ को आंतरिक सुरक्षा के लिए निपटने के लिए देश में तैनात किया जाता है।

सीमा पर गोली यदि सेना के जवान को लगती है और बीएसएफ के जवान को और दोनों की मौत होती है, तो भी शहीद का दर्जा सिर्फ सेना के जवान को मिलता है। पैरामिलिट्री का जवान अगर आतंकी या नक्सली हमले में मारा जाए तो इसे सिर्फ मौत माना जाता है।  उसे शहीद का दर्जा नहीं मिलता है। 
 
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सुविधाओं के नाम पर भी पैरामिलिट्री फोर्स से भेदभाव

पुलवामा में शहीद हुए जवानों का पार्थिव शरीर तिरंगे में लिपटा हुआ - फोटो : ANI

सीएपीएफ के जवानों के साथ सिर्फ शहादत के दर्जे में ही भेदभाव नहीं किया जाता बल्कि पेंशन, इलाज, कैंटीन जैसी जो सुविधाएं सेना के जवानों को मिलती है पैरामिलिट्री के जवान उसके हकदार नहीं माने जाते। 

शहीद जवान के परिवार वालों को राज्य सरकार में नौकरी में कोटा, शिक्षण संस्थान में उनके बच्चों के लिए सीटें आरक्षित होती हैं। वहीं पैरामिलिट्री के जवानों को ऐसी सुविधाएं नहीं मिलती हैं। 

सीएपीएफ जवानों को भी नहीं मिलती पेंशन

इतना ही नहीं पैरामिलिट्री के जवानों को पेंशन की सुविधा भी नहीं मिलती है। जब से सरकारी कर्मचारियों की पेंशन बंद हुई है, तब से सीएपीएफ के जवानों की भी पेंशन भी बंद कर दी गई। सेना इसके दायरे में नहीं है। 

कांग्रेस भी लंबे समय तक सत्ता में रह चुकी है और अब भाजपा की सरकार है। दोनों ही सरकारों ने सुरक्षा बलों के जवानों को लेकर बड़ी-बड़ी बातें जरूर करते हों, लेकिन असल में देश के इन वीरों के बलिदान को उचित सम्मान देने के लिए दोनों ने ही कोई ठोस कदम नहीं उठाया। 
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