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कुरुक्षेत्र: शांत रहने वाले प्रशांत किशोर आखिर क्यों हुए आक्रामक

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प्रशांत किशोर - फोटो : फाइल
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पश्चिम बंगाल के राजनीतिक घमासान में अब सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस और उसे चुनौती दे रही केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी ने एक दूसरे पर हमले तेज कर दिए हैं। इसकी ताजा कड़ी में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के बंगाल दौरे को राष्ट्रीय मीडिया में मिले अत्याधिक प्रचार को चुनौती देता हुआ तृणमूल कांग्रेस के चुनाव रणनीतिकार प्रशांत किशोर का ट्वीट भी खासा चर्चा में है। इसमें उन्होंने दावा किया है कि भाजपा नेताओं के दौरों का मीडिया चाहे कितना भी जरूरत से ज्यादा प्रचार करे लेकिन पश्चिम बंगाल में भाजपा दहाई के आंकड़े में ही सिमट कर रह जाएगी।

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अगर ऐसा नहीं हुआ तो वह चुनावी रणनीतिकार का काम छोड़ देंगे। इसके जवाब में भाजपा के पश्चिम बंगाल प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय ने तंज कसते हुए कहा कि चुनावों के बाद देश को एक चुनाव रणनीतिकार खोना पड़ेगा।


दोनों खेमों के अपने अपने दावे हैं और उन दावों के आधार हैं। भाजपा नेता और कार्यकर्ता 2019 में मिली आशातीत सफलता से उत्साहित हैं तो तृणमूल को अपनी नेता मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की जमीनी पकड़ और बंगाल अस्मिता की उनकी छवि पर भरोसा है। लेकिन इन चुनावों के पहले की राजनीतिक परिस्थितियों का आकलन करने के लिए कुछ जमीनी तथ्यों पर ध्यान दिया जाना जरूरी है। अप्रैल 2016 के विधानसभा चुनावों में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस ने राज्य की कुल 294 सीटों में से 44.91 मत प्रतिशत के साथ 211 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत प्राप्त किया था और अब उसे चुनौती देने वाली भाजपा को 10.16 फीसदी मत प्रतिशत के साथ महज तीन सीटें मिली थीं।
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जबकि कांग्रेस ने 12.25 मत प्रतिशत के साथ 44 और कभी राज्य में 34 सालों तक एकछत्र शासन करने वाले वाम मोर्चा ने 19.75 मत प्रतिशत के साथ 28 सीटें जीती थीं। लेकिन 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को राज्य में अपना प्रभाव विस्तार करने में जबर्दस्त कामयाबी मिली। पार्टी न सिर्फ राज्य की कुल 42 लोकसभा सीटों में से 18 सीटों पर कब्जा किया बल्कि उसका मत प्रतिशत भी बढ़कर 40 फीसदी हो गया। जबकि 22 सीटें जीतने वाली तृणमूल कांग्रेस का मत प्रतिशत खासा गिर गया। लेकिन सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस और वाम मोर्चे को हुआ जिनके जनाधार का बहुत बड़ा हिस्सा खिसक कर भाजपा की तरफ चला गया। लोकसभा चुनावों के नतीजों से उत्साहित भाजपा ने बंगाल में पूरी ताकत झोंक दी है।

विजयवर्गीय की टिप्पणी
भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय लोकसभा चुनावों के भी काफी पहले से बंगाल में सक्रिय हैं। लोकसभा चुनावों में जिस तरह भाजपा ने आक्रामक तरीके से चुनाव प्रचार किया था और उसके नतीजे भी आए। इससे बंगाल में लड़ाई अब सीधे तृणमूल कांग्रेस बनाम भाजपा हो गई है। भाजपा ने तृणमूल के विधायकों और नेताओं को तोड़ने में भी खासी कामयाबी पाई है। विधानसभा चुनावों से ठीक पहले तृणमूल के बेहद मजबूत नेता माने जाने और ममता सरकार में ताकतवर मंत्री शुभेंदु अधिकारी और कुछ विधायकों का भाजपा में जाना कोलकाता से लेकर दिल्ली तक भाजपा के कार्यकर्ताओं और नेताओं का हौसला बढ़ा रहा है।

