2017 में पुलवामा के लेथपोरा स्थित सीआरपीएफ कैंप पर हुए हमले में जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों ने 'आर्मर पियर्सिंग इन्सेंडरी' का पहली बार इस्तेमाल हुआ था। आर्मी या किसी अन्य फोर्स में 'आर्मर पियर्सिंग इन्सेंडरी' का इस्तेमाल, गैर-कानूनी है। यहां तक कि 'नाटो' ने भी स्टील की गोलियों पर प्रतिबंध लगाया हुआ है। चीन और पाकिस्तान में ये गोलियां प्रयोग में लाई जाती हैं। पिछले साल पुंछ में हुए जिस आतंकी हमले में सेना के पांच जवान शहीद हुए थे, वहां भी आतंकियों ने इन्हीं गोलियों का इस्तेमाल किया था। 7.62 एमएम स्टील कोर की गोलियां चीन में निर्मित हैं। वहां से इन गोलियों को पाकिस्तान में लाया जाता है। उसके बाद वहां के सक्रिय आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैयबा, आईएसआई की मदद से स्टील की गोलियों को सीमा पार भेजने का प्रयास करते हैं। आर्मर पियर्सिंग इन्सेंडरी की मारक क्षमता तीन सौ मीटर तक बताई जाती है।
आतंकी समूह इसका इस्तेमाल नजदीक की लड़ाई में करते हैं। महज कुछ मीटर दूरी से एके-47 या इसी सीरिज की किसी दूसरी राइफल से इसका फायर किया जाता है। जब 'लेवल 3' वाले बुलेटप्रूफ वाहन, मोर्चा, जैकेट और पटका आदि पर ये गोलियां दागी जाती हैं, तो वे आर-पार चली जाती हैं। उसे किसी वाहन, मोर्चा या बुलेटप्रूफ जैकेट पहने व्यक्ति पर चलाते हैं, तो वह उसे भेदते हुए दूसरे सिरे से बाहर निकल जाती हैं। मौजूदा समय में हर जगह पर 'लेवल-4' बुलेटप्रूफ कवच नहीं है। इस कवच को केवल चुनींदा ऑपरेशन में ही इस्तेमाल किया जाता है। 2017 में लेथपोरा स्थित सीआरपीएफ कैंप पर हुए हमले में जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों ने इन्हीं गोलियों का इस्तेमाल कर सुरक्षा बलों को नुकसान पहुंचाने का प्रयास किया था। कई जवानों, जिन्होंने बुलेटप्रूफ जैकेट पहन रखी थी, उसे 'आर्मर पियर्सिंग इन्सेंडरी' ने भेद दिया था। इसके अलावा वहां लगे मोर्चे भी उसकी मार को नहीं झेल सके थे।
सुरक्षा एजेंसियों के सूत्रों के मुताबिक, 2021 में अमेरिका के अफगानिस्तान छोड़ने के बाद 'नाटो' सेनाओं के अनेक हथियार और गोला-बारूद वहीं पर छूट गए थे। तालिबान के कब्जे में आए वे घातक हथियार, अब पाकिस्तान के रास्ते जम्मू-कश्मीर तक पहुंच रहे हैं, ऐसी संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। गत वर्ष के पुंछ हमले के दौरान यह बात सामने आई थी कि तालिबान के पास मौजूद अमेरिकन M16 राइफल और M4 कार्बाइन जैसे हथियार, जम्मू-कश्मीर में सक्रिय पाकिस्तानी आतंकी संगठन 'लश्कर- ए-तैयबा' और 'जैश-ए-मोहम्मद' के हाथ लगे हैं।
अफगानिस्तान से नाटो सैनिकों के वापस लौटने के बाद '85 बिलियन डॉलर' के एयरक्रॉफ्ट, बख्तरबंद गाड़ियां, रॉकेट डिफेंस सिस्टम, मशीन गन और असॉल्ट राइफल सहित भारी मात्रा में गोला बारूद पर तालिबान का कब्जा हो गया था। तब अमेरिका ने दावा किया था कि उसने तालिबान के हाथ लगे अपने अत्याधुनिक एयरक्रॉफ्ट, बख्तरबंद गाड़ियां व रॉकेट डिफेंस सिस्टम को निष्क्रिय कर दिया है।
इसके बावजूद अफगानिस्तान में 'चार सी-130 ट्रांसपोर्ट्स एयरक्राफ्ट, 23 एम्ब्रेयर ईएमबी 314/ए29 सुपर सुकानो, 28 सेसेना 208, 10 सेसेना एसी-208 स्टाइक एयरक्रॉफ्ट' फिक्सड् विंग एयरक्रॉफ्ट बताए गए हैं। इनके अलावा 33 एमआई-17, 33 यूएच-60 ब्लैकहॉक व 43 एमडी 530 हेलीकॉप्टर भी हैं। अमेरिकी 22174-ह्मवे, 634 एमआई 117, 155 एमएक्सएक्स प्रो माइन प्रूफ व्हीकल, 169 एमआई 13 आर्म्ड पर्सनल कैरियर, 42000 पिक अप ट्रक एंड एसयूवी, 64363 मशीन गन, 8000 ट्रक, 162043 रेडियो, 16035 नाइट गॉगल, 358530 असॉल्ट राइफल, 126295 पिस्टल और 176 आर्टलरी पीस भी तालिबान के कब्जे में होने की बात सामने आई थी।
अमेरिका सेना, एम16 स्वचालित राइफलें, साठ के दशक से इस्तेमाल करती रही है। वियतनाम युद्ध, ग्रेनाडा पर आक्रमण, खाड़ी युद्ध, सोमाली गृह युद्ध, इराक और अफगानिस्तान में लड़ाई के दौरान अमेरिकी सेना इसी राइफल से लैस थी। इस राइफल का वजन 7.18 पौंड (3.26 किग्रा) (अनलोडेड) और 8.79 पौंड (4.0 किग्रा) (भारित) है। एम16 से 700-950 राउंड/मिनट फायर हो सकते हैं। M4 भी नब्बे के दशक से अमेरिका सेना में है। इन कार्बाइन को भी अफगानिस्तान युद्ध, इराक युद्ध, कोलंबियाई सशस्त्र संघर्ष, दक्षिण ओसेशिया युद्ध, लेबनान युद्ध, मैक्सिकन ड्रग युद्ध और दूसरे कई ऑपरेशनों में इस्तेमाल किया गया था। इसका वजन 6.36 पौंड (2.88 किग्रा) खाली, 6.9 पौंड (3.1 किग्रा) 30 राउंड मैगजीन के साथ होता है। इसमें से 700-950 राउंड/मिनट फायर होते हैं।