किसानों को सस्ती बिजली उपलब्ध कराने के मुद्दे पर सरकार, बिजली कंपनियां और स्वयं किसान असमंजस में हैं। अगर किसानों को मुफ्त बिजली उपलब्ध कराई जाती है, तो इससे बिजली कंपनियों और अंततः सरकार पर लगातार वित्तीय बोझ बढ़ता जाता है, जो पहले ही प्रति वर्ष 80 हजार करोड़ रुपये की सीमा पार कर चुका है। वहीं अगर किसानों को मुफ्त बिजली उपलब्ध नहीं कराई जाती है, तो इससे किसानों की कृषि लागत बढ़ती है, जो पहले ही कर्ज के बोझ से दबे हुए हैं। ऐसे में विकल्प क्या हो सकता है, जो सरकारों को वित्तीय बोझ से राहत देने के साथ-साथ किसानों को मुफ्त बिजली भी प्रदान करा सके।
दरअसल, बिजली कंपनियां चार से 4.50 रुपये तक प्रति यूनिट का भुगतान करती हैं। इसे ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचाने के समय परिचालन लागत और प्रशासनिक खर्च मिलाकर यह सात रुपये से 8.50 रुपये तक पहुंच जाता है। लेकिन सरकार के दिशा-निर्देशों के कारण इसे किसान को लगभग मुफ्त या नाममात्र की लागत पर उपलब्ध कराया जाता है। लेकिन अगर यही बिजली ग्रामीण स्तर पर ही पैदा की जा सके, तो इसकी परिचालन लागत और प्रशासनिक खर्च नगण्य हो जाएगा।
किसानों को कृषि कार्यों के लिए बिजली की आवश्यकता बहुत सीमित समय के लिए होती है। लेकिन सोलर पैनल से वे लगातार बिजली पैदा करते हैं। इस तरह वे अतिरिक्त बिजली कंपनियों को बेचकर स्थाई कमाई का साधन तैयार कर सकते हैं। अगर सरकार और बिजली कंपनियां किसानों की बिजली खरीदने की गारंंटी दें, तो इससे एक तरफ तो किसान बिजली बेचकर स्थाई आय का साधन बना सकते हैं, तो दूसरी तरफ सरकार को भी स्वच्छ ईंधन की स्थाई सप्लाई मिल सकती है जो देश को ऊर्जा संकट में बड़ी मदद कर सकती है।
सौर ऊर्जा पैनल के लिए सब्सिडी उपलब्ध कराने के लिए फंड देना केंद्र-राज्य सरकारों के लिए बड़ी चुनौती है। किसानों की भारी संख्या सब्सिडी के लिए भारी-भरकम बजट की मांग करती है। वर्तमान समय में यह सरकार के लिए चुनौतीपूर्ण है। इसके प्रति किसानों के मन में जागरूकता पैदा करना भी बड़ी चुनौती है जो पारंपरिक सोच से अलग जाने में संकोच का भाव रखते हैं।