राजनीतिक हिंसा बंगाल की सियासत का एक ऐसा पहलू है जिसके आरोपों की जद में हर सत्ताधारी दल आता रहा है और यह एक मुद्दा भी बनता रहा है। कभी सिद्धार्थ शंकर रे के नेतृत्व वाली कांग्रेस की सरकार के कार्यकाल में भी पुलिस और सत्ताधारी दल पर राजनीतिक हिंसा के आरोप लगे और उसके बाद वाम मोर्चे की सरकार बनी। करीब 34 वर्षों तक राज्य में निर्बाध शासन करने वाले वाम मोर्चा की अगुआ पार्टी माकपा के कैडरों पर राज्य में अपने विरोधियों के खिलाफ हिंसा और हत्या के आरोप लगातार लगते रहे। यहां तक कि खुद ममता बनर्जी इसे एक बड़ा मुद्दा बनाकर सत्ता में पहुंची थीं।

अब उसी तर्ज पर तृणमूल कांग्रेस हिंसा और राजनीतिक हत्याओं के आरोपों के घेरे में है और भाजपा इसे चुनावी मुद्दा बना रही है। हाल ही में भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के दौरे के दौरान उनके काफिले पर हुए हमले ने मामला और गरमा दिया। इस हमले के बाद भाजपा बेहद हमलावर हो गई और केंद्र सरकार ने राज्य के तीन अधिकारियों को केंद्र में बुलाने का आदेश दिया। लेकिन राज्य सरकार ने उस पर अमल करने से मना कर दिया है। इससे केंद्र और राज्य के संबंधों में भी तनाव और बढ़ गया है। राज्यपाल जगदीप धनखड़ की सक्रियता भी ममता को लगातार असहज कर रही है।

राष्ट्रपति शासन की चर्चा
इसी बीच भाजपा द्वारा राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग पर ममता बनर्जी ने चुनौती दी कि अगर केंद्र में हिम्मत है तो राष्ट्रपति शासन लगाकर दिखाएं बंगाल की जनता उसका जवाब देगी। लेकिन भाजपा ने अपना दबाव बढ़ाते हुए गृह मंत्री अमित शाह को मैदान में उतारा और शाह के दो दिन के बंगाल दौरे से राज्य की सियासत बेहद गर्म हो गई। शाह ने ही शुभेंदु अधिकारी और उनके समर्थकों को भाजपा में शामिल किया।

इसका जवाब देते हुए तृणमूल कांग्रेस की स्थानीय इकाई ने अधिकारी के गढ़ कांथी में एक विशाल रैली की। जवाब में शुभेंदु अधिकारी जिनके भाई और पिता तृणमूल सांसद हैं, ने अपने क्षेत्र में रोड शो किया। इस बीच अपने दल में सेंधमारी रोकने के लिए तृणमूल के संकट प्रबंधक सक्रिय हुए और पश्चिम बंगाल भाजपा युवा मोर्चे की पत्नी ने भाजपा छोड़कर तृणमूल का दामन थाम लिया। भाजपा की तरफ चल चुके तृणमूल नेता जितेंद्र तिवारी वापस तृणमूल में लौट आए। कुल मिलाकर शह और मात का यह खेल लगातार जारी है और चुनाव तक और तेज होगा।

धार्मिक ध्रुवीकरण

भाजपा ने लोकसभा चुनावों के पहले से ही पश्चिम बंगाल में हिंदुत्व को अपना सियासी हथियार बनाया है और हिंदू मुस्लिम ध्रुवीकरण का कोई मौका हाथ से नहीं जाने दिया। भाजपा के प्रचार तंत्र ने ममता बनर्जी को मुस्लिम परस्त बनाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी और दुर्गा पूजा से लेकर अयोध्या के राम मंदिर तक के मुद्दों को गरम करके हिंदुओं को अपने पक्ष में ध्रुवीकरण का दांव लगातार चला है। इसका फायदा भी उसे लोकसभा चुनावों में मिला है। भाजपा के इस सियासी दांव ने उसके पक्ष में राज्य के प्रवासी उत्तर भारतीय समुदाय और दलितों को काफी हद तक गोलबंद किया है। यह भाजपा का मुख्य जनाधार बना है।

