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लोकसभा में प्रधानमंत्री मोदी ने पढ़ा एक शेर, पूरी ग़ज़ल यहां पढ़ें

Fri, 20 Jul 2018 10:12 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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अविश्वास प्रस्ताव पर बोलते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी - फोटो : @BJP4India
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भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के चार साल के कार्यकाल में पहली बार सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पर लोकसभा में चर्चा हो रही है। लोकसभा में प्रधानमंत्री अविश्वास पर प्रस्वात पर बोल रहे हैं। इसके बाद प्रस्ताव पर वोटिंग होगी। अपने भाषण में प्रधानमंत्री मोदी ने विपक्ष पर निशाना साधते हुए एक शेर कहा - 
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न मांझी, न रहबर, न हक में हवाएं
है कश्ती भी जर्जर, ये कैसा सफर है 

इस शेर को लिखा है अमरोहा के शायर भुवनेश्वर प्रसाद दीक्षित ने। उनका कलमी नाम है दीक्षित दनकौरी। वे दिल्ली सरकार के शिक्षा निदेशालय में वरिष्ठ योग शिक्षक है।
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इस शेर की पूरी ग़ज़ल यहां पढ़ें: 

शेर अच्छा-बुरा नहीं होता 
या तो होता है, या नहीं होता 

पसारूं हाथ क्यों आगे किसी के 
तरीक़े और भी हैं ख़ुदकुशी के 
लाज़िम नहीं कि हर कोई हो कामयाब ही 
जीना भी सीख लीजिए नाकामियों के साथ 
शजर जब हक़ निभाना छोड़ देते हैं 
परिंदे आशियाना छोड़ देते हैं 
 
मैं हंस-हंस के सहता रहा ज़ुल्म उसके
न वो बाज़ आया, न मैं बाज़ आया 
क़ब्रों पर लिख लो तहरीरें लाख मगर 
इज्ज़त, शोहरत, मान, बड़ाई, सब मिट्टी
ये जो दुनिया है, प्यार देती है 
ब्याज पर ही उधार देती है 
इस दौरे-तरक्क़ी में, बचानी है अना भी 
रफ़्तार संभालूं, कि मैं दस्तार संभालूं 

एकता के सभी पक्षधर हो गए 
कुछ इधर हो गए कुछ उधर हो गए
है यही तो अदा सियासत की 
ज़हर देकर दवा पिलाई भी 
करें ज़िद, आसमां सिर पर उठा लें 
कि बच्चों-सा मचल कर देखते हैं 
राज दिलों पर करता हूं मैं 
सरकारी सम्मान नहीं हूं 

जाते -जाते वो ऐसी क़सम दे गया 
उम्र भर के लिए रंजो-ग़म दे गया 
ज़ुल्म की इंतिहा न हो जाए 
बावफा, बेवफ़ा न हो जाए 
जो चंदा था, जो सूरज था, मेरा क्या-क्या नहीं था 
वो ही आंखें दिखाएगा, ये अंदाज़ा नहीं था 
चाहता हूं अमीर हो जाऊं 
तेरे दर का फ़क़ीर हो जाऊं

मैंने सूरज से की दोस्ती 
आंख की रौशनी खो गई 
क़फ़स में क़ैद पंछी की कराहें 
ज़माने को अदाएं लग रही हैं 

न मांझी, न रहबर, न हक़ में हवाएं
है कश्ती भी जर्जर, ये कैसा सफ़र है 


खुश्क पत्ते दर-ब-दर हो जाएंगे 
पेड़ तो फिर भी हरा हो जाएगा 
ये करिश्मा बता हुआ कैसे 
तू किसी का सगा हुआ कैसे 

मैं तो राज़ी हूं तेरी रज़ा में मगर 
तेरी क्या है रज़ा, कुछ पता तो चले 
रंजिश है उसको मुझ से, मगर ये कमाल है 
दुश्मन भी मेरे उसने ठिकाने लगा दिए
लाख हैं दुश्वारियां माना यहां पर 
नाज़ है फिर भी हमें हिन्दोस्तां पर 

दुश्मने-जां से प्यार कर बैठे 
खुद ही अपना शिकार कर बैठे 
ज़ुल्म की इंतिहा न हो जाए 
बावफा, बेवफ़ा न हो जाए
 
अलग ही मज़ा है फ़क़ीरी का अपना 
न पाने की चिंता, न खोने का डर है
बेच आए ज़मीर और अना 
घर की इज्ज़त संभाल ली हमने 

तोड़ लीं बेड़ियां मैंने सब 
अब न तू चाहिए और न रब
लाख लड़ लीजिए ज़माने से 
इंकिसारी ही काम आती है 

हालात ही संगीन हैं, रहबर भी करे क्या 
लाचार हूं, लाचार को बस देख रहा हूं
वो मिलेगा यक़ीनन मगर शर्त है
आख़िरी सांस तक जुस्तजू चाहिए

जानता हूं मिज़ाज मैं उनका 
इसलिए हां में हां मिलाता हूं 
तू हुआ बेवफ़ा, चल हुआ 
हो न जाना कहीं बेअदब 

अपने दिल को छूकर देख 
क्या होता है पत्थर देख 
वो जो करते रहे सिर्फ आलोचना 
देखते-देखते नामवर हो गए 
चांद तारे न ये रंगो-बू चाहिए 
कुछ खिलौने नहीं मुझको तू चाहिए 

- दीक्षित दनकौरी

अर्थ-
*शजर : पेड़
*अना : स्वाभिमान
*दस्तार : पगड़ी 
*क़फ़स-पिंजरा 
*अना - स्वाभिमान 
*इंकिसारी - विनम्रता 
*जुस्तजू : खोज
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