दस निर्दोष लोगों की हत्या करने वाले पुलिसकर्मियों को सजा देना ही पर्याप्त नहीं है। पुलिसकर्मियों को तो अपने किए की सजा मिलनी ही चाहिए थी लेकिन पिछले 25 वर्षों से न्याय की आस लगाए पीड़ित परिवारों को सही मायने में न्याय तब मिलेगा जब उन्हें मुआवजा भी मिले।
यह राज्य की जिम्मेदारी है कि वह पीड़ित परिवार को उचित मुआवजा दे। इस घटना में किसी ने अपने बेटे को तो किसी ने अपने पिता को और किसी ने अपने पति को खोया था। उनकी तो पूरी दुनिया ही उजड़ गई। यह जरूर है पीड़ित परिवारों पर जो विपत्ति आईं है, उसकी भरपाई तो किसी चीज से नहीं की जा सकती है। मुझे इस बात की बेहद खुशी है कि कहीं न कहीं मेरा प्रयास सफल रहा है। मैंने 25 वर्ष पहले सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर मामले की सीबीआई जांच कराने की गुहार की थी।
कहीं न कहीं मुझे लगता था कि चूंकि एनकाउंटर में आरोपी पुलिसकर्मी थे, ऐसे में राज्य पुलिस से निष्पक्ष जांच की उम्मीद बेमानी थी। पहले मामले की जांच सीबीआई को सौंपने से पहले राज्य सरकार से अनुमति लेनी पड़ती थी। लेकिन मेरी याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 1991 में नई पहल की और कहा कि सीबीआई जांच का आदेश हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट भी दे सकता है।
यानी इस फैसले के बाद किसी मामले की जांच को सीबीआई को सौंपने के लिए राज्य सरकार की अनुमति लेना जरूरी नहीं रह गया। इस मामले में सीबीआई की भूमिका की तारीफ होनी चाहिए क्योंकि वह पुलिस अधिकारियों पर लगे आरोपों को साबित करने में कामयाब रही।