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प्रभु के वादों की रेल खूब दौड़ी, लेकिन असली रेल पटरियों से उतर रही है

Thu, 29 Dec 2016 04:34 AM IST
नवनीत शरण/ नई दिल्ली, 28 दिसंबर
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प्रभु की रेल वायदों की पटरी पर तो खूब दौड़ रही हे लेकिन जमीनी ट्रैक पर दौडने वाली ट्रेन बार-बार पटरियों से उतर रही है। कानपुर के समीप लगातार दूसरी बार ट्रेन की पटरी से उतरना इस बात की गवाही देता है कि रेल की सफर में यात्री राम भरोसे ही यात्रा कर रहे है। जबकि हाई स्पीड व बुलेट ट्रेन का सपना उन्हें दिखाया जा रहा है।
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रेलवे मंत्रालय बुलेट ट्रेन चलाने, हाई स्पीड ट्रेन चलाने, कोहरे में भी रफ्तार में ब्रेक नहीं लगे इसके लिए त्रिनेत्र तकनीक का विकास करने समेत कई सब्जबाग दिखा रहा है। दो सौ किलोमीटर की रफ्तार से चलने वाली एलएचबी कोच के निर्माण का दावा किया जा रहा है, तेजस, गतिमान जैसी हाई स्पीड ट्रेन चलाने की बात की जा रही है लेकिन  आज भी वर्षों पुरानी पटरी पर ही ट्रेनें दौड़ रही है। 

सात हजार के करीब कोच 20 साल से अधिक पुराने है। जो यात्रियों को ढो रहे है। कोच मेंटेंनेंस, पुराने व जर्जर पुल, मानवरहित क्रॉसिंग, संरक्षा कर्मियों की कमी समेत कई संरक्षा के उपायों पर गति से अभी भी योजना नहीं दौड़ पा रही है।
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अभी भी रेलपथ पर कार्य कर रही पटरी/वेल्डिंग की विफलता का पता लगाने के लिए अल्ट्रासोनिक ब्रोकन रेल डिटेक्श्श्न सिस्टम के परीक्षण की बात की जा रही है, इसका  नतीजा दुर्घटना में लोगों की मौत हो रही है, बड़ी संख्या में लोगे घायल हो रहे है। दिल्ली के लोहे के पुल के साथ नये पुल का निर्माण होने  में ही दशक गुजरब गए, लेकिन योजना अभी भी अधर में ही है।

पुराने व जर्जर पुल की बात करें तो पुरानी दिल्ली स्थित लोहे का पुल डेढ़  सौ साल से भी अधिक पुराना हो गया है, 2006 में ही इस पुल को खत्म कर नया पुल यमुना पर बनाने का वादा किया गया था, लेकिन रयह योजना भी खटाई में ही है। देशभर में करीब 1 लाख 33 हजार 612 के करीब छोटे-बड़े पुल है। इनमें ज्यादातर पुल अंग्रेजों के बनाए हुए है। रेलवे मंत्रालय भले ही मरम्मत की बात करके अपना पल्ला झाड़ ले, लेकिन सच्चाई यह है कि वैकल्पिक मार्ग बेहद ही आवश्यक है।
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वित्त मंत्रालय ने रेलवे को पैसे देने से किया इंकार

- फोटो : अमर उजाला
अमेरिका और चीन के बाद दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा रेल सिस्टम माना जाता है, बावजूद भारतीय रेल अब भी ज्यादातर ब्रिटिश काल के इंफ्रास्टक्चर पर चल रही है। पटरियों पर रेलवे ट्रैफिक का दबाव बढ़ रहा है, लेकिन इंफ्रास्ट्रक्चर अपग्रेड नहीं हो रहा है। रेलवे के सामने सेफ्टी एक बड़ा मसला बना हुआ है। सिग्नलिंग सिस्टम में चूक और एंटी कॉलीजन डिवाइसेज की कमी से भी आए दिन हादसे होते रहते हैं।

वित्त मंत्रालय का भी उदासीन रवैया
उधर, वित्त मंत्रालय भी संरक्षा को लेकर उदासीन रवैया अपना रही है। अगले पांच वर्षो में संरक्षा संबंधी कार्यो के लिए रेलवे मंत्रालय ने 119183 करोड़ रुपये के ग्रेडेड राष्ट्रीय रेल संरक्षा कोष (आरआरएसके) के सृजन के लिए पुन:विचार के लिए मंत्रालय के पास भेजा था। लेकिन वित्त मंत्रालय इस मांग पर महज 25 प्रतिशत के ही करीब राशि देने पर सहमति जताई। 

रेलवे से यह कह दिया गया कि बाकि पैसा खुद से सृजित करे। जबकि इस आरआरएसके केतहत रेलपथ नवीकरण, पुलों का पुन: स्थापन और रेल लाइन अलग करने, सिग्नल प्रणाली ठीक करने, गाड़ी सुरक्षा चेतावनी प्रणाली सहित कई काम का खाका तैयार किया गया है। ताकि ट्रेनों के होने वाले टक्कर, पटरी से उतरने, दुर्घटना को रोकने के लिए तकनीक का विकास किया जा सके। बता दें कि अब रेलवे का अपना कोई बजट नहीं होगा। आम बजट के साथ ही रेल बजट भी पेश किया जाएगा।
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