पार्टी के रणनीतिकारों को उम्मीद है कि राज्य में सत्ता परिवर्तन के लिए तड़प रहे वाम मोर्चे और कांग्रेस के समर्थक और कार्यकर्ता लोकसभा चुनावों की तरह या उससे भी ज्यादा विधानसभा चुनावों में भी भारी तादाद में भाजपा के लिए वोट करेंगे। इसलिए भाजपा ज्यादा से ज्यादा आक्रामक तेवर दिखाकर उन्हें अपनी जीत का भरोसा दिलाना चाहती है जिससे अंतिम समय में फैसला लेने वाले मतदाता भी उसकी तरफ खिंच सकें।

पाला बदलवाने की रणनीति
पार्टी के एक रणनीतिकार के मुताबिक इसके साथ ही भाजपा तृणमूल समर्थकों, नेताओं और कार्यकर्ताओं की कतारों में भी एक असुरक्षा डर और दहशत भर देना चाहती है जिससे न सिर्फ उनका मनोबल टूटे बल्कि बड़ी संख्या में वो पाला बदल भी करें। भाजपा इन सारी रणनीतियों पर एक साथ काम कर रही है और साथ ही राज्यपाल जिस तरह सक्रिय हैं उससे यह भी संदेश दिया जा रहा है कि चुनाव आते आते राज्य में राष्ट्रपति शासन भी लगाया जा सकता है जिससे तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी की नौकरशाही पर पकड़ कमजोर हो जाए और अधिकारियों में यह संदेश चला जाए कि उनका भविष्य अब केंद्र सरकार के अधीन है।

उधर तृणमूल कांग्रेस भी भाजपा के इन रणनीतिक हथकंडों से बेखबर नहीं है। क्योंकि उसके प्रमुख रणनीतिकार प्रशांत किशोर कभी 2014 लोकसभा चुनावों में भाजपा और नरेंद्र मोदी के चुनाव प्रचार अभियान के रणनीतिकार थे। बाद में वह 2015 में बिहार में नीतीश कुमार के रणनीतिकार बने और तब भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा। प्रशांत किशोर और भाजपा के बीच शह मात का यह खेल कई बार खेला जा चुका है।

उत्तर प्रदेश में चख चुके हैं पराजय
बिहार के बाद दोनों का मुकाबला उत्तर प्रदेश में हुआ जहां प्रशांत कांग्रेस सपा गठबंधन के लिए काम कर रहे थे, लेकिन अनेक कारणों से यहां उनकी रणनीतिक पराजय और भाजपा की भारी जीत हुई। इसी तरह भाजपा ने उत्तराखंड में प्रशांत किशोर की रणनीति को मात दी जहां वह कांग्रेस के लिए काम कर रहे थे, लेकिन पंजाब में प्रशांत की रणनीति भारी पड़ी और कांग्रेस को बहुमत मिला। इसी साल फरवरी में दिल्ली विधानसभा के चुनावों में प्रशांत किशोर और भाजपा के बीच फिर मुकाबला हुआ था।

तब प्रशांत ने आम आदमी पार्टी की चुनावी रणनीति संभाली और तमाम तूफानी प्रचार और आक्रामक हिंदुत्व ध्रुवीकरण की कोशिशों के बावजूद भाजपा दिल्ली विधानसभा में अपनी सदस्य संख्या तीन से बढ़ाकर महज आठ कर पाई। अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को महज पांच सीटों का नुकसान हुआ और वह फिर 62 सीटों के तूफानी बहुमत से जीत गई। अब बंगाल में भाजपा और प्रशांत किशोर की रणनीति का मुकाबला है जहां पिछले करीब डेढ़ साल से प्रशांत ममता बनर्जी के चुनावी अभियान की कमान संभाले हुए हैं।

