पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के आरएसएस मुख्यालय नागपुर में दिए जाने वाले भाषण पर सबकी नजर है। संघ और भाजपा खेमा प्रणब के भाषण को अपनी विचारधारा के लिए एक नया प्रमाण पत्र के रूप में देखना चाहेगा जबकि कांग्रेस और गैर भाजपा धर्मनिरपेक्ष ताकतें इस मुद्दे पर विभाजित हैं।
कांग्रेस नेता अहमद पटेल संदीप दीक्षित और खुद मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी ने प्रणब के संघ मुख्यालय जाने पर ऐतराज जताया तो वहीं पी चिदंबरम वीरप्पा मोइली ने उम्मीद जताई कि प्रणब संघ नेताओं को आइना दिखाते हुए कांग्रेस की धर्मनिरपेक्ष विचारधारा और संविधान के मूल्यों की नसीहत देंगे। खुद प्रणब ने कहा कि इस मुद्दे पर वो अपनी बात संघ मुख्यालय में ही कहेंगे।
अपने पचास से ज्यादा लम्बे राजनीतिक जीवन में प्रणब मुखर्जी गांधी नेहरू के विचारों और इंदिरा गांधी के कट्टर समर्थक कांग्रेस नेता रहे हैं। पार्टी पदाधिकारी और सरकार के मंत्री के रूप में उन्होंने कई बार संघ और उसकी विचारधारा की कड़ी आलोचना की है।
दिल्ली महाधिवेशन के जिस राजनीतिक प्रस्ताव में संघ की विचारधारा को साम्प्रदायिक बताने जुटे हिंदू कट्टरवाद के खतरे पर चिंता व्यक्त करते हुए उसे चुनौती माना गया उसे मुखर्जी ने ही तैयार किया और पढ़ा था। कांग्रेस के इतिहास पर मुखर्जी और आनंद शर्मा द्वारा सम्पादित पुस्तक में भी संघ को आड़े हाथों लिया गया है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी संघ पर लगातार हमलावर हैं। ऐसे में लोगों की दिलचस्पी है कि क्या मुखर्जी संघ की प्रशंसा करके अपने पांच दशक के वैचारिक प्रतिबद्धता से अलग हटेंगे या संघ को आइना दिखाते हुए खरी खरी सुनाएंगे।