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Politics: क्या पूर्वोत्तर से खुलेगा नकवी के राज्यसभा जाने का रास्ता? त्रिपुरा में माणिक साहा के जीतने के बाद लग रहे ये कयास

सार

संविधान विशेषज्ञ और लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी आचारी ने अमर उजाला से चर्चा में कहा कि जिस दिन माणिक साहा राज्य सभा सांसद पद से इस्तीफा देंगे। इसके बाद वह सीट खाली हो जाएगी। इसके बाद निर्वाचन आयोग को छह माह के भीतर इस सीट पर चुनाव करवाना होगा...
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मुख्तार अब्बास नकवी - फोटो : अमर उजाला (फाइल फोटो)
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विस्तार
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राज्यसभा चुनावों से लेकर राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति चुनावों में इस बार भाजपा का एक नाम खासा चर्चा में बना हुआ है। यह है अटल जी के जमाने से पार्टी का जाना पहचाना मुस्लिम चेहरा मुख्तार अब्बास नकवी। रामपुर से कभी लोकसभा चुनाव जीतने वाले नकवी वाजपेयी सरकार में मंत्री भी रहे। इसके बाद तीन बार राज्यसभा सांसद के साथ ही मोदी सरकार के अहम मंत्री पदों पर काबिज हैं। लेकिन पार्टी ने इस बार उन्हें राज्यसभा का टिकट नहीं दिया। इसके बाद से राजनीतिक गलियारों में नकवी को राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति बनाने को लेकर चर्चाओं का दौर शुरू हो गया। लेकिन एनडीए की तरफ से द्रौपदी मुर्मू का नाम सामने आने के बाद वे राष्ट्रपति की दौड़ से भी बाहर हो गए। हालांकि अब भी नकवी के चाहने वाले उन्हें उपराष्ट्रपति की दौड़ में सबसे आगे मान रहे हैं।

अप्रैल 2022 में सांसद बने थे साहा

लेकिन इसी बीच त्रिपुरा उपचुनाव की एक जीत नकवी के चेहरे पर खुशी लेकर आई है। त्रिपुरा की टाउन बोरदोवाली विधानसभा सीट से प्रदेश के मुख्यमंत्री माणिक साहा उपचुनाव जीत गए हैं। क्योंकि साहा त्रिपुरा की एकमात्र राज्यसभा सीट से भाजपा सांसद हैं। उपचुनाव जीतने के बाद उन्हें इस सीट से इस्तीफा देना होगा। ऐसे में नकवी के उच्च सदन में पहुंचने की राह एक बार फिर खुलने के आसार नजर आ रहे हैं। राजनीतिक जानकारों की मानें तो त्रिपुरा की राज्यसभा सीट मुख्तार अब्बास नकवी के लिए एकदम मुफीद हो सकती है। माणिक साहा अप्रैल 2022 में ही राज्यसभा के सांसद बने थे। इसका मतलब है कि उनके कार्यकाल का पूरा समय ही बाकी है।

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अमर उजाला से चर्चा में वरिष्ठ पत्रकार समीर चौगांवकर कहते हैं कि केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी के पास फिलहाल दो ही विकल्प बचे हैं। पहला पार्टी उन्हें उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बना दे और दूसरा उन्हें त्रिपुरा से राज्यसभा भेज दे। उपराष्ट्रपति की उम्मीद इसलिए भी ज्यादा है कि पार्टी पहले ही एक आदिवासी महिला को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित कर चुकी है। केंद्रीय मंत्रिपरिषद में एक भी मुस्लिम मंत्री नहीं है। दूसरा नुपूर शर्मा के बयान के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सरकार की जो किरकिरी हुई है, ऐसे में भारतीय मुस्लिम समेत मुस्लिम बाहुल्य देशों को संदेश देने के लिए पार्टी नकवी को उप-राष्ट्रपति बना सकती है। हालांकि नकवी की त्रिपुरा से राज्यसभा जाने की संभावना बहुत कम है। क्योंकि पूर्वोत्तर में भाजपा अपनी स्थिति फिलहाल मजबूत रखना चाहती है। जाति-जनजाति और अन्य क्षेत्रीय दृष्टिकोण से यह क्षेत्र बहुत ही महत्वपूर्ण है। इसलिए पार्टी इसी क्षेत्र के किसी नेता को राज्य सभा भेजना ज्यादा उचित समझेगी। ताकि आगामी चुनावों में उसे इसका फायदा मिल सके। अगर नकवी को राज्य सभा भेजना होता, तो अन्य केंद्रीय मंत्रियों की तरह दूसरे राज्यों से उच्च सदन में भेज सकती थी।

माणिक साहा पहुंचे विधानसभा

संविधान विशेषज्ञ और लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी आचारी ने अमर उजाला से चर्चा में कहा कि जिस दिन माणिक साहा राज्य सभा सांसद पद से इस्तीफा देंगे। इसके बाद वह सीट खाली हो जाएगी। इसके बाद निर्वाचन आयोग को छह माह के भीतर इस सीट पर चुनाव करवाना होगा। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 164 (4) के मुताबिक कोई भी व्यक्ति जो किसी भी सदन का सदस्य न हो, वह अधिकतम छह महीने तक सरकार में मंत्री पद पर रह सकता है। इसलिए नकवी अगले छह महीने तक मंत्री पद पर बने रह सकते हैं।
 

दरअसल, मई में बिल्पव देव ने त्रिपुरा के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद पार्टी ने राज्य की कमान भाजपा प्रदेश अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद माणिक साहा को सौंप दी थी। साहा को मुख्यमंत्री पद पर बने रहने के लिए किसी एक विधानसभा सीट से विधायक बनाना बेहद जरूरी था। इसी बीच प्रदेश की बारदोवाली सीट से भाजपा विधायक आशीष साहा ने भाजपा छोड़कर कांग्रेस का हाथ थाम लिया। जिसके बाद से यह सीट खाली हो गई थी। यहां से उप चुनाव में उतरे सीएम माणिक साहा कांग्रेस उम्मीदवार आशीष कुमार साहा को हराकर विधानसभा पहुंचने में सफल रहे। इस उपचुनाव में भाजपा के दो अन्य उम्मीदवारों ने भी जीत हासिल की। जबकि कांग्रेस को एक सीट पर जीत मिली है। त्रिपुरा में भाजपा के तीन विधायकों के इस्तीफे और सीपीएम विधायक रामेंद्र चंद्र देवनाथ के निधन के बाद यहां की चार सीटों पर उपचुनाव कराया गया था।

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