23 अप्रैल को जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री दिल्ली आ रही हैं। माना जा रहा है कि महबूबा से मंत्रणा के बाद केन्द्र सरकार जम्मू-कश्मीर में शांति बहाली के प्रयासों को लेकर और सख्त कदम उठा सकती है। उच्चपदस्थ सूत्रों का मानना है कि राज्य में राष्ट्रपति शासन लगने के आसार बढ़ रहे हैं।
कश्मीर में लगातार बिगड़ रहे हालात को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की चिंता बढ़ रही है। पहले सरकार का अनुमान था कि राज्य में कानून-व्यवस्था को लेकर सख्ती बरतने और समय के इंतजार के साथ सबकुछ ठीक हो जाएगा, लेकिन राज्य के हालात लगातार नाजुक हो रहे हैं। कश्मीर में इस तरह के हालात मुद्दा बनाकर पाकिस्तान जहां लगातार अपने एजेंडे को आगे बढ़ा रहा है, वहीं अंतरराष्ट्रीय समुदाय दोनों देशों के बीच बातचीत की प्रक्रिया शुरू करने का दबाव बढ़ा रहे हैं। इसके अलावा समस्याग्रस्त कश्मीर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नीतियों तथा उनकी छवि को भी नुकसान पहुंचा रहा है। ऐसे में माना जा रहा है कि केन्द्र सरकार जल्द ही कुछ निर्णायक कदम उठा सकती है।
कश्मीर के हालात को लेकर बुद्धवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कैबिनेट मीटिंग के बाद भाजपा कोर ग्रुप की बैठक बुलाई थी। इसमें गृहमंत्री राजनाथ सिंह, वित्त और रक्षा मंत्री अरुण जेटली, केन्द्रीय भूतल परिवहन मंत्री नितिन गडक़री, शहरी विकास और सूचना प्रसारण मंत्री वेंकैया नायडू, प्रधानमंत्री कार्यालय में राज्यमंत्री जितेन्द्र सिंह, भाजपा के संगठन मंत्री राम लाल मौजूद थे। बैठक में कश्मीर के हालात को लेकर लगातार चर्चा हुई है।
केन्द्र और राज्य में ठीक नहीं है तालमेल
कश्मीर में समस्या के समाधान के क्रम में केन्द्र और राज्य सरकार का तालमेल आड़े आ रहा है। राज्य की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती केन्द्र सरकार के रवैय्ये से बहुत खुश नहीं हैं। महबूबा सेना के कदम से नाराज चल रही हैं। सेना और सुरक्षा एजेंसियां किसी तरह की बहुत ढिलाई के पक्ष में नहीं है। ऐसे में खुफिया एजेंसियाों की रिपोर्ट लगातार राज्य के हालात के बाबत केन्द्र सरकार की चिंता बढ़ा रही है।
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार प्रो. एसडी मुनि का मानना है कि राज्य में लगातार हालात विस्फोटक होते जा रहे हैं। जम्मू-कश्मीर की जनता भाजपा-पीडीपी गठबंधन से खुश नहीं है। सरकार ने राज्य की जनता से जो वादे किए थे, उसे पूरा करने में हिचक रही है। मुनि के मुताबिक केन्द्र सरकार कश्मीर को एक राजनीतिक मुद्दे के तौर पर देखने की बजाय कानून व्यवस्था का मामला मानकर चल रही है। शांति प्रयासों के मद्दे नजर वार्ता प्रक्रिया रोक दी गई है। ऐसा लग रहा है कि सेना , राज्य सरकार और केन्द्र सरकार राज्य की जनता के बीच में भरोसे का संकट बढ़ रहा है।
पीडीपी बनाम भाजपा
सूत्र बताते हैं कि भाजपा और पीडीपी में भी खटास बढ़ रही है। पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती सईद की कार्य प्रणाली से भाजपा खुद को असहज महसूस कर रही है। बताते हैं यही स्थिति महबूबा की भी है। प्रो. एसडी मुनि और कश्मीर मामले में अच्छी समझ रखने वाले रिसर्च एंड एनालिसिस विंग के पूर्व प्रमुख एएस
दुल्लत इसे लेकर सशंकित हैं। दोनों का मानना है कि केन्द्र सरकार राज्य की मुख्यमंत्री से संभवत: नियमित संवाद नहीं कर रही है।
इसका भी असर
प्रो. एस डी मुनि का मानना है कि देश के अन्य हिस्से में हिन्दू बनाम मुसलमान का वातावरण बनता जा रहा है। यह स्थिति पूरे विश्व और दक्षिण एशिया में है। बहुसंख्यक आबादी अल्पसंख्यक को सिकोड़कर प्रभुत्व बनाने में लगी है। कश्मीर में इसका भी असर पड़ रहा है। धारा 370 पर केन्द्र सरकार के रुख को लेकर लोग सशंकित हैं। केन्द्र के कश्मीर के विकास का मॉडल भी लोगों में विश्वास नहीं पैदा कर पा रहा है। सेना ने घोषणा की कि वह पत्थरबाजों को नहीं बख्शेगी।
उसने यही रवैय्या दिखाया और वहां के लोग इससे और भडक़ गए हैं। प्रो. मुनि के अनुसार इस तरह की प्रवृत्ति समाधान की ओर ले जाने की बजाय टकराव की ओर ले जाएगी। उन्होंने कहा कि पूर्व विदेश मंत्री यशवंत सिन्हा परोक्ष रुप से कश्मीर में वार्ताकार के रुप में गए थे, लेकिन केवल इतने भर से काम नहीं चलने
वाला है।
कैसी हो पहल
प्रो. एसडी मुनि और एएस दुल्लत का मानना है कि सरकार को कश्मीर मुद्दे पर समय नहीं गंवाना चाहिए। वार्ताकारों को नियुक्त करके शांति बहाली के प्रयास तेज कर देने चाहिए। दोनों विशेषज्ञों का मानना है कि इसके लिए सरकार चाहे तो पूर्व विदेश मंत्री यशवंत सिन्हा को ही जिम्मेदारी सौंप दे। दुल्लत और मुनि का कहना है कि यशवंत सिन्हा तीन चार बार कश्मीर जाकर सभी पक्षों से मिल आए हैं। उनकी रुचि भी है। इसलिए सरकार को इस मामले में सकारात्मक कदम
उठाना चाहिए।