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UP Assembly Election: पीएम ने काशी विश्वनाथ धाम में काम करने वालों के लिए भेजे जूट के जूते, क्या यूपी के चुनाव में नया मुद्दा बनेगा?

Mon, 10 Jan 2022 07:11 PM IST
प्रतिभा ज्योति न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली,

सार

माना जा रहा है कि पीएम के इस कदम के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं में भी जूट उसी तरह लोकप्रिय होगा जिस तरह की लोकप्रियता खादी को मिली है। चुनाव के दौरान पार्टी नेता और कार्यकर्ता भी जूट के जूते में नजर आ सकते हैं। 
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काशी विश्वनाथ धाम में मजदूरों संग पीएम मोदी - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने काशी विश्वनाथ मंदिर में काम करने वाले लोगों के लिए 100 जोड़ी जूट के जूते भिजवाए हैं। यह जूते श्रमिकों और कामगारों के लिए हैं जो नंगे पांव मंदिर परिसर में काम करते हैं। पीएम ने पिछले महीने वाराणसी में पीएम मोदी ने 339 करोड़ रुपये की पुनर्विकास परियोजना का उद्घाटन किया था और इसी दौरान उन्होंने इस बात पर गौर किया।
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सूत्रों का कहना है कि पीएम मोदी ने यह जूते वाराणसी भिजवाएं हैं। जूट के जूतों का वितरण रविवार को कमिश्नर दीपक अग्रवाल ने किया। उन्होंने बताया कि पहले सभी पुजारियों, सेवादारों और सुरक्षाकर्मियों को लकड़ी के खड़ाऊं दिए गए थे। मगर खड़ाऊं पहनकर 8 घंटे ड्यूटी करना मुश्किल हो रहा था।



ताकि नंगे पांव न काम करना पड़े
दरअसल काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर के पुनर्विकास परियोजना का उद्घाटन करने के दौरान पीएम को यह पता चला कि चूंकि मंदिर परिसर में चमड़े या रबर के जूते पहनना मना है इसलिए काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर में काम करने वाले ज्यादातर लोग नंगे पांव काम करते हैं। इसके बाद पीएम मोदी ने उनके लिए 100 जोड़ी जूट के जूते भेजे हैं, ताकि जो लोग ड्यूटी कर रहे हैं उन्हें कड़ाके की ठंड में नंगे पांव न रहना पड़े।
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इनमें पुजारी, सेवा करने वाले लोग, सुरक्षा गार्ड, सफाई कर्मचारी और अन्य शामिल हैं।  पिछले महीने अपनी दो दिवसीय वाराणसी यात्रा के दौरान, प्रधान मंत्री ने काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का निर्माण करने वाले श्रमिकों पर फूलों की पंखुड़ियों की वर्षा की थी और बाद में उनके साथ दोपहर का भोजन किया था

काशी विश्वनाथ धाम में पीएम मोदी - फोटो : अमर उजाला
धार्मिक पर्यटन बढ़ा
पीएम के इस तोहफे के बाद मंदिर परिसर में अब कर्मचारियों के लिए जूट के जूते पहनना आसान रहेगा। काशी विश्वनाथ धाम बनने के बाद यहां धार्मिक टूरिज्म काफी बढ़ चुका है। नए साल पर हजारों भक्त दर्शन के लिए यहां पहुंचे थे। माना जा रहा है कि अब काशी में जूट से बनी जूतियां, बैग और अन्य सामान बड़ी संख्या में बेचे जाएंगे, जो यहां आने वाले श्रद्धालु भी खरीद सकते हैं। 

हम भी पहनेंगे जूट के जूते
पार्टी के एक नेता ने बताया जिस तरह पीएम ने जूट की जूतियां भेजी हैं उससे कार्यकर्ताओं के लिए भी यह संदेश है कि हम भी जूट से बने उत्पादों का इस्तेमाल करें। जिस तरह पीएम मोदी ने खुद खादी को अपनाकर खादी को लोकप्रिय कर दिया, निश्चित ही आने वाले समय में यह जूट उत्पादकों और इस उद्योग में एक नई जान फूंकने वाला है।

जानकार भी मानते हैं कि पीएम मोदी की किसी भी चीज को लोकप्रिय बनाने की एक खास शैली है। यदि उन्होंने काशी विश्वनाथ धाम कॉरिडोर के लोगों के लिए जूट की जूतियां भेजीं हैं तो निश्चित ही यह जूट उद्योग के लिए देश को एक बड़ा संदेश है।

जूट के बोरे - फोटो : सोशल मीडिया
क्या पश्चिम बंगाल है निशाने पर
भारत जूट का दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक है, इसके बाद बांग्लादेश है। भारत में जूट उद्योग 150 साल पुराना है। देश में लगभग 70 जूट मिलें हैं, जिनमें से लगभग 60 पश्चिम बंगाल के हुगली नदी के दोनों किनारों पर हैं।

गौर करने वाली बात यह है कि उत्तर प्रदेश प्रमुख जूट उत्पादक वाले राज्यों में नहीं गिना जाता है। जूट मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम, मेघालय, त्रिपुरा और आंध्र प्रदेश में उगाया जाता है। लेकिन पीएम के जूट को बढ़ावा दिए जाने का यह भी मतलब निकाला जा रहा है कि शायद वे पश्चिम बंगाल के जूट उत्पादकों का ध्यान अपनी ओर खींचना चाहते हैं।

कई लोगों की आजीविका इस उद्योग से चलती है
इस उद्योग से पश्चिम बंगाल में तीन लाख से ज्यादा लोगों को रोजगार मिलता है और लाखों किसान परिवारों की आजीविका इससे चलती है। लेकिन ज्यादतर जूट मिल वित्त अक्षमता, श्रम संघर्ष जैसी समस्याओं से जूझ रही है। जिससे वे नियमित अंतराल पर खुलती और बंद होती हैं। पश्चिम बंगाल की जूट मिलों में बड़ी संख्या में यूपी-बिहार से गए मजदूर काम करते हैं। बताया जाता है कि बीते साल अप्रैल-मई में हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में भाजपा इन जूट कर्मचारियों को आकर्षित नहीं कर पाई थी।
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जूट बैग्स के साथ छात्राएं - फोटो : अमर उजाला
जूट प्रोत्साहन को बढ़ावा देना चाहती है सरकार
वहीं सरकारी सूत्रों का यह भी कहना है कि सरकार जूट उत्पादन को बढ़ावा देना चाहती है। सरकार ने यह सुनिश्चित किया है कि 100 फीसदी अनाज की पैकेजिंग जूट के बैग में ही की जाएगी।  जबकि पटसन किसान उचित भाव नहीं मिलने के कारण इसकी बुवाई करने से बच रहे हैं। इससे जूट मिलों को पर्याप्त कच्चा माल नहीं मिल पाता है। 

जूट उद्योग मुख्य रूप से सरकारी क्षेत्र पर ही निर्भर है, जो खाद्यान्न की पैकिंग के लिए हर साल 6500 करोड़ रुपये से भी अधिक कीमत की जूट बोरियां खरीदता है। ऐसा इसलिए किया जाता है, ताकि जूट उद्योग के लिए मुख्य मांग निरंतर बनी रही और इस क्षेत्र से जुड़े लोगों, कामगारों और किसानों की आजीविका में कोई समस्या नहीं आए। वहीं पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए लोगों में जूट से बने उत्पादों के प्रयोग को लेकर लगातार जागरूकता अभियान भी चलाए जाते हैं।   
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