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राष्ट्रपति का आग्रह, कहा- फरियादी को समझ में आने वाली भाषा में फैसले दें HC

Sat, 28 Oct 2017 07:28 PM IST
एजेंसी/ कोच्चि
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राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने इस बात पर जोर दिया है कि देश के सभी हाईकोर्ट को उसी भाषा में फैसले देने चाहिए जो मुद्दई को समझ में आ सके। इसके मद्देनजर उन्होंने फैसलों की प्रमाणित प्रतिलिपियां जारी करने की व्यवस्था कायम करने का भी सुझाव दिया है। 
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शनिवार को यहां केरल हाईकोर्ट की 75वीं वर्षगांठ के समापन समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने मुकदमों के त्वरित निपटारे की वकालत करते हुए कहा कि देर से मिले न्याय का सबसे ज्यादा खामियाजा गरीबों और शोषितों को भुगतना पड़ता है।

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सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा और केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद की मौजूदगी के बीच राष्ट्रपति ने कहा कि हाईकोर्ट के फैसले अंग्रेजी में लिखे जाते हैं, लेकिन इस देश में कई भाषाएं बोली जाती हैं। जरूरी नहीं है कि हर वादी अंग्रेजी जानता हो। ऐसे में वह फैसले की बारीकियों से वाकिफ नहीं हो पाएगा और फैसले को समझने के लिए वह पूरी तरह से वकील या किसी दूसरे व्यक्ति पर निर्भर रहेगा। इससे समय और पैसे दोनों की बर्बादी होती है।
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न्याय मिलने में विलंब देश की ज्वलंत समस्या

- फोटो : Google
उन्होंने इस समस्या को दूर करने के लिए फैसलों का स्थानीय या क्षेत्रीय भाषा में अनुवाद की व्यवस्था करने का सुझाव दिया है। फैसला दिए जाने के 24 से 36 घंटे के अंदर यह काम किया जा सकता है। केरल हाईकोर्ट में यह भाषा मलयालम हो सकती है और पटना हाईकोर्ट में हिंदी। यह न्यायपालिका और वकालत से जुड़े लोगों की जिम्मेदारी है कि वे इस पर विचार-विमर्श करें और उचित कदम उठाएं।

राष्ट्रपति ने कहा कि न्याय मिलने में विलंब देश की ज्वलंत समस्या है। इससे गरीब और वंचित तबके के लोग ही ज्यादा प्रभावित होते हैं। इसलिए हमें मुकदमों के त्वरित निपटारे का तरीका ढूंढना ही होगा। इसके लिए यह जरूरी है कि सिर्फ आपात स्थिति में ही किसी मुकदमे को स्थगित किया जाए। अभी मुकदमों को लंबा खींचने के लिए स्थगन का सहारा लिया जाता है। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका और न्याय देने की व्यवस्था को टेक्नोलॉजी और समाज में हो रहे बदलावों के साथ कदम मिलाकर चलना चाहिए।

इस अवसर पर चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा कि न्याय मिलने में विलंब के कारण न्यायिक प्रक्रिया में नागरिकों का भरोसा कम होता है। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट की कई समितियां इस मुद्दे पर विचार कर रही हैं। इस दिशा में काफी सफलता मिली है। केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा कि न्यायपालिका से आह्वान किया कि वह 10 साल से ज्यादा समय से लंबित मामलों का निपटारा करें।
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