चुनौती भरा ट्वीट

आमतौर पर मीडिया में बयानबाजी से बचने वाले प्रशांत किशोर को आखिर ऐसा चुनौती भरा ट्वीट क्यों करना पड़ा। दरअसल प्रशांत भाजपा की रणनीति और दांवपेच को अच्छी तरह समझते हैं। वह भाजपा शिविर के अंदर भी रहे हैं और मुकाबले पर भी रहे हैं। उन्हें पता है कि भाजपा उस शिकारी की तरह है जो बहुत पहले से ही हल्ला मचाकर हांका लगाता है और जंगल के जानवरों में दहशत पैदा कर देता है। इसके बाद जब जानवरों में भगदड़ मच जाती है तो वह वह शिकारी आराम से अपना शिकार कर लेता है।

प्रशांत यह भी जानते हैं कि विपरीत से विपरीत परिस्थितियों में भी भाजपा वह भी मोदी शाह के जमाने की भाजपा कभी मैदान नहीं छोड़ती और आखिरी ओवर तक बैटिंग करती है। इसलिए अपनी आक्रामकता से भाजपा एक से दो प्रतिशत तटस्थ मतदाताओं को अपने साथ खींच लेती है और विरोधी खेमें में दहशत पैदा करके उसके जनाधार को भी बिखेर देती है। इसलिए प्रशांत किशोर कोई चूक नहीं करना चाहते हैं।

भाजपा का दलबल बंगाल में
जेपी नड्डा और अमित शाह के दौरों के बाद भाजपा के चुनाव अभियान को जिस तरह मीडिया में हाइप मिल रहा है, उससे तृणमूल के कार्यकर्ताओं और समर्थकों का मनोबल कमजोर न हो जाए इसके लिए तृणमूल कांग्रेस के सबसे बड़े रणनीतिकार प्रशांत किशोर को खुद मैदान में आना पड़ा। उन्होंने भाजपा को दहाई के आंकड़े को पार न कर पाने की चुनौती देने वाला ट्वीट करके अपने समर्थकों कार्यकर्ताओं और जनाधार को यह संदेश दिया है कि  ममता बनर्जी तीसरी बार पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री  बनने जा रही हैं इसलिए लोग किसी गफलत में न आएं।

प्रशांत किशोर के दावे के कुछ जमीनी आधार हैं। पहला आधार यह है कि भले ही लोकसभा चुनावों में भाजपा का मत प्रतिशत 11 फीसदी से बढ़कर 40 फीसदी हो गया हो और उसे 18 सीटें मिली हों, लेकिन भाजपा को यह कामयाबी तृणमूल के जनाधार में सेंध लगाकर नहीं बल्कि कांग्रेस और वाम मोर्चे के जनाधार को अपनी ओर खींचकर मिली है। क्योंकि लोकसभा चुनावों में तृणमूल की सीटें घटने के बावजूद उसके मत प्रतिशत में कोई कमी नहीं आई। फिर भाजपा को जो 18 सीटें मिली हैं, वो राज्य की 294 विधानसभा सीटों में से महज 75 पर असर डालती  हैं।

लोकसभा बनाम राज्यसभा
तृणमूल कांग्रेस को भरोसा है कि लोकसभा चुनावों में भाजपा को वोट इसलिए ज्यादा मिला क्योंकि तृणमूल कांग्रेस केंद्र में सरकार बनाने की दौड़ में नहीं थी और भाजपा के मुकाबले केंद्र में सरकार बनाने की दौड़ में शामिल कांग्रेस बंगाल में बेहद कमजोर है, इसलिए मोदी के नाम पर भाजपा को ज्यादा वोट और सीटें मिल गईं। लेकिन विधानसभा चुनावों में परिस्थिति दूसरी है। राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी न सिर्फ आम बंगाली जनमानस में लोकप्रिय हैं बल्कि उनकी सादी जीवनशैली, ईमानदारी और लोगों के बीच सहजता से घुलना मिलना उन्हें ताकतवर बनाता है। इसलिए ममता बनर्जी का आधारभूत जनाधार आज भी उसी तरह एकजुट है जैसा कि पिछले चुनावों में था।

