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भारत-नेपाल सीमा पर लगे पिलर हर साल हो जाते हैं गायब, कौन ले जाता है इन्हें

Tue, 14 Jul 2020 09:20 PM IST
Rohit Ojha जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली 
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भारत-नेपाल सीमा पर तैनात जवान - फोटो : अमर उजाला
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भारत-नेपाल सीमा पर हर साल गायब होने वाले पिलर का मसला दोनों देशों की बॉर्डर गार्ड फोर्स के लिए परेशानी का सबब बन गया है। हर साल सैकड़ों पिलर गायब होते हैं और इतने ही क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। कई बार यह समझा जाता है कि भारत नेपाल बॉर्डर खुला होने के कारण अपराधिक तत्व इन पिलर को क्षतिग्रस्त कर देते हैं। 

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दरअसल, हर साल इस सीमा के कई हिस्सों में भारी बरसात और बाढ़ की स्थिति बनी रहती है। जहां पानी का बहाव बहुत तेज होता है, वहां कई पिलर उसमें बह जाते हैं। इनकी मरम्मत का तरीका भी अजीब है। कौन सा देश किस पिलर की मरम्मत कराएगा, यह आड-ईवन आधार पर तय होता है। जैसे भारत 1,3,5 व 7वें पिलर की मरम्मत कराता है तो नेपाल 2, 4, 6 और 8 संख्या वाले पिलर को ठीक कराता है। 

खास बात है कि इस मुद्दे को लेकर दोनों देशों की बॉर्डर गार्ड फोर्स के बीच कोई विवाद नहीं होता। वजह, इन पिलर की मरम्मत दोनों देशों के सिविल महकमे कराते हैं। एसएसबी के एक अधिकारी के मुताबिक, जब ये पिलर टूट जाते हैं या गायब होते हैं तो इनकी सही जगह का पता लगाने के लिए सर्वे ऑफ इंडिया की मदद ली जाती है। जब नए पिलर खड़े होते हैं तो उस दौरान नेपाल सशस्त्र बलों एवं संबंधित जिला प्रशासन के अधिकारी वहां मौजूद रहते हैं।
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प्रकृति भी इसके लिए जिम्मेदार
कई बार यह भी देखने को मिलता है कि आबादी के निकटवर्ती इलाकों में जहां से पिलर हटते हैं या श्रतिग्रस्त हो जाते हैं, वहां पर तस्करों की आवाजाही शुरू हो जाती है। इसके लिए एसएसबी सतर्कता बरतती है। तीन साल पहले तक सीमा के कई क्षेत्रों में सैंकड़ों पिलर गायब मिले थे। दोनों देशों के बीच 18.2 मीटर के 'नो-मैन्स लैंड' के आसपास भी अनेक पिलर क्षतिग्रस्त मिलते हैं। जमीन कब्जाने वालों के अलावा प्रकृति भी इसके लिए जिम्मेदार होती है। भारी बाढ़ में ये पिलर बह जाते हैं। अनेक पिलर ऐसी जगह पर होते हैं जो नदियों के बदलते मार्ग का शिकार हो गए।

इस समस्या से थोड़ी निजात पाने के लिए दोनों देशों के बीच सीमा पर बने पिलर में ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) लगाने पर सहमति बनी थी। समझौते के अनुसार, दोनों देश 1,880 किलोमीटर की सीमा में 83 नियंत्रण बिंदु स्थापित करेंगे। सीमा के साथ सभी 8,553 पिलर में जीपीएस सिस्टम स्थापित किया जाएगा। इसका फायदा यह होगा कि पिलर के क्षतिग्रस्त होने ही सही स्थिति का पता लग सकेगा।

यह भी मालूम हो जाएगा कि प्राकृतिक आपदा या मानव हस्तक्षेप से तो वह पिलर क्षतिग्रस्त नहीं हुआ है। कई ऐसी जगह हैं जहां पर पांच सौ मीटर के हिस्से में बॉर्डर दस बार टर्न लेता है, ऐसी जगहों पर पिलर गायब होने की स्थिति में जवानों को छोटे अंतराल की दूरी पर तैनात कर दिया जाता है।

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