'सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि आस्था का प्रतीक'
भाजपा प्रवक्ता डॉ. सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि आज का विषय राजनीति से जुड़ा नहीं है, बल्कि भारत की पहचान, अस्मिता, अस्तित्व और उसके भविष्य से संबंधित है। उन्होंने कहा कि हर देश के इतिहास में कुछ ऐसे मोड़ और तारीखें होती हैं, जो भले ही पीड़ादायक हों, लेकिन उन्हें याद रखना जरूरी होता है, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
उन्होंने याद दिलाया कि आज 6 जनवरी 2026 है और ठीक एक हजार साल पहले इसी दिन महमूद गजनवी द्वारा सोमनाथ मंदिर का विध्वंस किया गया था। सोमनाथ मंदिर को द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रथम माना जाता है और इसका धार्मिक व सांस्कृतिक महत्व अत्यंत विशेष है। डॉ. त्रिवेदी ने कहा कि सोमनाथ केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि आस्था का प्रतीक है। मान्यता है कि इसके दर्शन मात्र से पापों का नाश होता है, पुण्य की प्राप्ति होती है और मनोवांछित फल मिलते हैं। यही कारण है कि सोमनाथ भारत की आत्मा और उसकी सनातन परंपरा का प्रतीक माना जाता है।
भारत की समृद्धि और संकल्प का प्रतीक
उन्होंने 11 मई 1951 का जिक्र करते हुए कहा कि जब सोमनाथ मंदिर की पुनर्स्थापना हो रही थी, तब देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था कि सोमनाथ की पूर्ण प्रतिष्ठा सिर्फ मंदिर के पुनर्निर्माण से नहीं होगी, बल्कि तब मानी जाएगी जब भारत भी उसी समृद्धि के शिखर पर पहुंचेगा, जिसकी वजह से अतीत में आक्रांताओं ने यहां हमला किया था। डॉ. त्रिवेदी ने कहा कि 1951 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के विरोध के बावजूद, राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की मौजूदगी में यह संकल्प साकार हुआ था। आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत तेजी से समृद्धि की ओर बढ़ रहा है और वह सपना अब साकार होने की दिशा में है। उन्होंने कहा कि सोमनाथ के संकल्प का विचार आज वास्तविकता बनता हुआ दिखाई दे रहा है।
सोमनाथ मंदिर पर पीएम मोदी ने लिखा लेख
प्रधानमंत्री मोदी पहले भी कह चुके हैं कि बार-बार विदेशी आक्रांताओं के हमलों के बावजूद दोबारा खड़ा हुआ सोमनाथ मंदिर भारतीय सभ्यता के अडिग और अटल आत्मबल का प्रतीक है। हाल ही में अपने लेख में उन्होंने कहा था कि सोमनाथ से बेहतर भारतीय सभ्यता की अजेय भावना का उदाहरण कोई और नहीं हो सकता, जो तमाम कठिनाइयों और संघर्षों के बाद भी गौरव के साथ खड़ा है। उन्होंने लिखा '
वर्ष 2026 सोमनाथ मंदिर के लिए बहुत महत्व रखता है, क्योंकि इस महान तीर्थ पर हुए पहले आक्रमण के 1000 वर्ष पूरे हो रहे हैं। जनवरी 1026 में गजनवी के महमूद ने आस्था और सभ्यता के महान प्रतीक को नष्ट करने के उद्देश्य से इस मंदिर को ध्वस्त कर दिया था। यह हिंसक और बर्बर प्रयास था।' यहां क्लिक करके पढ़ें पूरा लेख...
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