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राजनीति से ही बाहर हो गया है किसान

Thu, 06 Jul 2017 08:35 PM IST
विनोद अग्निहोत्री/ अमर उजाला, नई दिल्ली
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उत्तम खेती मध्यम बान, निषिध चाकरी भीख निदान । जनकवि घाघ ने जब यह दोहा लिखा होगा तब खेती किसानी न सिर्फ एक सम्मान जनक पेशा था, बल्कि किसान सबसे ज्यादा खुशहाल था।आज से 40-50 वर्ष पहले तक बेटी का रिश्ता करते वक्त लोग यह देखते थे कि जिस घर में बेटी को ब्याहना है, उसकेपास कितनी खेती की जमीन है। लेकिन पिछले कुछ दशकों में हालात इस कदर बिगड़ गए कि न सिर्फ किसान बदहाल होकर खुदकुशी कर रहे हैं बल्कि अब अपनी बदहाली केखिलाफ सड़कों पर भी उतर आए हैं। तकरीबन देश के हर राज्य में किसान असंतोष चरम पर है।
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किसानों की इस बदहाली के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार देश की किसान राजनीति का कमजोर होकर धीरे धीरे हाशिए पर चले जाना है। इसके दोषी वो नेता हैं जो किसानों के नाम पर राजनीति की सीढिय़ां चढ़ते हुए सत्ता की मंजिल तक पहुंचे और फिर उद्योगपतियों की गोद में बैठ गए। इसलिए जब सरकारें अपनी आर्थिक नीतियां बनाती हैं, तो उनमें किसानों की बुनियादी मांगों को पूरा करने की कोई फिक्र नहीं दिखती।  

आज़ादी से पहले स्वामी सहजानंद सरस्वती, बाबा रामचंदर और सर छोटूराम जैसे किसान नेताओं ने जमींदारों द्वारा किसानों के शोषण और दमन केखिलाफ आंदोलन किए और स्वतंत्रता आंदोलन की चिंगारी को गांव गांव पहुंचाया ।
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आज़ादी के बाद कांग्रेस, समाजवादियों और कम्युनिस्टों ने किसानों केसवालों को अपने सियासी एजेंडे में तरजीह दी। हर दल ने अपनी किसान मोर्चों का गठन किया और इन  किसान शाखाओं ने किसानों के बीच काम करते हुए उनकी समस्याओं और सवालों को उठाते हुए किसान राजनीति की शुरुआत की। इस किसान राजनीति को आगे चलकर चौधरी चरण सिंह ने उत्तर भारत में एक संगठित राजनीतिक आंदोलन में बदला।

ग्रामीण और शहरी भारत के आर्थिकअंतरविरोध को धार देते हुए चरण सिंह ने कांग्रेस से अलग होकर धुर किसान राजनीति शुरु की। चरण सिंह की किसान राजनीति और राम मनोहर लोहिया की समाजवादी सोच के गठजोड़ ने देश में एक वैकल्पिक राजनीति को जन्म दिया जिसने साठ के दशक के उत्तराद्र्ध में कांग्रेस को पूरे उत्तर भारत में चुनौती दी।  

लोहिया केनिधन केबाद मध्यमार्गी विचारधारा और खेतिहर जातियों के सामाजिक गठजोड़ की किसान राजनीति की कमान पूरी तरह चरण सिंह के हाथों में आ गई और वह पूरे उत्तर भारत के किसानों के एकछत्र नेता बन गए। इसी दौर में देवीलाल, कुंभाराम आर्य, वीरेंद्र वर्मा, दौलतराम सारण,  बंसीलाल, नाथूराम मिर्धा, रामनिवास मिर्धा, बलराम जाखड़, रामचंद्र विकल, श्यामलाल यादव, जैसे कई किसान नेताओं उत्तर भारत की राजनीति में दबदबा बढ़ा।

पंजाब में शिरोमणि अकाली दल की पंथिक राजनीति का भी मुख्य जनाधार पंजाब केजट किसान ही थे, जिनका नेतृत्व प्रकाश सिंह बादल, सुरजीत सिंह बरनाला, गुरुचरण सिंह तोहड़ा, जगदेव तलवंडी जैसे किसान नेताओं ने किया। महाराष्ट्र में भी यशवंत राव बलवंत राव च्हवाण, वसंत दादा पाटिल, शरद पवार जैसे कई किसान नेता कांग्रेस में आगे आए।  भाकपा और माकपा केकिसान संगठन भी बिहार, प.बंगाल, केरल, समेत पूरे देश में किसानों के मुद्दों को गरम करते हुए सरकारों पर किसानों की अनदेखी न करने का दबाव बनाए रहे।

किसान नेताओं की दूसरी पांत में गैर कांग्रेसी राजनीति मे शरद यादव, राम नरेश यादव, मुलायम सिंह यादव, बेनी प्रसाद वर्मा, केसी त्यागी, त्रिलोक त्यागी, ओमवीर तोमर, जैसे युवा नेता सामने आए जो गांव और किसान पृष्ठभूमि से थे। कांग्रेस में राजेश पायलट, परसराम मदेरणा, शीशराम ओला, बलराम सिंह यादव, शमशेर सिंह सुरजेवाला, वीर बहादुर सिंह, जैसे नेता किसान पृष्ठभूमि से ही आते थे। इसी दौर में पूर्व जनसंघ और बाद में जनता पार्टी से अलग होकर बनी भारतीय जनता पार्टी ने भी किसान राजनीति केमहत्व को समझा और  अपना विस्तार शहरों से गावों तक करते हुए कल्याण सिंह, राजनाथ सिंह, ओमप्रकाश सिंह, कलराज मिश्र, ब्रह्मदत्त द्विेदी जैसे कई ग्रामीण पृष्ठभूमि वाले नेताओं को आगे बढ़ाया। भाजपा के मातृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारतीय किसान संघ का गठन करके किसानों के बीच काम करना शुरु कर दिया। 

