गोरखपुर संसदीय सीट 29 साल बाद गोरक्षपीठ से अलग हुई है। 1989 में महंत अवेद्यनाथ सांसद बनें, फिर 1998 में सीट महंत योगी आदित्यनाथ के पास आ गई। मुख्यमंत्री बनने के बाद
योगी को सांसद पद से इस्तीफा देना पड़ा। ऐसे में भाजपा ने क्षेत्रीय अध्यक्ष उपेंद्र दत्त शुक्ला को चुनाव मैदान में उतार दिया। भाजपा की रणनीति ध्वस्त करने और उसके परंपरागत वोट बैंक में सेंधमारी के लिहाज से ही सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष
अखिलेश यादव ने दांव खेला। पहले निषाद पार्टी के नेता प्रवीण निषाद को सपा में शामिल कराया, फिर प्रत्याशी बना दिया। इसके बाद बसपा, रालोद, निषाद पार्टी, पीस पार्टी और वामपंथी पार्टियों से हाथ मिलाकर उपचुनाव के मैदान में कूद पड़े हैं।
सपा की मंशा है कि भाजपा से परंपरागत सीट छीनकर देश, दुनिया में संदेश दिया जाए। ऐसा हुआ तो आगामी लोकसभा चुनाव में कांग्रेस व अन्य राजनीतिक दल भी जुड़ेंगे। भाजपा इसे समझ रही है। इसीलिए परंपरागत सीट होने के बाद भी पार्टी ने प्रचार का जबरदस्त अभियान चलाया। गोरक्षपीठाधीश्वर और मुख्यमंत्री महंत योगी आदित्यनाथ की ताबड़तोड़ जनसभाएं कराई गईं। तमाम बड़े केंद्रीय और यूपी सरकार के मंत्रियों ने डेरा डाले रखा। भाजपा परंपरागत सीट बचाने में कामयाब हुई तो
महागठबंधन की तैयारी को बड़ा झटका लगेगा।
कांग्रेस की नजर अगुवाई पर
कांग्रेस ने गठबंधन से दूरी बनाकर अपना हाथ ऊपर रखने की कोशिश की है। कांग्रेस का मानना है कि उसके बगैर कोई गठबंधन कामयाब नहीं हो सकता। यही वजह है कि उसने उपचुनाव में अलग प्रत्याशी उतारा। प्रदेश अध्यक्ष राज बब्बर ने तो बसपा के साथ गठबंधन को स्वार्थ करार दिया।