करीब ढाई दशक बाद आम चुनाव में राम मंदिर मुद्दा एक बार फिर से बड़ा चुनावी मुद्दा बनने की ओर अग्रसर है। सुप्रीम कोर्ट के आम चुनाव के ठीक पहले मध्यस्थता के जरिए विवाद सुलझाने की कोशिश और इस संबंध में तीन सदस्यीय मध्यस्थता कमेटी केगठन के बाद सियासी दलों को चुनाव में अयोध्या मुद्दे का टॉनिक मिल गया है। हालांकि इस मुद्दे पर त्वरित फैसले की राह अब भी आसान नहीं है। किसी भी सूरत में आम चुनाव के पहले फैसला आने की संभावना पूरी तरह खत्म हो गई है। दरअसल त्वरित फैसला तभी संभव है जब तीन सदस्यीय मध्यस्थता समिति सर्वसम्मत फैसला लेने पर सहमत हो जाए।
दरअसल मध्यस्थता समिति प्राथमिक रिपोर्ट चार महीने में तो अंतिम रिपोर्ट आठ महीने में देगी। यह वह समय होगा जब आम चुनाव का प्रचार अपने चरम पर होगा। चुनाव आयोग अगले ही हफ्ते आम चुनाव के कार्यक्रम घोषित करने वाली है। जाहिर तौर पर इस मुद्दे को सत्तारूढ़ पक्ष और विपक्ष अपने अपने तरीकेसे भुनाने की कोशिश करेगा।
त्वरित फैसला हालांकि दूर क कौड़ी
इस विवाद पर त्वरित फैसला न करने केकारण भले ही शीर्ष अदालत भी एक वर्ग केआलोचनाओं का शिकार हुई है। हालांकि मध्यस्थता कमेटी अब भी त्वरित फैसले की गारंटी नहीं है। कम से कम आम चुनाव तक फैसला आने की संभावना दूर दूर तक नहीं है। हां, बातचीत केजरिए इस विवाद को सुलझाने की यह पहली अदालती कोशिश है। इससे पहले इस विवाद केहल के लिए कई बार राजनीतिक कोशिश हुई है। दअसल कमेटी एक हफ्ते बाद अपना काम शुरू करेगी। उसके चार हफ्ते बाद अदालत को प्राथमिक रिपोर्ट और फिर चार हफ्ते बाद अंतिम रिपोर्ट सौंपेगी। अंतिम रिपोर्ट सौंपने तक आम चुनाव संपन्न हो चुकेहोंगे। फिर समिति में विवाद केनिपटारे पर आमसहमति बनने पर ही अदालत फैसला सुनाने पर विचार करेगा। इसकी उलट स्थिति में सारा मुद्दा फिर वहां पहुंच जाएगा जहां से चलना शुरू किया था।
96 के बाद नहीं बना बड़ा मुद्दा
उत्तर भारत में एक समय राम मंदिर मुद्दा सभी मुद्दों पर हावी था। वर्ष 1992 से पहले 1990 में लालकृष्ण आडवाणी की रथयात्रा के बाद 1991 के चुनाव में यह प्रमुख मुद्दा बना। फिर वर्ष 1992 में विवादित ढांचे के विध्वंस के बाद 1996 के चुनाव में भी यह प्रमुख मुद्दा बना। हालांकि इसके थबाद इस मुद्दे की आंच लगातार धीमी पड़ती गई। एएसआई की खुदाई, लश्कर ए तयबा के विवादित स्थल पर आतंकी हमले के बावजूद यह कभी मुद्दों के केंद्र में नहीं आ सका। हालांकि सुप्रीम कोर्ट के मध्यस्थता कमेटी के गठन के बाद एक बार फिर से इसके प्रमुख मुद्दों में शुमार होने की संभावना बढ़ी है।