टीआरएस से बीआरएस बनी मुख्यमंत्री केसीआर की पार्टी ने जहां विपक्ष को एकजुट करने की बड़ी भूमिका शुरू की। वहीं, जातिगत समीकरणों को साधते हुए भी केसीआर ने सियासी तीर चल दिया है। भारतीय जनता पार्टी ने भी अपने बड़े रणनीतिकारों को तेलंगाना की जमीन पर उतारकर सियासी ताप और सियासी चाल को समझते हुए संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करना शुरू कर दिया है।
तेलंगाना में इस साल होने वाले विधानसभा के चुनावों और अगले साल होने वाले लोकसभा के चुनाव से पहले सियासी जमीन में खूब खाद पानी दिया जा रहा है। राजनैतिक जमीन उर्वरा हो इसके लिए जातिगत समीकरणों से लेकर इलाकाई समीकरणों को भी ढंग से साधा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने विपक्ष को एकजुट करने के लिए जिस तरीके से तैयारियां की हैं, उससे तो अंदाजा लगाया जा रहा है कि अगले साल होने वाले लोकसभा के चुनावों की सियासत में यह जमीन ठीक-ठाक खाद पानी देने भर का काम कर लेगी।
तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर ने रविवार को अपने राज्य के नए सचिवालय का शुभारंभ किया। कहने को तो यह राज्य की एक बड़ी और आईकॉनिक बिल्डिंग तैयार हुई है, लेकिन सियासत की नजर में इसको अलग नजरिए से देखा जा रहा है। दरअसल, केसीआर ने इस राज्य सचिवालय के भवन का नाम डॉक्टर भीमराव अंबेडकर के नाम पर रखा है। राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार दशरथ रेड्डी कहते हैं कि राज्य के दलितों के एक बड़े वोट बैंक पर नजर रखते हुए यह फैसला सत्तारूढ़ दल के लिए फायदे का सौदा हो सकता है। वाह कहते हैं कि सिर्फ यही नहीं भीमराव अंबेडकर के नाम पर पार्टी दलितों में देश में एक बड़े वोट बैंक को साधने की रणनीति भी बना रही है
रेड्डी कहते हैं कि तेलंगाना में केसीआर ने जातिगत समीकरणों को साधते हुए अपने राज्य की सियासी जमीन को इस कदर उर्वरा बनाने की कोशिश की है कि वह सिर्फ विधानसभा ही नहीं बल्कि लोकसभा के चुनावों में भी उसके बेहतर परिणाम की उम्मीद कर रहे हैं। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि तेलंगाना के मुख्यमंत्री अपने कोर वोट बैंक के साथ-साथ दलितों की राजनीति को केंद्र में रखकर न सिर्फ तेलंगाना की सियासत को खाद पानी देकर खींच रहे हैं बल्कि केंद्र की राजनीति के लिहाज से भी बड़ा पॉलिटिकल शॉट मारने की तैयारी कर रहे हैं।
पार्टी से जुड़े सूत्रों का कहना है कि अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों के नजरिए से ही पार्टी अपनी पूरी फील्डिंग सजा रही है। इसमें सबसे ज्यादा देश के बड़े विपक्षी नेताओं को एकजुट करके तेलंगाना से विपक्षी दलों की एकता का एपीसेंटर बनाने की तैयारी में बीआरएस लगी है। पार्टी से जुड़े नेताओं का कहना है कि तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर ने अपनी पार्टी का नाम तेलंगाना राष्ट्र समिति से बदलकर भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) खुद को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने के लिहाज से ही किया है। अब इस को आगे बढ़ाने के लिए पार्टी की कोर कमेटी से जुड़े हुए नेता राज्य में ना सिर्फ खेती, सिंचाई, उद्योग, सड़कें और इंफ्रास्ट्रक्चर की पूरी प्लानिंग के साथ राज्य के लोगों से मुखातिब हो रहे हैं बल्कि उसी प्रारूप को दूसरी राजनीतिक पार्टियों के साथ साझा भी कर रहे हैं।
बीते कुछ समय से लोकसभा चुनावों के लिए विपक्षी नेताओं की एकता के लिए दक्षिण के राज्यों से ऑक्सीजन देकर माहौल बनाया जा रहा है। इसकी शुरुआत सबसे पहले तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर ने की। इसी साल जनवरी में तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर ने देश के प्रमुख विपक्षी नेताओं को एक कार्यक्रम में आमंत्रित किया। जिसमें उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान केरल के मुख्यमंत्री पीनारायी विजयन समेत कम्युनिस्ट पार्टी और अन्य देश के अलग-अलग राज्यों की रीजनल पार्टी के नेताओं को बुलाया गया।
