प्रियंका का राजनीति में वैसे तो प्रवेश वर्ष 1999 के लोकसभा चुनावों में हो गया था, जब वे अमेठी में अपनी मां सोनिया गांधी के लिए प्रचार में जुटीं थीं। सोनिया के कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद उनका यह पहला चुनाव था। भाजपा ने उनके अंकल और राजीव गांधी के पूर्व विश्वस्त अरुण नेहरू को सोनिया के सामने उतारा था। तब प्रियंका ने मतदाताओं को संबोधित करते हुए कहा था, ‘एक व्यक्ति जिसने अपने भाई की पीठ में छुरा भोंका, आप उसे यहां आने की इजाजत कैसे दे सकते हैं? उनकी यहां आने की हिम्मत भी कैसे हुई?’ इसके बाद प्रियंका ने वर्ष 2004 में राहुल के लिए अमेठी में भी सफलतापूर्वक कमान संभाली। यह राहुल का पहला चुनाव था।
अब प्रियंका रायबरेली और अमेठी के अलावा सीधे तौर पर पूर्वी उत्तर प्रदेश की कमान संभालेंगी। इस क्षेत्र में करीब 40 लोकसभा सीटें पड़ती हैं। इनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का क्षेत्र वाराणसी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का संसदीय क्षेत्र रहा गोरखपुर भी शामिल हैं। एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता के अनुसार प्रियंका को अपनी मां और भाई के लिए चुनाव की कमान संभालने का करीब 20 साल का अनुभव है। गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की स्थिति को देखते हुए पिछले कई वर्षों से यह नारा उछलता रहा है, ‘प्रियंका लाओ, कांग्रेस बचाओ’। आगामी आम चुनावों से पहले सपा-बसपा गठबंधन में कांग्रेस को शामिल नहीं करने के परिप्रेक्ष्य में प्रियंका को पूर्वी यूपी की कमान सौंपने का पार्टी में स्वागत किया जा रहा है।
गौरतलब है कि 12 जनवरी 1972 को जन्मीं प्रियंका का विवाह फरवरी 1997 में दिल्ली के व्यवसायी रॉबर्ट वाड्रा के साथ हुआ था। उनके एक बेटा रेहान और एक बेटी मिराया हैं। माना जाता है कि प्रियंका बौद्ध धर्म को मानती हैं। उन्होंने बौद्ध अध्ययन में मास्टर डिग्री भी हासिल की है। कांग्रेस सूत्रों का मानना है कि उनकी इंदिरा गांधी से मिलती छवि का पार्टी को फायदा होगा। यह देखना होगा कि वे पार्टी के लिए सिर्फ स्टार प्रचारक होंगी या खुद लोकसभा चुनाव भी लड़ेंगी।