मेहता ने कहा कि इस देश में हर समस्या का समाधान अदालतें नहीं हैं। मामले की सुनवाई कर रही संविधान पीठ में मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बीआर गवई के अलावा, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस एएस चंदूरकर शामिल हैं।
राष्ट्रपति और राज्यपालों के लिए समय सीमा तय करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट में जारी सुनवाई के दौरान गुरुवार को सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि राज्यपाल अगर विधेयक को मंजूरी नहीं दे रहे हैं तो उसके राजनीतिक उपाय हैं, लेकिन अदालत उसके लिए समय सीमा तय नहीं कर सकती।
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मेहता ने कहा- देश में हर समस्या का समाधान अदालतें नहीं
केंद्र सरकार की तरफ से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने संविधान पीठ के समक्ष दलील देते हुए कहा कि अगर राज्यपाल विधानसभा से पारित किसी विधेयक को मंजूरी नहीं दे रहे हैं, तो उसके राजनीतिक उपाय मौजूद हैं और न्यायपालिका के बजाय राज्य विधानसभा को इसके लिए विकल्प तलाशने चाहिए। मेहता ने कहा कि इस देश में हर समस्या का समाधान अदालतें नहीं हैं। मामले की सुनवाई कर रही संविधान पीठ में मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बीआर गवई के अलावा, जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस एएस चंदूरकर शामिल हैं।
क्या बोले सॉलिसिटर जनरल
सॉलिसिटर जनरल ने कहा 'अगर राज्यपाल किसी बिल को मंजूरी नहीं दे रहे हैं तो उस स्थिति में राज्य को सीधे सुप्रीम कोर्ट नहीं चले जाना चाहिए। मुख्यमंत्री इस संबंध में प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति से मुलाकात कर सकते हैं और उनसे बिल के संबंध में चर्चा कर सकते हैं। ऐसे मामलों में राज्यपाल, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की संयुक्त बैठक में ही समाधान निकल सकता है, लेकिन क्या अदालत द्वारा इसके लिए समय सीमा तय की जा सकती है? इस देश में हर समस्या का समाधान सुप्रीम कोर्ट के पास नहीं है। कुछ ऐसी समस्याएं हैं, जिनके उत्तर व्यवस्था में खोजे जा सकते हैं।'
इस पर जस्टिस सूर्य कांत ने कहा कि अगर राज्यपाल बिल को मंजूरी नहीं दे रहे हैं तो अगर राज्य सरकार अदालत आती है तो आपके अनुसार, न्यायिक समीक्षा पूरी तरह से रोक दी जानी चाहिए? इस पर मेहता ने कहा कि राज्यपालों की कार्रवाई पर न्यायाधिकार का सवाल नहीं उठाया जा रहा लेकिन क्या अदालत, राज्यपाल के लिए समय सीमा तय कर सकती है?