बीआरएस पार्टी से जुड़े एक वरिष्ठ नेता बताते हैं कि विपक्षियों को एकजुट करने के लिए भले जनवरी में तेलंगाना की जमीन को चुना गया लेकिन पार्टी ने तो कई साल पहले ही सबको एक साथ लेकर चलने की योजना बना ली थी। पार्टी से जुड़े उक्त वरिष्ठ नेता का कहना है कि इस पूरे अभियान में मुख्यमंत्री की बेटी कविता की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। क्योंकि पार्टी ने कविता को देश के अलग-अलग राज्यों की पार्टियों और नेताओं के साथ समन्वय कर सब को एक साथ जोड़ने की मुहिम में लगाया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव तो कर्नाटक में इस समय हो रहे हैं लेकिन कर्नाटक के चुनावों का असर देश की राजनीति को इसलिए बहुत प्रभावित नहीं करने वाला है क्योंकि जो सियासी ताना-बाना तेलंगाना से बुना जा रहा है वह कर्नाटक से नहीं चल रहा है। राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार बीबी सिंह कहते हैं कि दरसल कर्नाटक में जिन दो बड़ी भाजपा और कांग्रेस पार्टियों के बीच में लड़ाई हो रही है उनका पहले से ही मुकाबला होता आया है। लेकिन तेलंगाना में स्थिति बिल्कुल विपरीत है।
बीबी सिंह कहते हैं कि यहां पर भारतीय जनता पार्टी की सीधी लड़ाई बीआरएस से हैं। और बीआरएस वह पार्टी है जो देश के सभी प्रमुख बड़े विपक्षी राजनीतिक दलों को एक मंच पर लाने की तैयारी कर रही है। बीबी सिंह कहते हैं कि यही वजह है कि जो सियासी पारा तेलंगाना की जमीन से गर्म हो रहा है उसका असर देश की राजनीति पर खास तौर से विपक्षी दलों को एकजुट करने के लिहाज से सबसे ज्यादा पड़ सकता है। यही वजह है कि भारतीय जनता पार्टी ने भी इन सभी सियासी समीकरण को समझते हुए अपने उन तमाम कद्दावर जमीनी रणनीतिकारों को कई महीने पहले तेलंगाना की जमीन पर उतार दिया है जो देश के अलग-अलग राज्यों में पहले से ही सियासी समीकरणों को समझते हुए भारतीय जनता पार्टी को जीत दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते आए है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इस साल के अंत में होने वाले तेलंगाना विधानसभा के चुनाव अगले साल होने वाले लोकसभा चुनावों की सियासी पटकथा को लिखने में मजबूत भूमिका निभाएंगे। राजनीतिक विश्लेषक रामाबाली टीएन कहते हैं कि एक तो बीआरएस पहले से ही सभी सियासी राजनीतिक दलों को एकजुट करने की तैयारी में लगी हुई है। समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव से लेकर आम आदमी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, जेडीयू, आरजेडी समेत तमाम विपक्षी दलों को जोड़ने के लिए पार्टी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की ना सिर्फ योजनाएं बना रही है बल्कि उसको अलग-अलग प्लेटफार्म पर ला भी रही है। राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे में भारतीय जनता पार्टी तेलंगाना के सियासी ताप को रोकने की वह सभी कोशिश भी कर रही है जिससे उसका असर नॉर्थ इंडिया खासतौर से बड़े विपक्षी दलों को एकजुट करने में सफल ना हो सके।
राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार पीआर राव बताते हैं कि दक्षिण के राज्यों को अगर सियासी नजरिए से देखें तो तेलंगाना एक ऐसा राज्य है जिसमें भारतीय जनता पार्टी के लिए दक्षिण में एंट्री की बड़ी संभावनाएं नजर आ रहीं हैं। पिछले लोकसभा चुनावों में जिस तरीके से तेलंगाना में भारतीय जनता पार्टी का वोट प्रतिशत बढ़ा था उसी को और आगे ले जाने की तैयारी में है। भारतीय जनता पार्टी ने अपने उन सभी बड़े प्रमुख रणनीतिकारों को तेलंगाना की जमीन पर कई महीने पहले ही उतार दिया है जो देश के अलग-अलग राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उनका मानना है कि तेलंगाना में बीआरएस, कांग्रेस या अन्य राजनीतिक दलों के अलावा भारतीय जनता पार्टी की अगर मजबूत एंट्री होती है तो दक्षिण के गढ़ में बीजेपी अपनी मजबूत पकड़ के साथ आगे के सियासी सफर को आसान कर सकती है।