देश के अगले राष्ट्रपति के लिए भाजपा नीत एनडीए ने रामनाथ कोविंद को अपना उम्मीदवार घोषित करके एक बार फिर देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद के लिए उम्मीदवार के चयन प्रक्रिया और योग्यता पर नई बहस छेड़ दी है। यह बहस इसके पहले 2007 में भी तब शुरु हुई थी जब तत्कालीन सत्तारूढ़ कांग्रेस नेतृत्व वाले यूपीए ने प्रतिभा पाटिल को अचानकर राष्ट्रपति पद केलिए अपना उम्मीदवार बनाया था।
हालांकि प्रतिभा पाटिल और रामनाथ कोविंद दोनो ही अपने अपने दलों कांग्रेस और भाजपा की राजनीति में वर्षों तक सक्रिय रहे और विभिन्न पदों पर उन्होंने काम किया। रामनाथ कोविद 1989 में भाजपा के टिकट पर कानपुर देहात की तत्कालीन घाटमपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़े, लेकिन हार गए। फिर भाजपा ने उन्हें एक दलित नेता के रूप में न सिर्फ पार्टी के अनुसूचित जाति मोर्चे का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया बल्कि पार्टी प्रवक्ता पद से भी उन्हें नवाजा। उन्हें दो बार राज्यसभा में भी भेजा गया।
2007 में कोविद कानपुर देहात की भोगनीपुर सीट से विधायक का चुनाव लड़े, लेकिन इस बार भी जीत नहीं सके। 2014 के लोकसभा चुनाव में वह गरौठा जालौन सीट से टिकट चाहते थे, लेकिन पार्टी ने उन्हें मैदान में नहीं उतारा। बाद में केंद्र में सरकार बनने के करीब एक साल बाद बिहार विधानसभा चुनाव से पहले कोविंद को राज्यपाल बनाकर पटना के राजभवन भेजा गया। भाजपा की रणनीति राज्य में एक दलित राज्यपाल भेजकर बिहार चुनाव में दलितों को साधने की कोशिश थी, लेकिन उसमें पार्टी को सफलता नहीं मिली। जबकि पाटिल 1962 में पहली बार विधायक बनीं और 1967 में महाराष्ट्र सरकार में मंत्री बनीं और 1977 तक सरकार में रहीं।
1977 में कांग्रेस की पराजय केबाद वह महाराष्ट्र विधानसभा में नेता विपक्ष थीं। इसके बाद वह लोकसभा और राज्यसभा केलिए कई बार चुनीं गईं और राज्यसभा में उप सभापति भी रहीं। लेकिन फिर कुछ समय तक प्रतिभा पाटिल सक्रिय राजनीति से दूर चली गईं और गुमनाम हो गईं। 2004 में यूपीए सरकार बनने पर वो राजस्थान की राज्यपाल बनाईं गर्ईं और वहीं से उन्हें राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाया गया।
रामनाथ कोविंद और प्रतिभा पाटिल की तुलना
फाइल फोटो
कोविंद और पाटिल की अगर तुलना करें तो दोनों में समानता यह है कि जब उन्हें राष्ट्रपति का उम्मीदवार बनाया गया तब वो सक्रिय राजनीति से दूर होकर राजभवन में विराज रहे थे और न तो पाटिल को कांग्रेस में है और न ही कोविंद को भाजपा में। पाटिल को इंदिरा गांधी के जमाने से कांग्रेस के प्रथम परिवार और अध्यक्ष सोनिया गांधी के प्रति वफादारी का इनाम मिला जबकि कोविंद को उनकी सादगी, विनम्रता और नेतृत्व के प्रति समर्पण का लाभ मिला।
