केंद्र सरकार के पहले नोटिफिकेशन में जम्मू-कश्मीर में केवल चार नौकरियों के लिए ही डोमिसाइल अनिवार्य किया गया था। मंगलवार को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन आदेश 2020 (राज्य कानूनों का अनुकूलन) जारी किया। इसमें जम्मू-कश्मीर नागरिक सेवा विकेंद्रीकरण और भर्ती कानून में बदलाव करने के साथ ही राज्य में डोमिसाइल की व्यवस्था लागू की गई।
नए प्रावधानों के तहत जम्मू-कश्मीर में सिर्फ चतुर्थ श्रेणी में लेवल-चार (25500) तक के पदों के लिए आवेदन करने के दौरान डोमिसाइल अनिवार्य किया गया था। सूत्रों के अनुसार, केंद्र सरकार ने नोटिफिकेशन तैयार करने से पहले जम्मू कश्मीर के राजनीतिक प्रतिनिधियों और भाजपा नेताओं से बातचीत की थी।
बाकायदा केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने खुद वहां के नेताओं से मिलकर आश्वस्त किया था कि डोमिसाइल नीति ऐसी होगी, जिसमें स्थानीय युवाओं को रोजगार के ज्यादा से ज्यादा अवसर मिल सकेंगे। जब नोटिफिकेशन जारी हुआ तो उसमें राज्य की चार सेवाओं के लिए ही डोमिसाइल अनिवार्य किया गया था। जबकि देर शाम जारी संशोधित आदेश में कहा गया है कि अब यहां के बाशिदों को सभी श्रेणी की नौकरियों में डोमिसाइल का लाभ मिलेगा।
पहली अप्रैल को जम्मू-कश्मीर के सभी राजनीतिक दलों ने इसका विरोध किया। यहां तक कि भाजपा नेताओं ने भी इसके दूरगामी परिणाम अच्छे नहीं बताए। बुधवार को इस मसले पर बैठकों का दौर शुरू हो गया। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और आईबी प्रमुख अरविंद कुमार से रिपोर्ट मांगी गई।
तेजी से काम हुआ और 24 घंटे में सरकार को जम्मू-कश्मीर के सभी जिलों की जो खुफिया रिपोर्ट सौंपी गई, वह केंद्र सरकार को चेताने के लिए पर्याप्त थी। इसके अलावा पीएमओ में राज्यमंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह, जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल गिरीश चंद्र मुर्मू और उनके सलाहकारों से भी विस्तृत चर्चा की गई।
तब तक सोशल मीडिया पर विभिन्न पार्टी नेताओं की प्रतिक्रिया भी सामने आ गई थी। लॉकडाउन के बीच ही जम्मू-कश्मीर के राजनीतिक दलों ने इसे मुद्दा बनाना शुरू कर दिया। जम्मू-कश्मीर अपनी पार्टी के अध्यक्ष अल्ताफ बुखारी ने भी केंद्रीय गृहमंत्री से बात कर डोमिसाइल नियमों में संशोधन करने की मांग की थी।
गृहमंत्री अमित शाह ने भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष रविंद्र रैना से बातचीत की। रैना ने शाह को स्पष्ट तौर पर बताया कि इससे राजनीतिक पार्टियां प्रदेश के युवाओं को गुमराह कर सकती हैं। रैना के अनुसार, अनुच्छेद 370 के खत्म होने के आठ माह बाद अब जम्मू-कश्मीर के युवक धीरे-धीरे केंद्र सरकार की नीतियों में भरोसा जताने लगे हैं।
अब यदि उन्हें यह लगा कि सरकार ने डोमिसाइल नीति में बदलाव कर स्थानीय युवाओं के साथ धोखा किया है तो वे खुद को ठगा महसूस करेंगे। यहां पर दूसरे प्रदेशों में रह रहे युवा नौकरी ले सकते हैं, ऐसी बातों को राजनीतिक दल तोड़-मरोड़ कर युवाओं के सामने पेश करेंगे। इससे स्थिति खराब हो सकती है। केवल कश्मीर ही नहीं, बल्कि जम्मू के युवा भी सरकार के इस कदम से नाराज होंगे।
नए नियमों पर सवाल उठाते हुए, जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने इसे जम्मू-कश्मीर के लोगों के अधिकारों की सुरक्षा के लिहाज से खोखला बताया था। जम्मू-कश्मीर अपनी पार्टी के अध्यक्ष अल्ताफ बुखारी ने कहा कि जम्मू और कश्मीर के लोगों को हतोत्साहित करने के लिए यह एक आकस्मिक प्रयास है।
एक और बयान था कि यह कॉस्मेटिक में कॉस्मेटिक और लोगों की आकांक्षाओं व उम्मीदों को ध्यान में रखे बिना नौकरशाही स्तर पर किया गया एक आकस्मिक अभ्यास है और इसमें आम लोगों से, खासतौर पर युवाओं से, कोई राय नहीं ली गई।
पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी ने इस आदेश को लोगों के घावों पर नमक रगड़नने वाला बताया। पार्टी महासचिव सुरिंदर चौधरी ने कहा कि यह आदेश पूर्णत: अस्पष्ट, अड़ियल और भड़कीला है। इसमें भूमि और नौकरियों की सुरक्षा से संबंधित कोई शब्द नहीं है।