केंद्रीय गृह मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि इस बाबत राज्यों से रिपोर्ट मांगी जा रही है। हर जगह पर प्रदर्शनकारियों का एक जैसा ट्रेंड देखने को मिला। प्रदर्शन शुरू होने से लेकर उसके खत्म होने तक मौके पर पुलिस रहती है, लेकिन इसके बावजूद प्रदर्शनकारी हिंसक हो जाते हैं। खुफिया एजेंसियां, जो कि 24 घंटे लोगों के बीच होने का दावा करती हैं, वे भी उग्र प्रदर्शनकारियों को नहीं पहचान पातीं। उन्हें इस बात का कोई अंदाजा नहीं था कि प्रदर्शन की भीड़ में कुछ अराजक तत्व भी हैं।
खास बात है कि नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में जहां भी प्रदर्शन हुए, वे सभी जम्मू कश्मीर में होने वाले प्रदर्शनों की तर्ज पर हुए हैं। सोशल मीडिया पर अफवाह फैलाने का काम भी उसी तरह हुआ, जैसा कि जम्मू कश्मीर में देखने को मिलता था। एक पूर्व डीजीपी के मुताबिक, यह पूरी तरह से पुलिस और खुफिया एजेंसियों की असफलता है। हर जगह पर एक ही तरीके से हिंसा हो रही है।
दिल्ली में जामिया इलाका हो या सीलमपुर, दोनों जगहों पर शांतिपूर्वक तरीके से चल रहा प्रदर्शन अचानक हिंसक हो गया। दरियागंज, यूपी के लखनऊ, मेरठ, बिजनौर, कानपुर, संभल, बुलंदशहर, मेरठ, गुजरात के बनासकांठा, तमिलनाडु में चेन्नई व कर्नाटक में बेंगलुरु आदि स्थानों पर हुए हिंसक प्रदर्शनों में भी यही बात देखने को मिली है। पहले प्रदर्शन शांतिपूर्वक होता है और बाद में वह हिंसा पर उतर जाता है।
खुफिया एजेंसियों को पता था कि शुक्रवार को जुम्मे की नमाज है। एक समुदाय विशेष के लोग मस्जिदों में एकत्रित होंगे। बावजूद इसके खुफिया एजेंसियां कुछ खास पता नहीं लगा सकीं। दिल्ली में तो प्रदर्शनकारियों ने पहले से एलान कर रखा था कि हम जामा मस्जिद से लेकर जंतर-मंतर तक प्रदर्शन करेंगे। दूसरे हिस्सों में भी प्रदर्शन की खबरें चल रही थीं। इसी तरह यूपी और दूसरे राज्यों के शहरों में हुआ है। वहां भी न तो पुलिस और न ही खुफिया एजेंसियां प्रदर्शनकारियों का हिंसात्मक इरादा भांप पाईं।
अमूमन हर जगह पर प्रदर्शनकारियों ने पुलिस को गच्चा दिया है। उन्होंने पहले इतनी सादगी से प्रदर्शन शुरू किया कि पुलिस भी यह मान बैठी, अब सब कुछ ठीक निकल जाएगा। और जैसे ही प्रदर्शन खत्म होने को होता है और तभी हिंसा भड़क उठती है।