भाजपा ने जिस तेजी से आक्रामक रूप से लोकसभा चुनावों के समय से ही पश्चिम बंगाल में हिंदू ध्रुवीकरण का कार्ड खेलना शुरु किया उससे ममता सतर्क हो गईं। इसलिए एक तरफ तो तृणमूल के रणनीतिकारों ने हिंदुत्व की काट के लिए बंगाली स्वाभिमान का दांव चला है और ममता को उसका प्रतीक बनाने की पूरी कवायद हो रही है। इसीलिए ममता ने भाजपा को बाहरी लोगों की पार्टी बताते हुए खुद पर हमला बंगाल की अस्मिता पर हमला बताना शुरु कर दिया है।

ममता के इस दांव की सफलता का संकेत यही है कि भाजपा को इस मुद्दे पर बचाव की मुद्रा में आना पड़ा है और उसके नेताओं ने खुद को बाहरी कहे जाने को राष्ट्रीय भावना के विपरीत बताया है। इसके साथ ही बंगाल का एक तथ्य बाहर लोग कम जानते हैं कि पश्चिम बंगाल के कुल 23 जिलों में सिर्फ नौ जिलों में 185 विधानसभा सीटें हैं। इनमें पूर्बा बर्दमान की 16, हुगली की 18, हावड़ा की 17, पश्चिम मेदिनीपुर की 15, पूर्बा मेदिनीपुर की 16, मुर्शिदाबाद की 22 नादिया की 17, उत्तरी 24 परगना की 33 और दक्षिण 24 परगना की 31 सीटें शामिल हैं। ये वो जिले हैं जिनमें 15 से ज्यादा सीटे हैं और जिसने इन जिलों को फतह कर लिया बंगाल में राज उसी का है।
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नौ जिलों में तृणमूल का दबदबा

तृणमूल कांग्रेस के रणनीतिकारों का दावा है कि इन नौ जिलों में तृणमूल का ही दबदबा है और भाजपा की सिर्फ इनमें से चार जिलों में उपस्थिति मात्र है। इनके अलावा दस से ज्यादा विधानसभा सीटों वाले दूसरे चार बड़े जिले हैं जिनमें कुल 47 सीटें हैं। इनमें बांकुड़ा की 13, बीरभूम की 11, कोलकाता की 11, मालदा की 12, सीटें शामिल हैं। इस तरह पश्चिम बंगाल के 13 जिलों में कुल 232 सीटें हैं और जीत की कुंजी (चाबी) इन 13 जिलों के मतदाताओं के पास है।

तृणमूल कांग्रेस के रणनीतिकारों का दावा है कि इन 234 सीटों वाले इन 13 जिलों में तृणमूल कांग्रेस भाजपा से बहुत ज्यादा मजबूत है और 180 से ज्यादा सीटें इन्हीं जिलों में से जीतेगी। अपने इसी जमीनी आकलन के आधार पर प्रशांत किशोर अपने ट्वीट में दावा करते हैं कि भाजपा किसी भी हालत में दहाई की संख्या से ज्यादा सीटें नहीं जीत पाएगी। यानी भाजपा 100 का आंकड़ा पार नहीं कर पाएगी, जबकि बहुमत के लिए 148 सीटें चाहिए।

मुस्लिम मतदाता
जहां तक सामाजिक वर्गों के समर्थन का सवाल है तो राज्य के करीब 40 फीसदी मुसलमानों का एकमुश्त समर्थन ममता बनर्जी के साथ हैऔर इसके साथ ही ग्रामीण मतदाताओं का बहुतायत रुझान अभी भी ममता बनर्जी की ही ओर है। जबकि शहरी मतदाताओं में सेंध लगाने में भाजपा को कुछ कामयाबी मिली है। भाजपा खेमा इस बात से उत्साहित है कि लोकसभा चुनावों में बड़ी संख्या में न सिर्फ माकपा और कांग्रेस के कार्यकर्ता और समर्थक उसके साथ आए बल्कि तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता भी लगातार भाजपा के साथ आ रहे हैं।

