याचिका में कहा गया है कि केंद्र और राज्य धोखेबाजी से धर्मांतरण के खतरे को नियंत्रित करने में विफल रहे हैं, जबकि ऐसा करना संविधान के अनुच्छेद-14, 21, 25 के तहत उनका कर्तव्य है।
सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है जिसमें केंद्र और राज्यों को धोखाधड़ी वाले धर्मांतरण पर नियंत्रित करने के लिए निर्देश देने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि धमकी, छल, उपहार व मौद्रिक लाभ के माध्यम से धर्मांतरण कराए जा रहे हैं। तमिलनाडु के तंजावुर में 19 जनवरी को 17 वर्षीय लड़की लावण्या द्वारा कथित आत्महत्या का हवाला देते हुए भाजपा नेता व वकीलबअश्विनी कुमार उपाध्याय ने याचिका दायर की है।
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याचिका में कहा गया है कि केंद्र और राज्य धोखेबाजी से धर्मांतरण के खतरे को नियंत्रित करने में विफल रहे हैं, जबकि ऐसा करना संविधान के अनुच्छेद-14, 21, 25 के तहत उनका कर्तव्य है। याचिका में कहा गया है, 'लावण्या का असामयिक निधन एक 'वेक-अप कॉल' है। यह लोगों को साम्राज्यवादी लक्ष्यों की याद दिलाता है। वास्तव में यह लोगों को याद दिलाता है कि कैसे हिंदू धर्म-धर्मनिरपेक्षता को उखाड़ने के लिए एक विस्तृत योजना का उपयोग किया जा रहा है। वास्तव में कई और लावण्यों को इस तरह की जबरदस्ती-प्रेरक रणनीति के परिणामस्वरूप इस तरह के कठोर उठाने पर मजबूर होना पड़ा है।
मालूम हो कि मद्रास हाईकोर्ट ने पहले ही लावण्या की मौत की सीबीआई जांच का आदेश दे दिया है। याचिका में कहा गया है कि अनुच्छेद-25 सभी व्यक्तियों के अंतःकरण की स्वतंत्रता का आनंद लेने के अधिकार की रक्षा करता है। इसका अर्थ है कि बिना किसी धमकी, अनुचित जबरदस्ती, गुमराह के स्वतंत्रता।
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याचिकाकर्ता उपाध्याय का कहना है कि संवैधानिक रूप से प्रदत स्वतंत्रता अपना उद्देश्य खो देती है जब राज्य पर्याप्त उपायों को अपनाने व लागू करने में विफल रहता है कि जबरन धर्मांतरण प्रतिबंधित है। जबकि यह सुनिश्चित करना राज्य का काम है। याचिका में यह भी कहा गया है कि भौतिक लाभों के लालच में अपनी अंतरात्मा की स्वतंत्रता को खोना, शोषण है। याचिकाकर्ता ने यह भी दावा किया कि स्थिति चिंताजनक है क्योंकि कई व्यक्ति और संगठन पिछले दो दशकों से ग्रामीण क्षेत्रों में एससी-एसटी का बड़े पैमाने पर धर्मांतरण कर रहे हैं।