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अमेरिका के ट्रंप साहब की चाल में नहीं फंसने वाले हैं प्रधानमंत्री मोदी जी

Sat, 12 May 2018 09:55 AM IST
शशिधर पाठक, नई दिल्ली
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डोनाल्ड ट्रंप-नरेंद्र मोदी
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पूर्व विदेश सचिव शशांक के अनुसार अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बखूबी समझ रहे हैं। कूटनीति के जानकारों को भी अब भारत के प्रधानमंत्री की चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से अनौपचारिक चर्चा का रहस्य समझ में आने लगा है। एक वरिष्ठ राजनयिक के मुताबिक भारत का मकसद अपने हितों को ध्यान में रखकर अमेरिका के बनाए जाल में नहीं उलझना है। बताते हैं जिनपिंग से चर्चा के बाद प्रधानमंत्री ने दुनिया को यह संदेश दे दिया है। आगे की प्रतिक्रिया अमेरिका से आनी बाकी है। 
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चीन, भारत और अमेरिका 

अमेरिका दक्षिण चीन सागर में चीन की वर्चस्ववादी नीति का विरोध कर रहा है। भारत का मानना है कि दक्षिण चीन सागर में अंतरराष्ट्रीय सामुद्रिक कानून का पालन और स्वतंत्र तथा भयरहित नौवहन की आजादी हो। चीन को यह मंजूर नहीं है। चीन वन बेल्ट वन रोड, पाक अधिकृत कश्मीर से अपनी सीमा तक सिल्क रूट को विकसित करना चाहता है। भारत इसका भी विरोध कर रहा है। भारत अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान के साथ क्वाड्री लैट्रल प्लेटफार्म साझीदार है। चीन इससे चमकता है। इसके सामानांतर चीन, रूस, भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका ब्रिक्स के फोरम पर साथी है। एससीओ में भारत सदस्य है। 

चीन, रूस और भारत का अलग त्रिपक्षीय फोरम है। भारत और चीन के बीच में द्विपक्षीय व्यापार में असंतुलन जरूर हैं, लेकिन व्यापारिक रिश्ता है। चीन और अमेरिका के मामले में चीन का हर नागरिक अपनी बराबरी अमेरिका से करने का सपना देख रहा है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग पर उत्तर कोरिया के तानाशाह शासक किम जोंग ऊन भरोसा करते हैं। अमेरिका दक्षिण कोरिया को माध्यम बनाकर शी जिनपिंग के सहयोग से उत्तर कोरिया से 12 जून को संवाद शुरू करने की रणनीति में व्यस्त है। 
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क्या है भारत की सांसत 

भारत को अमेरिका से फिलहाल सीधे कोई तकलीफ नहीं है। लेकिन अमेरिका की संरक्षणवादी नीति और उसके द्वारा उठाए जा रहे कदमों ने भारत की तकलीफ बढ़ा दी है। इनमें कुछ द्विपक्षीय तो कुछ अंतरराष्ट्रीय कदम हैं। अंतरराष्ट्रीय कदमों में रूस पर एक के बाद एक कई अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध हैं। अमेरिका द्वारा लगाए गए ताजा प्रतिबंध के कारण स्टेट बैंक द्वारा रक्षा क्षेत्र समेत तमाम परियोजनाओं के लिए रूस को किया जा रहा भुगतान संकट में फंस गया है। सामरिक क्षेत्र की परियोजनाएं भी इसमें शामिल हैं।

इससे भारत की तमाम परियोजनाओं पर लेट-लतीफी समेत तमाम बादल मंडराने लगे हैं। नई दिल्ली इसका उच्च स्तर पर उपाय ढूंढने में व्यस्त है। अमेरिका के ताजा प्रतिबंध के अनुसार जो भी रूस के साथ व्यापार करेगा उसे भी अमेरिका के साथ व्यापारिक रिश्ता तोड़ना पड़ेगा। हालांकि अमेरिकी कांग्रेस और तमाम अमेरिकी नेता अमेरिका के इस प्रतिबंध को लेकर भारत को छूट दिए जाने के पक्षधर हैं। लेकिन इसके लिए वहां कानून में संशोधन करना पड़ेगा। 