लेकिन तृणमूल कांग्रेस के एक नेता जो ममता बनर्जी के बेहद करीबी हैं ने नाम न छापने की शर्त पर दावा किया कि भारी संख्या में तृणमूल के स्थानीय स्तर के कार्यकर्ता जो लोकसभा चुनावों के दौरान पाला बदलकर भाजपा के साथ चले गए थे, वापस तृणमूल में लौट रहे हैं, लेकिन उनकी कोई खबर राष्ट्रीय मीडिया में जगह नहीं पाती है।वहीं तृणमूल का कोई नेता भाजपा में जाता है तो कई दिन तक मीडिया में यही खबर रहती है।

भाजपा का घटता मत प्रतिशत
तृणमूल रणनीतिकार प्रशांत किशोर हालाकि अपनी चुनावी रणनीति को लेकर मीडिया में बहुत ज्यादा नहीं बोलते हैं, लेकिन उनकी टीम से जुड़े लोगों का कहना है कि 2019 के लोकसभा चुनावों के बाद जितने भी चुनाव देश में हुए सबमें लोकसभा चुनावों की तुलना में भाजपा का मत प्रतिशत कम हुआ है। महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड, दिल्ली और बिहार इसके उदाहरण हैं। यहां तक कि अगर लोकसभा चुनावों के मत प्रतिशत से तुलना करें तो जम्मू कश्मीर के जिला विकास परिषदों के चुनावों और मध्य प्रदेश के उपचुनावों में भी भाजपा का मत प्रतिशत कम हुआ है।

इसी आधार पर टीम पीके दावा करती है कि पश्चिम बंगाल में भी भाजपा को विधानसभा चुनावों में वह जन समर्थन नहीं मिलेगा जो लोकसभा चुनावों में मिला था। तब मुद्दे और परिदृश्य अब से अलग थे। उधर भाजपा खेमा एमआईएम नेता असउद्दीन ओवैसी के चुनावी मैदान में उतरने से उत्साहित है और उसे लगता है कि बिहार की ही तरह ओवैसी यहां भी मुस्लिम मतों में बंटवारा करके भाजपा की राह आसान करेंगे। लेकिन टीम पीके इसे खारिज करती है।

उसका मानना है कि बिहार के सीमांचल में ओवैसी मुस्लिम वोटों को बांटने में इसलिए कामयाब हो सके क्योंकि वहां राजद-कांग्रेस गठबंधन के उम्मीदवार कई सीटों पर अपनी जीत का भरोसा नहीं दिला पाए। जबकि पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी मुस्लिमों की पहली और आखिरी पसंद हैं। फिर तेलुगू अंग्रेजी और हिंदी बोलने वाले ओवैसी बंगला भाषियों के बीच कितना असर डाल पाएंगे यह भी बड़ा सवाल है। उधर कांग्रेस और वाम मोर्चे ने मिलकर चुनाव लड़ने की जो घोषणा की है उससे भी तृणमूल खेमा उत्साहित है।

उसका कहना है कि अगर वाम दल और कांग्रेस अपने कार्यकर्ताओं और जनाधार को जो लोकसभा चुनावों में भाजपा के साथ चले गए थे, अपने साथ रोकने में कामयाब रहे तो भाजपा के लिए लोकसभा चुनावों जैसे नतीजे दोहराना मुमकिन नहीं होगा। वहीं भाजपा नेताओं को लगता है कि वाम मोर्चे और कांग्रेस के मजबूत होने से भाजपा विरोधी मतों में बंटवारे का लाभ उसे मिल सकता है। कुल मिलाकर पश्चिम बंगाल के चुनाव में भले ही अभी चार महीने बाकी हैं, लेकिन राज्य की सियासत में जिस तरह तृणमूल और भाजपा के बीच लड़ाई तेज होती जा रही है उससे लगता है कि चुनाव नजदीक आते आते पश्चिम बंगाल में सियासी घमासान कई गुल खिलाएगा।
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