2007 में जब प्रतिभा पाटिल को यूपीए का उम्मीदवार घोषित किया तो देश में सर्वोच्च संवैधानिक पद के लिए उनकी योग्यता पर तमाम टिप्पणियां की गईं और सवाल उठाए गए। पाटिल के सियासी अतीत से अज्ञान पत्रकारों और राजनीतिक टिप्पणीकारों ने उन्हें इंदिरा गांधी के घर में खाना बनाने वाली तक कह डाला। शुक्र है कि कोविंद इस तरह की अनर्गल आलोचनाओं से अभी तक बचे हुए हैं।
दरअसल आजादी के बाद जब देश के प्रथम राष्ट्रपति पद पर प्रखर स्वतंत्रता सेनानी और विद्वान डा.राजेंद्र प्रसाद आसीन हुए तो राष्ट्रपति पद की योग्यता का एक मानदंड तय हो गया। राजेंद्र बाबू लगातार दो बार इस पद पर रहे। उनके बाद भारतीय संस्कृति और दर्शन के ज्ञाता डा. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, शिक्षाविद डा.जाकिर हुसैन जैसे जानेमाने लोग राष्ट्रपति बने। फिर कांग्रेसी राजनीति के मजदूर नेता वी.वी.गिरि और दिग्गज मुस्लिम नेता डा.फखरुद्दीन अली अहमद राष्ट्रपति बने। जनता पार्टी ने वरिष्ठ राजनेता डा.नीलम संजीव रेड्डी को राष्ट्रपति बनाया। तब तक इस पद के उम्मीदवारों की योग्यता को लेकर कोई सवाल नहीं उठा।
लेकिन जब इंदिरा गांधी ने तत्कालीन गृह मंत्री ज्ञानी जैल सिंह को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया तो इसमें राजनीति और वफादारी को सबसे बड़ी योग्यता माना गया। इंदिरा गांधी के इस फैसले पर सवाल भी उठे, लेकिन तब उनके इस कदम को आतंकवाद और अलगाववाद की आग में सुलग रहे पंजाब और सिख मानस को साधने की रणनीति माना गया। यहीं से राष्ट्रपति की योग्यता और अनुभव की बहस शुरु हुई।
क्या दलित होना ही कोविंद की योग्यता है?
रामनाथ कोविन्द
लेकिन राजीव गांधी ने जब आर.वेंकटरमण को राष्ट्रपति बनाया तो उनकी योग्यता और वरिष्ठता पर सवाल नहीं उठे। इसी कड़ी में डा. शंकरदयाल, के.आर.नारायणन, एपीजे अब्दुल कलाम जब देश के राष्ट्रपति बने तो उन्हें सहर्ष स्वीकार किया गया। लेकिन 2007 में प्रतिभा पाटिल के चयन पर फिर सवाल उठे। लेकिन 2012 में प्रणव मुखर्जी के नाम पर किसी ने कोई सवाल नहीं उठाया, क्योंकि मुखर्जी के लंबे राजनीतिक जीवन, केंद्रीय मंत्री और सांसद के रूप में उनका अनुभव और बेदाग सियासी अतीत ने किसी को कुछ भी कहने का मौका नहीं दिया।
अब जब भाजपा ने रामनाथ कोविंद को एनडीए की तरफ से राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया है तो एक बार फिर सियासी हलकों में देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद की योग्यता को लेकर बहस छिड़ गई है। जिस तरह से कोविंद के नाम की घोषणा करते हुए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने उनके दलित होने पर जोर दिया, उससे लगा कि कोविंद की सबसे बड़ी योग्यता उनका दलित होना ही है।
हालांकि कोविंद पेश से वकील और दो बार राज्यसभा के सांसद भी रहे हैं। पार्टी के भीतर भी विभिन्न पदों पर रहे हैं। लेकिन उनके पक्ष में सबसे बड़ी दलील उनके दलित होने की दी जा रही है, जैसी कि प्रतिभा पाटिल के पक्ष में उनके महिला होने की दलील दी गई थी। बेहतर होता कि कोविंद के दलित होने की बजाय उनकी सज्जनता, विनम्रता, कानून के जानकार और संसदीय व राजनीतिक अनुभव पर जोर दिया जाता।