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पंजाब से पश्चिम बंगाल तक करनी होगी 'सफाई', तभी खुलकर सांस ले पाएगी दिल्ली

Tue, 19 Nov 2019 08:21 PM IST
Nilesh Kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

  • वायु प्रदूषण के मामले में दिल्ली अकेला शहर नहीं, कई शहरों का हाल बुरा
  • उत्तर भारत की नदियों किनारे बसे शहरों में सबसे ज्यादा प्रदूषित है गाजियाबाद
  • उत्तर भारत की नदियों किनारे बसे शहरों के लिए एकीकृृत योजना की है जरुरत
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अमर उजाला ग्राफिक्स - फोटो : रोहित झा
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विस्तार
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देश की राजधानी दिल्ली पिछले कई दिनों से जहरीली हवा में सांस लेने की मजबूरी को लेकर चर्चा में है। सिर्फ दिल्ली ही नहीं 1 से 15 नवंबर के दौरान एनसीआर में आने वाले गाजियाबाद, नोएडा से लेकर जींद तक की हालत खराब रही। इसे लेकर विदेशों तक चर्चा हुई।

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मगर कोई भी इसका स्थाई समाधान नहीं ढूंढ पा रहा है। इसके पीछे का प्रमुख कारण यह भी है कि सभी का फोकस दिल्ली पर ही है। जबकि विशेषज्ञों के मुताबिक दिल्ली की हवा को सांस लेने लायक बनाने के लिए पंजाब से लेकर पश्चिम बंगाल तक सफाई करनी होगी। इसके लिए हमें भविष्य को देखते हुए रणनीति अपनानी होगी। 

उत्तर भारत के दर्जनों शहर प्रदूषित : 

देशभर में सिर्फ दिल्ली के प्रदूषण को लेकर चर्चा है जबकि उत्तर भारत से निकलने वाली नदियों के किनारे बसे कई शहरों में यह समस्या है। 'अर्बन साइंस' ने 26 शहरों की वायु गुणवत्ता का अध्ययन किया। इसमें गाजियाबाद की हवा सबसे ज्यादा प्रदूषित मिली।

प्रदूषण के स्तर को अधिक से कम के अनुसार देखा जाए तो ये 26 शहर बाएं से दाएं (लेफ्ट टू राइट)इस क्रम में दिखेंगे।  
गाजियाबाद नोएडा ग्रेटर नोएडा जिंद दिल्ली हिसार पानीपत
गुड़गांव फरीदाबाद कानपुर मेरठ लखनऊ पटना कुरुक्षेत्र
मुरादाबाद मु्जफ्फरनगर वाराणसी पटियाला गया अमृृतसर जलंधर
लुधियाना आगरा चंडीगढ़ कोलकाता पंचकुला    
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विशेषज्ञों का कहना है कि यदि साल 2024 तक पीएम 2.5 का स्तर 25 फीसदी तक कम करना है तो इसके लिए 'एयरशेड प्रबंधन दृष्टिकोण' की आवश्यकता है। एयरशेड प्रबंधन दृष्टिकोण ऐसा प्रयास है, जिसे भविष्य में वायु प्रदूषण की समस्या से बचने और हवा की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए डिजाइन किया गया है। 300 करोड़ की लागत से केंद्र सरकार द्वारा शुरू किए गए राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) के लक्ष्य के तहत ऐसा करना जरुरी होगा। 

दक्षिण भारत की हवा में पीएम 2.5 की मात्रा कम

साल 2000 से लेकर 2018 तक देश भर में पीएम 2.5 का स्तर देखें, तो दक्षिण भारत के मुकाबले उत्तर भारत में वायु प्रदूषण काफी अधिक है। गुजरात, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा के शहरों की हवा में पीएम 2.5 की मात्रा 10 से लेकर 50 तक है। कर्नाटक और आंधप्रदेश में भी वायु प्रदूषण का स्तर गंभीर नहीं है। वहीं तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों और कर्नाटक के कुछ शहरों की हवा में पीएम 2.5 की औसतन मात्रा 20 से भी कम है। 

