ओपन बुक परीक्षा मॉडल में दो प्रकार से परीक्षाएं आयोजित की जाती हैं। पहली विधि में छात्रों को कॉलेज या विश्वविद्यालय परिसर में ही आने के लिए कहा जाता है। वहां पर परीक्षा देते समय उन्हें अपनी पुस्तकों या सहायक पुस्तकों का इस्तेमाल करने की इजाजत दी जाती है।
दिल्ली विश्वविद्यालय के दयाल सिंह कॉलेज में रसायन शास्त्र के प्रोफेसर डॉक्टर एके भागी ने अमर उजाला को बताया कि इस समय भी कई देशों में अनेक शिक्षण संस्थान इस माध्यम से परीक्षाएं आयोजित कराते हैं। इसलिए इस माध्यम को अपनाने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन इस माध्यम में पूछे जाने वाले प्रश्नों की प्रकृति बदल जाती है।
ऐसे माध्यम में ज्यादातर सवाल विचारात्मक श्रेणी के होते हैं, जिनका उत्तर देते समय तथ्यात्मक जानकारी कम अपेक्षित होती है। यही कारण है कि परीक्षा के समय अगर छात्रों के पास पुस्तक होने के बाद भी वे इससे बहुत ज्यादा मदद नहीं ले सकते। यही वजह है कि जिस छात्र ने ठीक से पढ़ाई नहीं की है, वह इस माध्यम में घर पर पुस्तकों के साथ होकर भी नकल नहीं कर पाते।
लेकिन इस माध्यम से परीक्षा लेने की सबसे बड़ी खामी यह है कि अगर अपने आवास पर कोई छात्र प्रश्नों को किसी एक्सपर्ट के माध्यम से दिलवा देता है, या स्वयं परीक्षा देते समय उससे सहयोग लेता है तो उसका मूल्यांकन मुश्किल हो सकता है। इस तरह यह परीक्षा प्रणाली भी अन्य प्रणालियों की तरह अपनी खामी लिए हुए है।
जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में माइक्रोबायोलोजी के प्रोफेसर डॉक्टर जीडी दास ने कहा कि भारतीय परिप्रेक्ष्य में इसके परिणाम का अध्ययन किया जाना चाहिए। इस माध्यम से सभी बच्चों को बराबर का मौका देने के लिए सभी बच्चों तक संसाधनों का पर्याप्त रूप से होना बहुत आवश्यक है।
अन्यथा तकनीक का उपयोग कर अपेक्षाकृत कम योग्य छात्र ज्यादा बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं।
दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र ओपेन बुक टेस्ट के खिलाफ हैं। दिल्ली विश्वविद्याय छात्र संघ ने भी इस पर अपनी आपत्ति जताई है। एबीवीपी नेता आशुतोष सिंह ने कहा कि हजारों छात्र होली की छुट्टियों के पहले ही अपने घर जा चुके थे और उनके पास पूरी पुस्तकें तक उपलब्ध नहीं थीं।
ऐसे में वे पढ़ाई नहीं कर पाए हैं। ऑनलाइन क्लास की सुविधा भी अनेक छात्र इंटरनेट कनेक्टिविटी के कारण नहीं कर पाए हैं। ऐसे में परीक्षा लेना छात्रों के हितों के साथ खिलवाड़ साबित हो सकता है।