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प्रदर्शन, गिरफ्तारी और लंबा इंतजार: जस्टिस भुइयां बोले- क्या विरोध करना अपराध? टिप्पणी पर छिड़ी बहस

Sun, 26 Jul 2026 06:36 AM IST
प्रशांत तिवारी अमर उजाला ब्यूरो

सार

सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्जल भुइयां ने देश में विरोध-प्रदर्शन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बढ़ते प्रतिबंधों को लेकर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने वाले छात्रों को जेल भेजा जा रहा है, जमानत में देरी हो रही है और अदालतों द्वारा लगाई जाने वाली कई शर्तें भी मौलिक अधिकारों को सीमित करती हैं।
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जस्टिस उज्जल भुइयां - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्जल भुइयां ने देश में विरोध-प्रदर्शन और असहमति जताने की घटती आजादी पर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि आज छात्रों को अपने अधिकारों के लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने पर जेल भेजा जा रहा है। कई मामलों में उन्हें 30 से 40 दिन तक जमानत भी नहीं मिलती।

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क्या लोकतंत्र में असहमति जताना अब अपराध माना जा रहा है?
उन्होंने कहा कि बहस और असहमति लोकतंत्र की आत्मा हैं, लेकिन आज सामान्य विरोध-प्रदर्शन को भी अपराध की तरह देखा जा रहा है। उन्होंने कहा कि अपनी बात रखने और शांतिपूर्वक प्रदर्शन करने का अधिकार संविधान से मिला मौलिक अधिकार है। पर्यावरण जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर आवाज उठाने वाले लोगों के साथ भी अपराधियों जैसा व्यवहार किया जाता है। छात्रों को गिरफ्तार कर लिया जाता है, उन्हें निलंबित कर दिया जाता है और फिर उन्हें राहत के लिए अदालतों के चक्कर लगाने पड़ते हैं।

क्या बिरयानी खाना किसी को तीन महीने जेल भेजने का आधार बन सकता है?
एक सार्वजनिक कार्यक्रम में जस्टिस भुइयां ने एक मामले का जिक्र करते हुए कहा कि गंगा में नाव पर इफ्तार पार्टी के दौरान चिकन बिरयानी खाने वाले कुछ युवाओं को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें तीन महीने तक जेल में रहना पड़ा। उन्होंने सवाल उठाया कि जब चिकन बिरयानी खाना कोई अपराध ही नहीं है, तो केवल इस आधार पर किसी को गिरफ्तार कर तीन महीने तक जमानत से वंचित कैसे रखा जा सकता है? उन्होंने कहा कि नागरिक यह सब देख रहे हैं।
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क्या जमानत की शर्तें भी अभिव्यक्ति की आजादी पर रोक बन रही हैं?
जस्टिस भुइयां ने कहा कि कई मामलों में अदालतें जमानत तो दे देती हैं, लेकिन ऐसी शर्तें लगा देती हैं, जो व्यक्ति की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित कर देती हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि किसी मंत्री पर फेसबुक पोस्ट लिखने वाले व्यक्ति को अग्रिम जमानत तो मिल जाती है, लेकिन उसका पासपोर्ट जमा करा लिया जाता है और उसे सोशल मीडिया पर कुछ भी पोस्ट नहीं करने की शर्त लगा दी जाती है।

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क्या छात्र-कार्यकर्ताओं पर लगाई गई शर्तें मौलिक अधिकारों को कमजोर करती हैं?
जस्टिस भुइयां ने दिल्ली दंगों से जुड़े छात्र-कार्यकर्ताओं के मामले का जिक्र करते हुए कहा कि जमानत मिलने के बावजूद उन्हें पासपोर्ट जमा कराने, सार्वजनिक सभाओं में शामिल न होने और ऑनलाइन भी संबोधित नहीं करने जैसी शर्तें दी गईं। उनके मुताबिक, ऐसी शर्तें व्यक्ति की आजादी और मौलिक अधिकारों को कमजोर करती हैं। इससे यह संदेश जाता है कि लोग सार्वजनिक मुद्दों पर बोलने और अपनी राय रखने से बचें।

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