लुटियन जोन में राजनाथ सिंह और नितिन गडकरी के बयानों के मायने निकाले जा रहे हैं। रविवार 24 जुलाई को राजनाथ सिंह ने बड़े पते की बात कही। तो सोमवार को नितिन गडकरी के बयान ने राजनीति के पंडितों को दंग कर रखा है। इसमें कुछ बयानों में नागपुर का तो किसी राजनीति के नए रंग का दर्शन हो रहा है। यह तो हुई राजनीति से जुड़े लोगों की बात, लेकिन सचिवालयों में अधिकारी भी इसे अलग अंदाज में ले रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि मोदी सरकार में अगले मंत्रिमंडल फेरबदल, विस्तार में कुछ हलचल हो सकती है। रविवार को राजनाथ सिंह गुलशन ग्राउंड में कारगिल विजय दिवस के एक कार्यक्रम में थे। वहां उन्होंने कहा कि पंडित नेहरू की बहुत से लोग आलोचना करते हैं। मैं एक विशेष राजनीतिक दल से आता हूं, लेकिन मैं पंडित नेहरू या किसी भारतीय प्रधानमंत्री की आलोचना नहीं कर सकता। उनकी नीति भले गलत रही, लेकिन नीयत नहीं। राजनाथ सिंह के बयान के ठीक एक दिन बाद नागपुर के एक कार्यक्रम में नितिन गडकरी ने राजनीति छोड़ने तक की मंशा जता दी। यह कहते हुए कि महात्मा गांधी के समय में राजनीति देश, समाज,विकास के लिए होती थी, अब राजनीति सत्ता में बने रहने के लिए हो रही है।
प्रवर्तन निदेशालय ने पश्चिम बंगाल में ऑपरेशन चलाया और पार्थ चटर्जी को गिरफ्तार कर लिया। तृणमूल कांग्रेस के लोगों के लिए यह बड़ी बात नहीं है। इससे बड़ी बात यह है कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के करीबी पार्थ चटर्जी जैसे नेता के गिरफ्तार होने और उनके द्वारा ममता बनर्जी से संपर्क की कोशिशों पर मुख्यमंत्री ने कोई कान ही नहीं दिया। कान देना तो दूर की बात है, अभी तक एक शब्द भी नहीं बोलीं। जबकि यह वही ममता बनर्जी हैं जो 2014 के बाद से लगातार केंद्र सरकार और केंद्रीय एजेंसियों से जमकर पंगा लेती रही हैं। बताते हैं ममता बनर्जी को धक्का लगा है। उन्हें यह नहीं पता था कि उनके बेहद करीबी विश्वासपात्रों में एक वरिष्ठ मंत्री पार्थ चटर्जी गुपचुप कुछ ऐसा भी कर सकते हैं। दूसरी तरफ इस घटना के बाद से भाजपा नेताओं में खुशी की लहर है। उन्हें अब उम्मीद भी दिखाई दे रही है कि जल्द ही ऊंट पहाड़ के नीचे आ सकता है।
मामा शिवराज को स्थानीय निकायों के चुनाव नतीजों ने थोड़ा हैरान किया है। वह मध्यप्रदेश में ऑपरेशन डैमेज कंट्रोल में जुट गए हैं। एक तरफ मामा को 2023 दिखाई दे रहा है, तो दूसरी तरफ उनके प्रतिद्वंदियों को उत्तराखंड का उदाहरण महत्वपूर्ण लग रहा है। उत्तराखंड में चेहरा बदल जाने के बाद जो सत्ता चुनौतीपूर्ण लग रही थी, वह आसानी से झोली में आ गई। मामा को भी पता है कि इंदौर से लेकर भोपाल और ग्वालियर संभाग तक के कई नेताओं की महत्वाकांक्षाएं हैं। उन्हें यह भी पता है कि जब दिल्ली में कुछ तय हो जाता है तो उसे टालने में अब एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ता है। भला हो योगी आदित्यनाथ का जो खुद को बचा ले गए थे। इसलिए मामा के आंख, कान, नाक सब दिल्ली की हर हवा को सूंघने में लगे हैं। ताकि भोपाल में हवा उनके मन मुताबिक ही बहती रहे।
राजस्थान में कांग्रेसियों का एक बड़ा धड़ा गहलोत सरकार के खिलाफ जनता की नाराजगी को आगे रखकर चेहरा बदलने का तर्क दे रहा है। मुख्यमंत्री पद की महत्वाकांक्षा रखने वाले सचिन पायलट के करीबी भी थोड़ा उत्साह में चल रहे हैं। उनके दौसा के एक करीबी का कहना है कि इस साल कुछ अच्छा होने वाला है, जबकि राजस्थान के भरतपुर के एक नेता ने अगस्त महीने तक कुछ खास होने की उम्मीद जताई है। वह कहते हैं कि मुख्यमंत्री गहलोत दिल्ली में समय देंगे। 2024 के लोकसभा चुनाव की चुनौतियों को देखते हुए ऐसा होगा। मुख्यमंत्री गहलोत के एक शुभचिंतक दिल्ली में भी हैं। कभी वह पार्टी के बड़े प्रभावी नेता थे। कहते हैं कि हाल में गहलोत ने बड़ी कामयाबी पा ली है। हालांकि वह कहते हैं कि राजनीति में कुछ भी हो सकता है। लेकिन मुख्यमंत्री गहलोत के पास कुछ 'तिलिस्मी' कला है। वह समय के आखिरी क्षण में बाजी मोड़ लेते हैं। इसलिए जो ख्वाबों में मस्त हों, उनसे कहिए थोड़ा धैर्य भी रखा करें।
ऑपरेशन अखिलेश की चर्चा खूब हो रही है। जितनी सपा में, उतनी ही भाजपा में। चर्चा में विकास से ज्यादा चर्चा सपा प्रमुख के तरीके की हो रही है। यह सबको पता है कि पिछले कुछ समय से लगातार चाचा शिवपाल सिंह यादव और सुभासपा के चीफ ओमप्रकाश राजभर सपा प्रमुख को उकसा रहे थे। उन्हें पता था कि उनके हर मूवमेंट पर अखिलेश की कड़ी नजर है। इसी को भांपते हुए चाचा और राजभर अखिलेश तक सीधे संदेश पहुंचाने वाली भेंट, मुलाकात कर रहे थे। बताते हैं कि अखिलेश को काफी समय से इसका अहसास भी था और वह खीझ भी रहे थे। लिहाजा अपने पीएस गंगाराम के हस्ताक्षर वाले दो पत्र जारी करने का फरमान दे दिया।
अखिलेश का फरमान काफी बड़ा था, जिसमें वह चाचा और राजभर दोनों को नैतिकता की दुहाई देकर तंज भरी जवाबी चोट कर रहे थे। ये उनके करीबियों को भी समझ में नहीं आया कि जब ऐसा संदेश देना था तो खुद पत्र जारी करते। या फिर पार्टी के किसी बड़े जिम्मेदार नेता से कराते? इस बारे में कुरेदने पर पता चला कि अखिलेश यहां धुरंधर राजनीतिज्ञ का संदेश देने की पारी खेल गए। सपा के एक नेता कहना है कि चाचा और राजभर की औकात इतनी ही है कि उन्हें अध्यक्ष का पीएस ही देखे। वहीं राजनीति की बात यह है कि अखिलेश के हस्ताक्षर वाला पत्र तो पार्टी प्रमाणित फरमान होता। जबकि पीएस वाला पत्र पता नहीं क्या है? फरमान या....पार्टी निकाला....या फिर.....।