भारत और ईरान 

ईरान के साथ अमेरिका के परमाणु करार और प्रतिबंध हटने तथा 14 जुलाई 2015 जेसीपीओए पर समझौता होने के बाद भारत ने रिश्तों में धार देना शुरू कर दिया था। भारत ने ईरान के साथ महत्वाकांक्षी चाबहार बंदरगाह परियोजना को आगे बढ़ाया है। दोनों देश ईरान से अफगानिस्तान के रेल रूट और सड़क मार्ग पर काम करने की रूपरेखा तैयार कर रहे हैं। इसके अलावा ईरान दुनिया का सबसे बड़ा तीसरे नंबर का तेल निर्यातक देश है। भारतीय तेल कंपनियों के लिए ईरान का क्रूड ऑयल काफी मुफीद रहता है।

अमेरिका के साथ ईरान के रिश्ते में आ रहे तनाव के बाद भारतीय अर्थव्यस्था तथा परियोजना को भी इसका असर झेलना पड़ सकता है। हालांकि ईरान के साथ रूस, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी जैसे पी-5+1 सदस्य देशों  की जेसीपीओए के मुद्दे पर सहानुभूति और सहयोग दोनों है। लेकिन इसके बाद भी अमेरिकी दबाव से असर पड़ सकता है। ईरान को डॉलर से होने वाले भुगतान में समस्या आ सकती है। भारत को इसके लिए यूरो या अन्य मुद्रा में भुगतान के विकल्प को भी अपनाना पड़ सकता है। 

अमेरिका के ईरान पर प्रतिबंध की संभावना को देखते हुए विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने कहा कि भारत लगातार हालात पर नजर बनाए हुए है। रवीश कुमार ने कहा कि भारत अपने हितों की रक्षा के लिए हर संभव कदम उठाएगा। 
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क्या चाहता है भारत 

पीएम मोदी और शी जिनपिंग
भारत चाहता है कि अमेरिका के प्रतिबंध अपनी जगह हैं, लेकिन वह इसकी आंच अपनी अर्थव्यवस्था, हितों तथा देश के विकास पर नहीं आने देना चाहता। खासकर भारत की सबसे बड़ी चिंता सबसे पुराने और विश्वसनीय साझीदार रूस के साथ चल रहे सामरिक, परमाणु, अंतरिक्ष, विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में चल रही परियोजनाओं को लेकर है। मौजूदा समय में भी भारत के 70 प्रतिशत से अधिक रक्षा साजो-सामान रूस से आयातित हैं। इसी तरह से ईरान के साथ परियोजनाओं को बंद करना, रोकना या उसमें अड़चन नई दिल्ली की परेशानी बढ़ा सकता है। 

क्या करेगा भारत 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसका संकेत देना शुरू कर दिया है। वह सबका साथ, सबका विकास की रणनीति पर आगे बढ़ रही है। पड़ोसी सबसे पहले (नेबरहुड फर्स्ट) की नीति को धार दे रहे हैं। चीन के राष्ट्रपति से अनौपचारिक चर्चा के बाद वह जून में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) शिखर सम्मेलन में फिर चीन जा रहे हैं। इस दौरान उनकी चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन से द्विपक्षीय वार्ता, भेंट का कार्यक्रम तय हो रहा है।

इसके बाद शी जिनपिंग और मोदी जी-20 शिखर सम्मेलन में मिलेंगे। इस भेंट मुलाकात की रूपरेखा तैयार हो रही है। इसके बाद दोनों देशों के शिखर नेताओं की एक और मुलाकात होनी है। इस तरह से 2019 में देश के आम चुनाव में जाने से पहले शी जिनपिंग और मोदी की तीन मुलाकात होनी निश्चित है। चौथी मुलाकात की संभावना शी जिनपिंग पर निर्भर करेगी।

प्रधानमंत्री मोदी शी जिनपिंग को अनौपचारिक भेंट, वार्ता के लिए भारत आने का न्यौता दे चुके हैं। यदि जिनपिंग आए तो यह आने वाले समय में चौथी भेंट होगी। इसके सामानंतर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री की भेंट, द्विपक्षीय वार्ता अब तक नहीं हो पाई है। यह अमेरिका के लिए नए संदेश के रूप में देखा जा रहा है। इसका मकसद अमेरिका के साथ बेहतर रिश्ते को वरीयता देते हुए भारतीय हित को प्राथमिकता देने का संदेश भर है। 
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