उत्तर भारत में स्थिति बहुत खराब

उत्तर भारत की नदियों किनारे बसे शहरों की स्थिति ज्यादा खराब है। हवा में पीएम 2.5 की औसतन मात्रा यहां 80 से 90 के बीच रही है। पंजाब से लेकर हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के शहरों की हवा अपेक्षाकृत ज्यादा प्रदूषित है। वहीं, पूर्वोत्तर राज्यों में वायु प्रदूषण की स्थिति ज्यादा गंभीर नहीं है। पूर्वोत्तर भारत के कई शहरों की हवा में पीएम 2.5 की औसतन मात्रा 20 से भी कम रही है। 

छोटे शहरों पर करना होगा फोकस

दिल्ली की एक संस्था 'क्लाइमेट ट्रेंड्स' की ओर से आयोजित एक परिचर्चा कार्यक्रम में विशेषज्ञों और प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों के प्रतिनिधियों ने राज्यों के बीच बेहतर सहयोग और ऐसे छोटे शहरों पर अधिक से अधिक ध्यान केंद्रित करने की मांग की, जहां उच्च उत्सर्जन को कम किया जा सकता है। 

आईआईटी दिल्ली के शिक्षक और स्वच्छ हवा अनुसंधान केंद्र(सीईआरसीए) के समन्वयक डॉ साग्निक डे का कहना है कि दिल्ली में उच्च प्रदूषण की समस्या एक दशक पहले सर्दियों में प्रचलित नहीं थी क्योंकि पड़ोसी शहरों और शहरों से  उत्सर्जन इतना अधिक नहीं था। हाल के दिनों में यह बहुत ज्यादा हो गया है और अब नियंत्रण से बाहर होता जा रहा है। 

डॉ साग्निक कहते हैं कि देशभर में गंगा के मैदानी इलाकों को एक विशाल क्षेत्र मानने की आवश्यकता है और वायु गुणवत्ता सुधार की योजना केवल एक शहर के लिए नहीं, बल्कि इस पूरे विशाल क्षेत्र के लिए बनाने की जरुरत है। 

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गुरुग्राम में छाई धुंध(फाइल फोटो) - फोटो : अमर उजाला

ग्रामीण क्षेत्र के आंकड़े उपलब्ध नहीं

डॉ साग्निक डे का कहना है कि आंकड़ों में अंतराल हो, तो जमीनी स्तर पर एक्शन नहीं लिया जा सकता। हम आंकड़ों के युग में रहते हैं और अभी भी पूरे ग्रामीण भारत के लिए वायु प्रदूषण के आंकड़े हमारे पास उपलब्ध ही नहीं हैं। 

उनका कहना है कि वायु प्रदूषण की समस्या को व्यापक रूप से दूर करने के लिए, हमें क्षेत्रों में हवा और उनके प्रदूषण के आधार पर एयरशेड के परिसीमन की जरूरत है। शहरी कार्ययोजना बनाने के दौरान इसे प्रभावी बनाने के लिए एयरशेड प्रबंधन रणनीति को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए। 

आईआईटी-दिल्ली द्वारा 2012 में उत्तर भारत से निकलने वाली नदियों के तटीय मैदानी क्षेत्र के बारे में किए गए एक अध्ययन में सामने आया था कि पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, यूपी और बिहार से लेकर पश्चिम बंगाल तक इन इलाकों में सबसे ज्यादा प्रदूषण होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह पूरा क्षेत्र बेहद जटिल भौगोलिक और पर्यावरणीय स्थितियों की वजह से विपरीत परिस्थितियों का निर्माण करता है।

शहरी विज्ञान के सीईओ रौनक सुतारिया कहते हैं कि पूरे क्षेत्र में निगरानी बढ़ाने की आवश्यकता है। पीजीआईएमईआर, चंडीगढ़ के स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के प्रोफेसर डॉ. रवींद्र खाईवाल ने प्रदूषण कम करने के लिए लोगों को प्रोत्साहित किए जाने का सुझाव दिया। उनका कहना है कि प्रदूषण कम करने के लिए जन सहभागिता के बिना योजनाएं सफल नहीं हो सकती। 
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