फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Study: आसान कनेक्टिविटी के बिना अधूरी इलेक्ट्रिक वाहन नीति, अध्ययन ने खोली परिवहन व्यवस्था की परतें

Sun, 28 Jun 2026 04:52 AM IST
निर्मल कांत अमर उजाला नेटवर्क, नई दिल्ली।

सार

Study: भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा दिया जा रहा है। लेकिन एक नए अध्ययन में कहा गया है कि सिर्फ ईवी बढ़ाने से न तो ट्रैफिक जाम कम होगा और न ही प्रदूषण की समस्या पूरी तरह खत्म होगी। अध्ययन के अनुसार जब तक सार्वजनिक परिवहन, सुरक्षित पैदल ढांचा और अंतिम छोर तक कनेक्टिविटी मजबूत नहीं होगी, तब तक इलेक्ट्रिक वाहन भी अपेक्षित बदलाव नहीं ला पाएंगे। विस्तार से पढ़िए रिपोर्ट-
विज्ञापन
ईवी नहीं, सार्वजनिक परिवहन से घटेगा प्रदूषण - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

भारत में इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने की रफ्तार तेज हो रही है, लेकिन शहरी परिवहन व्यवस्था पर किए गए एक नए अध्ययन ने साफ संकेत दिया है कि केवल वाहनों के विद्युतीकरण से न तो ट्रैफिक जाम कम होंगे और न ही प्रदूषण की समस्या पूरी तरह हल होगी।
विज्ञापन


अध्ययन के मुताबिक अगर सार्वजनिक परिवहन, पैदल यात्रियों के लिए सुरक्षित बुनियादी ढांचा और अंतिम छोर तक कनेक्टिविटी मजबूत नहीं हुई तो इलेक्ट्रिक वाहन भी अपेक्षित बदलाव नहीं ला पाएंगे। यह निष्कर्ष जर्मन कॉर्पोरेशन फॉर इंटरनेशनल कोऑपरेशन (जीआईजेड) और नीति आयोग के संदर्भों के साथ द क्लाइमेट एजेंडा द्वारा पटना और लखनऊ में किए गए अध्ययन में सामने आया है। यह अध्ययन इंडिया डेवलपमेंट रिव्यू  में प्रकाशित किया गया है।भारत में ऊर्जा से जुड़े कुल कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन का करीब 14 प्रतिशत हिस्सा परिवहन क्षेत्र से आता है। परिवहन में इस्तेमाल होने वाली 95 प्रतिशत से अधिक ऊर्जा अब भी पेट्रोल और डीजल जैसे जीवाश्म ईंधनों पर आधारित है। पिछले तीन दशकों में इस क्षेत्र से उत्सर्जन लगातार बढ़ा है और आने वाले वर्षों में इसके और बढ़ने की आशंका जताई गई है। यही वजह है कि केंद्र और राज्य सरकारें इलेक्ट्रिक वाहनों तथा इलेक्ट्रिक बसों के विस्तार पर जोर दे रही हैं।

ये भी पढे़ं: Bengal Politics: शहीद दिवस रैली के आयोजन स्थल को लेकर ममता और बागी गुट आमने-सामने, पुलिस की अनुमति पर संशय
विज्ञापन
विज्ञापन


बस स्टॉप तक पहुंचना भी चुनौतीपूर्ण सफर
अध्ययन में सामने आया कि लखनऊ में 63% लोगों को सार्वजनिक परिवहन तक पहुंचने के लिए लगभग एक किमी पैदल चलना पड़ता है। कई लोगों के लिए यह दूरी दो से तीन किलोमीटर तक पहुंच जाती है। मजदूरों, घरेलू कामगारों यह अतिरिक्त दूरी रोजाना की मजबूरी बन चुकी है। यातायात की स्थिति भी चिंताजनक है। लखनऊ के कई प्रमुख मार्गों पर वाहनों की औसत गति घटकर केवल 11 से 14 किलोमीटर प्रति घंटा रह गई है। केवल आठ प्रतिशत लोगों ने माना कि शहर में पैदल चलने और साइकिल चलाने के लिए पर्याप्त बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध हैं।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें