कोविशील्ड और कोवाक्सिन का एक और तुलनात्मक अध्ययन सामने आया है जिसके अनुसार ऑटोइम्युन रोगों से पीड़ित मरीजों में वैक्सीन बहुत अधिक कारगर नहीं मिल रही। इन्हें वैक्सीन लेने से पहले चिकित्सीय सलाह की जरूरत है।
कोविशील्ड से ज्यादा बनीं एंटीबॉडी
अध्ययन के लिए ऑटोइम्युन बीमारियों से ग्रस्त 136 मरीजों का चयन किया गया जिनमें पहले कोरोना संक्रमण नहीं मिला था। इनमें कोविशील्ड और कोवाक्सिन की दोनों खुराक लेने वाले मरीज हैं जिनमें दूसरी खुराक लगने के महीने भर बाद एंटीबॉडी की जांच की गई। इस दौरान पता चला कि कोविशील्ड लेने वाले 120 में से 114 (95 फीसदी) मरीजों में एंटीबॉडी मिलीं, लेकिन कोवाक्सिन लेने वाले 16 में से 11 (68.76 फीसदी) में ही एंटीबॉडी देखने को मिलीं। कोविशील्ड वालों में एंटीबॉडी टाइट्रेस का स्तर पर भी अधिक था।
पुख्ता जांच के लिए स्वस्थ लोगों पर भी अध्ययन
अध्ययन के दौरान पुख्ता जानकारी के लिए 30-30 स्वस्थ लोगों को भी शामिल किया और इनमें पता चला कि कोविशील्ड लेने वाले सभी लोगों में एंटीबॉडी मिलीं लेकिन कोवाक्सिन लेने वाले 30 में से 23 लोगों में ही एंटीबॉडी विकसित हुईं।
दुर्लभ बीमारियों पर वैक्सीन का असर
बीमारी एंटीबॉडी बनीं एंटीबॉडी नहीं
गठिया 35 (92.10%) 3 (7.89%)
पैलिंड्रोमिक गठिया 16(94.11%) 1(5.88%)
ल्यूपस एरिथेमेटोसस 8(88.88%) 1(11.11%)
वास्कुलिटिस 3(60%) 2(40%)
स्क्लेरोडर्मा 1(33.33%) 2(66.66%)
मायोसिटिस 0 1 (100%)
कोवाक्सिन के अध्ययन पर में कमी
कोविशील्ड और कोवाक्सिन को लेकर सामने आए देश के पहले अध्ययन को लेकर अब बड़ी बहस शुरू हो चुकी है। एक ओर सोशल मीडिया पर भारत बायोटेक कंपनी के चेयरमेन डॉ. कृष्णन ईला के बेटे डॉ. रैचेस इला ने अध्ययन को आधारहीन बताया। वहीं शोद्यार्थियों ने भी सोशल मीडिया पर उन्हें पूरे सबूत देने का दावा तक किया।
इस बीच बुधवार को हैदराबाद स्थित भारत बायोटेक कंपनी ने बयान दिया कि इस अध्ययन में बहुत खामियां हैं। कंपनी ने यहां तक कहा कि यह एक सहकर्मी-समीक्षा प्रकाशन नहीं है। न ही सांख्यिकीय और वैज्ञानिक रूप से डिजाइन किया गया अध्ययन है। इसके अलावा यह अध्ययन क्लिनिकल ट्रायल रजिस्ट्री या फिर ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (सीडीएससीओ) के अधीन कार्यरत एसईसी समिति से मंजूरी लेकर की गई है। अध्ययन का डिजाइन और आचरण पूर्व निर्धारित परिकल्पना के बजाय एक तदर्थ विश्लेषण को दर्शाता है।