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प्रेशर कुकर जैसे हालात: 67 करोड़ से ज्यादा लोग गर्मी-उमस से त्रस्त; बढ़ा तापमान, थमी हवा और आर्द्रता जानलेवा

Thu, 04 Jul 2024 05:22 AM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

शारीरिक श्रम करने वालों के लिए यह गर्मी जानलेवा हो सकती है। शोधकर्ताओं के मुताबिक मानसून के मौसम में अत्यधिक नम और गर्मी की स्थिति में श्रम कार्य करने वालों के लिए नए नियम बनाए जाने की तत्काल जरूरत है, क्योंकि आर्द्र गर्मी श्रम उत्पादकता को गंभीर रूप से प्रभावित करती है।
 
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गर्मी का कहर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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पूरे देश में अब मानसूनी बारिश शुरू होने की वजह से हीटवेव के हालात तो खत्म हो गए हैं लेकिन, अब भारी गर्मी, थमी हुई हवा व अत्यधिक आर्द्रता की वजह से देश के पूर्वी घाट और गंगा के मैदानी इलाकों में प्रेशर कुकर जैसे हालात बने हुए हैं। इस स्थिति को वेट बल्ब ग्लोब टेंपरेचर (डब्ल्यूबीजीटी) के तौर पर मापा जाता है। आमतौर पर 90 डिग्री फाॅरेनहाइट या 32.2 डिग्री सेल्सियस डब्ल्यूबीजीटी को जानलेवा माना जाता है। देश में फिलहाल 67 करोड़ से ज्यादा लोग इस 90 डिग्री का टॉर्चर झेल रहे हैं। अमेरिका की कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने इस संबंध में 1951 से 2020 की स्थिति को लेकर अध्ययन किया है।

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अध्ययन को अर्थ फ्यूचर जर्नल में प्रकाशित किया गया है। इसके मुताबिक शोधकर्ताओं ने गर्मी के महीनों में मानसून के दौरान आमतौर पर देखी जाने वाली गर्म और आर्द्र स्थितियों या नम गर्मी की चरम स्थितियों के रुझानों की जांच वेट-बल्ब ग्लोब तापमान (डब्ल्यूबीजीटी) के संदर्भ में की है। शोधकर्ताओं ने पाया है कि देश में करीब 4.3 करोड़ वर्ग किलोमीटर के दायरे में 31 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा का डब्ल्यूबीजीटी दर्ज हुआ है, जहां 67 करोड़ से ज्यादा लोग रहते हैं। सबसे ज्यादा खराब हालात भारत के पूर्वी तटीय क्षेत्रों और गंगा के मैदानी क्षेत्रों में है, जहां 38 डिग्री सेल्सियस डब्ल्यूबीजीटी जितना तापमान पहुंच रहा है। शोधकर्ताओं के मुताबिक मानसून के दौरान नमी और चरम गर्मी की स्थिति भारत के लोगों के स्वास्थ्य के लिए एक बड़ी चुनौती है। 

श्रमिकों के लिए जानलेवा
शारीरिक श्रम करने वालों के लिए यह गर्मी जानलेवा हो सकती है। शोधकर्ताओं के मुताबिक मानसून के मौसम में अत्यधिक नम और गर्मी की स्थिति में श्रम कार्य करने वालों के लिए नए नियम बनाए जाने की तत्काल जरूरत है, क्योंकि आर्द्र गर्मी श्रम उत्पादकता को गंभीर रूप से प्रभावित करती है।
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7% तक घट जाती  है श्रम उत्पादकता
भीषण गर्मी और उमस श्रम क्षमता को जबर्दस्त प्रभावित करती है। मिसाल के तौर पर ग्लोबल वार्मिंग में 3 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि श्रम उत्पादकता को 7 फीसदी तक कम कर सकती है और भारत में सकल घरेलू उत्पाद में कम से कम 4 फीसदी की कमी ला सकती है, जिससे फसल की कीमतें बढ़ेंगी और पूरी अर्थव्यवस्था पर इसका असर मुद्रास्फीति के तौर पर दिखेगा। यही हालात रहे, तो सदी के अंत तक देश में मानसून के दौरान कार्य प्रदर्शन में 30-40 फीसदी की गिरावट हो सकती है।

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