लेकिन 1985 के बाद से ही देश की राजनीति में जो नई हवा चलनी शुरु हुई थी उसके असर ने किसान राजनीति को कमजोर करना शुरु कर दिया।  राजीव गांधी की अगुआई वाली कांग्रेस सरकार ने सूचना क्रांति और तकनीक के लिए देश केदरवाजे खोल दिए।

किसान, खेत,खलिहान और गांव की बजाय शहरीकरण, औद्योगिक करण और तकनीकी विकास राजनीति केप्रमुख एजेंडे बन गए। तो दूसरी तरफ संघ परिवार और भाजपा ने अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को अपना सबसे बड़ा एजेंडा बना दिया। गांव गरीब किसान मजदूर की आवाज नई तकनीक कंप्यूटरीकरण की हवा और मंदिर मस्जिद विवाद केशोरगुल में दब गई।

रही सही कसर विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार केदौरान मंडल राजनीति ने पूरी कर दी। सामाजिक न्याय के नाम पर शुरु हुई मंडल राजनीति विशुद्ध जातीय राजनीति में बदल गई और गांव देहात और किसान नेताओं ने अपने वर्गीय जनाधार को जातीय जनाधार में बदलने के लिए खुलकर जाति कार्ड खेलना शुरु कर दिया। मंडल कमंडल के नाम पर जाति और धर्म की राजनीति, सामाजिक न्याय और सोशल इंजीनियरिंग के नाम पर जातियों और उपजातियों की सियासत ने किसानों को भी सामाजिक खांचों में बांट दिया।

उनके आर्थिक सवाल पीछे छूटने लगे। उनका वर्ग चरित्र बदलने लगा और वो हिंदू मुस्लिम, अगड़े पिछड़े वोट बैंकों में बदल गए। चरण सिंह के वारिस किसान नेता न रहकर यादवों, जाटों, गूजरों, कुर्मियों, मराठों, रेड्डी, कम्मा, पटेलों के नेताओं में बदल गए।

राजनीति में किसानों की आवाज कमजोर होने लगी और किसानों ने राजनीतिक दलों के किसान नेताओं को खारिज करना शुरु कर दिया। महेंद्र सिंह टिकैत, शरद जोशी, नंजदुम्मा स्वामी, विपिन भाई देसाई, भूपेंद्र सिंह मान, अजमेर सिंह लाखोंवाल, घासीराम नैन, प्रेम सिंह दहिया, विजय जावंधिया जैसे कई गैर राजनीतिक किसान नेता अलग अलग राज्यों में स्थानीय स्तर पर सामने आए।

भारतीय किसान यूनियन, खेड़ुत समाज, शेतकारी संघटना, कर्नाटक रैयत संघ जैसे स्वतंत्र किसान संगठनों ने इन नेताओं की अगुआई में स्थानीय स्तर से लेकर दिल्ली तक बड़े बड़े धरने और प्रदर्शन किए, जिनमें लाखों किसानों ने शिरकत की। इन स्वतंत्र किसान संगठनों और नेताओं ने सभी दलों और नेताओं से अपनी दूरी बनाकर किसान आंदोलन को अराजनीतिक चरित्र दिया। लेकिन किसानों के इस अराजनीतिक उभार ने किसानों की राजनीतिक ताकत को कमजोर कर दिया।

बिना किसी स्पष्ट राजनीतिक विचार और नेतृत्व वाले इन किसान संगठनों और नेताओं ने भी अपनी निजी सुविधा के मुताबिक समझौते और सौदे किए। शरद जोशी शिवसेना से राज्यसभा के सांसद बनकर सियासी भंवर में विलुप्त हो गए।

टिकैत का किसान आंदोलन एक जाति और फिर एक खाप और बाद में एक परिवार तक सिमट कर रह गया। बाकी किसान नेता भी धीरे धीरे अप्रासंगिक होते चले गए। किसानों के जातीयकरण और अराजनीतिककरण ने उनकी वर्गीय ताकत को खत्म कर दिया, जिससे राजनीति में उनका दबदबा सिर्फ नाम का रह गया। 

इसी दौर में देश में आर्थिक उदारीकरण की आंधी चली जिसने अंतर्राष्ट्रीय समझौतों और दबावों के तहत कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को लेकर ऐसी नीतियों का निर्माण किया जिससे किसानों की तबाही बढती चली गई और खेती किसानी मुनाफे की बजाय घाटे का व्यवसाय हो गया।

आर्थिक उदारीकरण केदौर में आई हर सरकार ने परंपरागत उद्योगों, कृषि आधारित व्यवसायों और गांवों के सकल विकास की बजाय देसी विदेशी कंपनियों के हितों को साधने वाली नीतियां बनाईं। किसानों के जाति और धर्म में बंट जाने से न सिर्फ किसान राजनीति कमजोर हुई बल्कि किसान एक वर्ग केरूप में वोट बैंक भी नहीं रह पाए। सरकारों में उनका दबदबा खत्म हो गया और  कथित किसान नेताओं ने किसानों को अनाथ बनाकर  बाजार में लुटने केलिए असहाय छोड़ दिया। 
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