प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने पिछले साल जून में दायर पूरक आरोपपत्र में प्रीति कोठारी को आरोपी बनाया था। उस पर मामले के मुख्य आरोपी अपने पति की मदद करने का आरोप लगाया गया है। अधिवक्ता विजय अग्रवाल और राहुल अग्रवाल के माध्यम से दायर आवेदन में कोठारी ने कहा कि अदालत ने नौ अगस्त को इस आधार पर उनके खिलाफ जमानती वारंट जारी किया कि समन जारी होने के बावजूद वह व्यक्तिगत रूप से पेश नहीं हुईं।
कोठारी ने दावा किया कि वह इस तथ्य के कारण वर्तमान कानूनी कार्यवाही को लेकर अनजान थीं कि वह धन शोधन का मामला दर्ज होने से बहुत पहले 2018 में एंटीगुआ और बारबुडा में स्थानांतरित होने के बाद से वहां की निवासी हैं। आवेदन में कहा गया है कि आवेदक (कोठारी) की विदेशी नागरिकता और निवास स्थान भारत से बाहर होने के तथ्य भारतीय अधिकारियों को अच्छी तरह से पता थे।
अदालत ने ईडी को अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया और मामले की सुनवाई 25 अगस्त तक के लिए स्थगित कर दी। ईडी ने अपने आरोपपत्र में चोकसी और कोठारी दंपति के अलावा चोकसी की तीन कंपनियों गीतांजलि जेम्स लिमिटेड, गिली इंडिया लिमिटेड और नक्षत्र ब्रांड लिमिटेड तथा पंजाब नेशनल बैंक के सेवानिवृत्त उप प्रबंधक (ब्रैडी हाउस शाखा, मुंबई) गोकुलनाथ शेट्टी का भी नाम लिया है।
ईडी द्वारा 2018 और 2020 में पहले दो आरोप पत्र दायर किए गए। जिसके बाद चोकसी के खिलाफ यह तीसरा आरोप पत्र था। ईडी और केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने 2018 में मुंबई में पीएनबी की ब्रैडी हाउस शाखा में कथित धोखाधड़ी के लिए चोकसी, उसके हीरा कारोबारी भांजे नीरव मोदी और उनके परिवार के सदस्यों और कर्मचारियों, बैंक अधिकारियों और अन्य के खिलाफ मामला दर्ज किया था।
आरोप है कि चोकसी, उसकी कंपनी गीतांजलि जेम्स और अन्य ने पंजाब नेशनल बैंक के खिलाफ कुछ बैंक अधिकारियों के साथ मिलकर धोखाधड़ी कर एलओयू (लेटर ऑफ अंडरटेकिंग) जारी करवाकर धोखाधड़ी की और निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना एफएलसी (विदेशी साख पत्र) को बढ़ाया और बैंक को गलत तरीके से नुकसान पहुंचाया।
मृत व्यक्तियों को गरिमा के साथ दफनाया जाना मौलिक अधिकार: उच्च न्यायालय
बंबई उच्च न्यायालय ने शहर के पूर्वी उपनगरों में दफनाने की जगह की कमी को रेखांकित करने वाली एक याचिका पर सुनवाई की। अदालत ने कहा कि संविधान के तहत मृत व्यक्तियों को गरिमा के साथ दफनाया जाना मौलिक अधिकार है।
मुख्य न्यायाधीश डी के उपाध्याय और न्यायमूर्ति आरिफ डॉक्टर की पीठ ने इस मामले में लापरवाह रवैये के लिए बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) और महाराष्ट्र सरकार को फटकार लगाई। पीठ गोवंडी निवासी शमशेर अहमद, अबरार चौधरी और अब्दुल रहमान शाह द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें पूर्वी उपनगरों में अतिरिक्त कब्रिस्तानों की मांग की गई थी।
पीठ ने कहा, कानून के तहत नगर निगम आयुक्त का यह कर्तव्य है कि वह मृतकों के निस्तारण के लिए उचित स्थान मुहैया कराए। आयुक्त के लिए दूसरी जगह ढूंढना अनिवार्य है।' अदालत ने आगे कहा, आपको मृतकों का भी उतना ही ख्याल रखने की जरूरत है जितना कि जिंदा।
उन्होंने कहा, 'संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत उन्हें सम्मान के साथ दफनाए जाने का अधिकार है। यदि शव सामने आ रहे हैं, तो क्या आप समझ सकते हैं कि इसका क्या मतलब है? क्या आपको ऐसे मामलों में अदालत के आदेश की आवश्यकता है? यह आपके द्वारा किया जाना चाहिए था। पीठ ने नगर निकाय की खिंचाई करते हुए कहा, 'आपको ऐसे मुद्दों के प्रति सजग रहना चाहिए था।'
अदालत ने कहा कि इस मामले में बीएमसी और राज्य सरकार दोनों के इस तरह के उदासीन रवैये को माफ नहीं किया जा सकता। मामले की अगली सुनवाई 5 सितंबर को होगी।